chevron_left वन पर्व अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच:
अजानतस्ते राधेय़ नाभ्यसूय़ाम्यहं वचः |
१ क
दुर्योधन उवाच:
जानासि त्वं जिताञ्शत्रून्गन्धर्वांस्तेजसा मय़ा ||
१ ख
दुर्योधन उवाच:
आय़ोधितास्तु गन्धर्वाः सुचिरं सोदरैर्मम |
२ क
दुर्योधन उवाच:
मय़ा सह महावाहो कृतश्चोभय़तः क्षय़ः ||
२ ख
दुर्योधन उवाच:
माय़ाधिकास्त्वय़ुध्यन्त यदा शूरा विय़द्गताः |
३ क
दुर्योधन उवाच:
तदा नो नसमं युद्धमभवत्सह खेचरैः ||
३ ख
दुर्योधन उवाच:
पराजय़ं च प्राप्ताः स्म रणे वन्धनमेव च |
४ क
दुर्योधन उवाच:
सभृत्यामात्यपुत्राश्च सदारधनवाहनाः |
४ ख
दुर्योधन उवाच:
उच्चैराकाशमार्गेण ह्रिय़ामस्तैः सुदुःखिताः ||
४ ग
दुर्योधन उवाच:
अथ नः सैनिकाः केचिदमात्याश्च महारथान् |
५ क
दुर्योधन उवाच:
उपगम्याव्रुवन्दीनाः पाण्डवाञ्शरणप्रदान् ||
५ ख
दुर्योधन उवाच:
एष दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः सहानुजः |
६ क
दुर्योधन उवाच:
सामात्यदारो ह्रिय़ते गन्धर्वैर्दिवमास्थितैः ||
६ ख
दुर्योधन उवाच:
तं मोक्षय़त भद्रं वः सहदारं नराधिपम् |
७ क
दुर्योधन उवाच:
परामर्शो मा भविष्यत्कुरुदारेषु सर्वशः ||
७ ख
दुर्योधन उवाच:
एवमुक्ते तु धर्मात्मा ज्येष्ठः पाण्डुसुतस्तदा |
८ क
दुर्योधन उवाच:
प्रसाद्य सोदरान्सर्वानाज्ञापय़त मोक्षणे ||
८ ख
दुर्योधन उवाच:
अथागम्य तमुद्देशं पाण्डवाः पुरुषर्षभाः |
९ क
दुर्योधन उवाच:
सान्त्वपूर्वमय़ाचन्त शक्ताः सन्तो महारथाः ||
९ ख
दुर्योधन उवाच:
यदा चास्मान्न मुमुचुर्गन्धर्वाः सान्त्विता अपि |
१० क
दुर्योधन उवाच:
ततोऽर्जुनश्च भीमश्च यमजौ च वलोत्कटौ |
१० ख
दुर्योधन उवाच:
मुमुचुः शरवर्षाणि गन्धर्वान्प्रत्यनेकशः ||
१० ग
दुर्योधन उवाच:
अथ सर्वे रणं मुक्त्वा प्रय़ाताः खचरा दिवम् |
११ क
दुर्योधन उवाच:
अस्मानेवाभिकर्षन्तो दीनान्मुदितमानसाः ||
११ ख
दुर्योधन उवाच:
ततः समन्तात्पश्यामि शरजालेन वेष्टितम् |
१२ क
दुर्योधन उवाच:
अमानुषाणि चास्त्राणि प्रय़ुञ्जानं धनञ्जय़म् ||
१२ ख
दुर्योधन उवाच:
समावृता दिशो दृष्ट्वा पाण्डवेन शितैः शरैः |
१३ क
दुर्योधन उवाच:
धनञ्जय़सखात्मानं दर्शय़ामास वै तदा ||
१३ ख
दुर्योधन उवाच:
चित्रसेनः पाण्डवेन समाश्लिष्य परन्तपः |
१४ क
दुर्योधन उवाच:
कुशलं परिपप्रच्छ तैः पृष्टश्चाप्यनामय़म् ||
१४ ख
दुर्योधन उवाच:
ते समेत्य तथान्योन्यं संनाहान्विप्रमुच्य च |
१५ क
दुर्योधन उवाच:
एकीभूतास्ततो वीरा गन्धर्वाः सह पाण्डवैः |
१५ ख
दुर्योधन उवाच:
अपूजय़ेतामन्योन्यं चित्रसेनधनञ्जय़ौ ||
१५ ग