chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय २४
युधिष्ठिर उवाच:
श्राद्धकाले च दैवे च धर्मे चापि पितामह |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
इच्छामीह त्वय़ाख्यातं विहितं यत्सुरर्षिभिः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
दैवं पूर्वाह्णिके कुर्यादपराह्णे तु पैतृकम् |
२ क
भीष्म उवाच:
मङ्गलाचारसम्पन्नः कृतशौचः प्रय़त्नवान् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
मनुष्याणां तु मध्याह्ने प्रदद्यादुपपत्तितः |
३ क
भीष्म उवाच:
कालहीनं तु यद्दानं तं भागं रक्षसां विदुः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
लङ्घितं चावलीढं च कलिपूर्वं च यत्कृतम् |
४ क
भीष्म उवाच:
रजस्वलाभिर्दृष्टं च तं भागं रक्षसां विदुः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
अवघुष्टं च यद्भुक्तमव्रतेन च भारत |
५ क
भीष्म उवाच:
परामृष्टं शुना चैव तं भागं रक्षसां विदुः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
केशकीटावपतितं क्षुतं श्वभिरवेक्षितम् |
६ क
भीष्म उवाच:
रुदितं चावधूतं च तं भागं रक्षसां विदुः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
निरोङ्कारेण यद्भुक्तं सशस्त्रेण च भारत |
७ क
भीष्म उवाच:
दुरात्मना च यद्भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
परोच्छिष्टं च यद्भुक्तं परिभुक्तं च यद्भवेत् |
८ क
भीष्म उवाच:
दैवे पित्र्ये च सततं तं भागं रक्षसां विदुः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
गर्हितं निन्दितं चैव परिविष्टं समन्युना |
९ क
भीष्म उवाच:
दैवं वाप्यथ वा पैत्र्यं तं भागं रक्षसां विदुः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
मन्त्रहीनं क्रिय़ाहीनं यच्छ्राद्धं परिविष्यते |
१० क
भीष्म उवाच:
त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदुः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
आज्याहुतिं विना चैव यत्किञ्चित्परिविष्यते |
११ क
भीष्म उवाच:
दुराचारैश्च यद्भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ये भागा रक्षसां प्रोक्तास्त उक्ता भरतर्षभ |
१२ क
भीष्म उवाच:
अत ऊर्ध्वं विसर्गस्य परीक्षां व्राह्मणे शृणु ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च |
१३ क
भीष्म उवाच:
दैवे वाप्यथ वा पित्र्ये राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
श्वित्री कुष्ठी च क्लीवश्च तथा यक्ष्महतश्च यः |
१४ क
भीष्म उवाच:
अपस्मारी च यश्चान्धो राजन्नार्हन्ति सत्कृतिम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
चिकित्सका देवलका वृथानिय़मधारिणः |
१५ क
भीष्म उवाच:
सोमविक्रय़िणश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
गाय़ना नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा |
१६ क
भीष्म उवाच:
कथका योधकाश्चैव राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
होतारो वृषलानां च वृषलाध्यापकास्तथा |
१७ क
भीष्म उवाच:
तथा वृषलशिष्याश्च राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
अनुय़ोक्ता च यो विप्रो अनुय़ुक्तश्च भारत |
१८ क
भीष्म उवाच:
नार्हतस्तावपि श्राद्धं व्रह्मविक्रय़िणौ हि तौ ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अग्रणीर्यः कृतः पूर्वं वर्णावरपरिग्रहः |
१९ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणः सर्वविद्योऽपि राजन्नार्हति केतनम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अनग्नय़श्च ये विप्रा मृतनिर्यातकाश्च ये |
२० क
भीष्म उवाच:
स्तेनाश्च पतिताश्चैव राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्च भारत |
२१ क
भीष्म उवाच:
पुत्रिकापूर्वपुत्राश्च श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
ऋणकर्ता च यो राजन्यश्च वार्धुषिको द्विजः |
२२ क
भीष्म उवाच:
प्राणिविक्रय़वृत्तिश्च राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीपूर्वाः काण्डपृष्ठाश्च यावन्तो भरतर्षभ |
२३ क
भीष्म उवाच:
अजपा व्राह्मणाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
श्राद्धे दैवे च निर्दिष्टा व्राह्मणा भरतर्षभ |
२४ क
भीष्म उवाच:
दातुः प्रतिग्रहीतुश्च शृणुष्वानुग्रहं पुनः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
चीर्णव्रता गुणैर्युक्ता भवेय़ुर्येऽपि कर्षकाः |
२५ क
भीष्म उवाच:
सावित्रीज्ञाः क्रिय़ावन्तस्ते राजन्केतनक्षमाः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
क्षात्रधर्मिणमप्याजौ केतय़ेत्कुलजं द्विजम् |
२६ क
भीष्म उवाच:
न त्वेव वणिजं तात श्राद्धेषु परिकल्पय़ेत् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
अग्निहोत्री च यो विप्रो ग्रामवासी च यो भवेत् |
२७ क
भीष्म उवाच:
अस्तेनश्चातिथिज्ञश्च स राजन्केतनक्षमः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
सावित्रीं जपते यस्तु त्रिकालं भरतर्षभ |
२८ क
भीष्म उवाच:
भिक्षावृत्तिः क्रिय़ावांश्च स राजन्केतनक्षमः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
उदितास्तमितो यश्च तथैवास्तमितोदितः |
२९ क
भीष्म उवाच:
अहिंस्रश्चाल्पदोषश्च स राजन्केतनक्षमः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
अकल्कको ह्यतर्कश्च व्राह्मणो भरतर्षभ |
३० क
भीष्म उवाच:
ससञ्ज्ञो भैक्ष्यवृत्तिश्च स राजन्केतनक्षमः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
अव्रती कितवः स्तेनः प्राणिविक्रय़्यथो वणिक् |
३१ क
भीष्म उवाच:
पश्चाच्च पीतवान्सोमं स राजन्केतनक्षमः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
अर्जय़ित्वा धनं पूर्वं दारुणैः कृषिकर्मभिः |
३२ क
भीष्म उवाच:
भवेत्सर्वातिथिः पश्चात्स राजन्केतनक्षमः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मविक्रय़निर्दिष्टं स्त्रिय़ा यच्चार्जितं धनम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
अदेय़ं पितृदेवेभ्यो यच्च क्लैव्यादुपार्जितम् ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
क्रिय़माणेऽपवर्गे तु यो द्विजो भरतर्षभ |
३४ क
भीष्म उवाच:
न व्याहरति यद्युक्तं तस्याधर्मो गवानृतम् ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
श्राद्धस्य व्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा |
३५ क
भीष्म उवाच:
सोमक्षय़श्च मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
श्राद्धापवर्गे विप्रस्य स्वधा वै स्वदिता भवेत् |
३६ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़स्याप्यथो व्रूय़ात्प्रीय़न्तां पितरस्त्विति ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
अपवर्गे तु वैश्यस्य श्राद्धकर्मणि भारत |
३७ क
भीष्म उवाच:
अक्षय़्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
पुण्याहवाचनं दैवे व्राह्मणस्य विधीय़ते |
३८ क
भीष्म उवाच:
एतदेव निरोङ्कारं क्षत्रिय़स्य विधीय़ते |
३८ ख
भीष्म उवाच:
वैश्यस्य चैव वक्तव्यं प्रीय़न्तां देवता इति ||
३८ ग
भीष्म उवाच:
कर्मणामानुपूर्वीं च विधिपूर्वकृतं शृणु |
३९ क
भीष्म उवाच:
जातकर्मादिकान्सर्वांस्त्रिषु वर्णेषु भारत |
३९ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मक्षत्रे हि मन्त्रोक्ता वैश्यस्य च युधिष्ठिर ||
३९ ग
भीष्म उवाच:
विप्रस्य रशना मौञ्जी मौर्वी राजन्यगामिनी |
४० क
भीष्म उवाच:
वाल्वजीत्येव वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ||
४० ख
भीष्म उवाच:
दातुः प्रतिग्रहीतुश्च धर्माधर्माविमौ शृणु |
४१ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणस्यानृतेऽधर्मः प्रोक्तः पातकसञ्ज्ञितः |
४१ ख
भीष्म उवाच:
चतुर्गुणः क्षत्रिय़स्य वैश्यस्याष्टगुणः स्मृतः ||
४१ ग
भीष्म उवाच:
नान्यत्र व्राह्मणोऽश्नीय़ात्पूर्वं विप्रेण केतितः |
४२ क
भीष्म उवाच:
यवीय़ान्पशुहिंसाय़ां तुल्यधर्मो भवेत्स हि ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
अथ राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नीय़ात्तु केतितः |
४३ क
भीष्म उवाच:
यवीय़ान्पशुहिंसाय़ां भागार्धं समवाप्नुय़ात् ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
दैवं वाप्यथ वा पित्र्यं योऽश्नीय़ाद्व्राह्मणादिषु |
४४ क
भीष्म उवाच:
अस्नातो व्राह्मणो राजंस्तस्याधर्मो गवानृतम् ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
आशौचो व्राह्मणो राजन्योऽश्नीय़ाद्व्राह्मणादिषु |
४५ क
भीष्म उवाच:
ज्ञानपूर्वमथो लोभात्तस्याधर्मो गवानृतम् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
अन्नेनान्नं च यो लिप्सेत्कर्मार्थं चैव भारत |
४६ क
भीष्म उवाच:
आमन्त्रय़ति राजेन्द्र तस्याधर्मोऽनृतं स्मृतम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
अवेदव्रतचारित्रास्त्रिभिर्वर्णैर्युधिष्ठिर |
४७ क
भीष्म उवाच:
मन्त्रवत्परिविष्यन्ते तेष्वधर्मो गवानृतम् ||
४७ ख
युधिष्ठिर उवाच:
पित्र्यं वाप्यथ वा दैवं दीय़ते यत्पितामह |
४८ क
युधिष्ठिर उवाच:
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं दत्तं येषु महाफलम् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
येषां दाराः प्रतीक्षन्ते सुवृष्टिमिव कर्षकाः |
४९ क