chevron_left कर्ण पर्व अध्याय २४
दुर्योधन उवाच:
भूय़ एव तु मद्रेश यत्ते वक्ष्यामि तच्छृणु |
१ क
दुर्योधन उवाच:
यथा पुरा वृत्तमिदं युद्धे देवासुरे विभो ||
१ ख
दुर्योधन उवाच:
यदुक्तवान्पितुर्मह्यं मार्कण्डेय़ो महानृषिः |
२ क
दुर्योधन उवाच:
तदशेषेण व्रुवतो मम राजर्षिसत्तम |
२ ख
दुर्योधन उवाच:
त्वं निवोध न चाप्यत्र कर्तव्या ते विचारणा ||
२ ग
दुर्योधन उवाच:
देवानामसुराणां च महानासीत्समागमः |
३ क
दुर्योधन उवाच:
वभूव प्रथमो राजन्सङ्ग्रामस्तारकामय़ः |
३ ख
दुर्योधन उवाच:
निर्जिताश्च तदा दैत्या दैवतैरिति नः श्रुतम् ||
३ ग
दुर्योधन उवाच:
निर्जितेषु च दैत्येषु तारकस्य सुतास्त्रय़ः |
४ क
दुर्योधन उवाच:
ताराक्षः कमलाक्षश्च विद्युन्माली च पार्थिव ||
४ ख
दुर्योधन उवाच:
तप उग्रं समास्थाय़ निय़मे परमे स्थिताः |
५ क
दुर्योधन उवाच:
तपसा कर्शय़ामासुर्देहान्स्वाञ्शत्रुतापन ||
५ ख
दुर्योधन उवाच:
दमेन तपसा चैव निय़मेन च पार्थिव |
६ क
दुर्योधन उवाच:
तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरान् ||
६ ख
दुर्योधन उवाच:
अवध्यत्वं च ते राजन्सर्वभूतेषु सर्वदा |
७ क
दुर्योधन उवाच:
सहिता वरय़ामासुः सर्वलोकपितामहम् ||
७ ख
दुर्योधन उवाच:
तानव्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरीश्वरः |
८ क
दुर्योधन उवाच:
नास्ति सर्वामरत्वं हि निवर्तध्वमतोऽसुराः |
८ ख
दुर्योधन उवाच:
वरमन्यं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते ||
८ ग
दुर्योधन उवाच:
ततस्ते सहिता राजन्सम्प्रधार्यासकृद्वहु |
९ क
दुर्योधन उवाच:
सर्वलोकेश्वरं वाक्यं प्रणम्यैनमथाव्रुवन् ||
९ ख
दुर्योधन उवाच:
अस्माकं त्वं वरं देव प्रय़च्छेमं पितामह |
१० क
दुर्योधन उवाच:
वय़ं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय़ महीमिमाम् |
१० ख
दुर्योधन उवाच:
विचरिष्याम लोकेऽस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृताः ||
१० ग
दुर्योधन उवाच:
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्यामः परस्परम् |
११ क
दुर्योधन उवाच:
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ ||
११ ख
दुर्योधन उवाच:
समागतानि चैतानि यो हन्याद्भगवंस्तदा |
१२ क
दुर्योधन उवाच:
एकेषुणा देववरः स नो मृत्युर्भविष्यति |
१२ ख
दुर्योधन उवाच:
एवमस्त्विति तान्देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम् ||
१२ ग
दुर्योधन उवाच:
ते तु लव्धवराः प्रीताः सम्प्रधार्य परस्परम् |
१३ क
दुर्योधन उवाच:
पुरत्रय़विसृष्ट्यर्थं मय़ं वव्रुर्महासुरम् |
१३ ख
दुर्योधन उवाच:
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ||
१३ ग
दुर्योधन उवाच:
ततो मय़ः स्वतपसा चक्रे धीमान्पुराणि ह |
१४ क
दुर्योधन उवाच:
त्रीणि काञ्चनमेकं तु रौप्यं कार्ष्णाय़सं तथा ||
१४ ख
दुर्योधन उवाच:
काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम् |
१५ क
दुर्योधन उवाच:
आय़सं चाभवद्भूमौ चक्रस्थं पृथिवीपते ||
१५ ख
दुर्योधन उवाच:
एकैकं योजनशतं विस्ताराय़ामसंमितम् |
१६ क
दुर्योधन उवाच:
गृहाट्टाट्टालकय़ुतं वृहत्प्राकारतोरणम् ||
१६ ख
दुर्योधन उवाच:
गुणप्रसवसम्वाधमसम्वाधमनामय़म् |
१७ क
दुर्योधन उवाच:
प्रासादैर्विविधैश्चैव द्वारैश्चाप्युपशोभितम् ||
१७ ख
दुर्योधन उवाच:
पुरेषु चाभवन्राजन्राजानो वै पृथक्पृथक् |
१८ क
दुर्योधन उवाच:
काञ्चनं तारकाक्षस्य चित्रमासीन्महात्मनः |
१८ ख
दुर्योधन उवाच:
राजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आय़सम् ||
१८ ग
दुर्योधन उवाच:
त्रय़स्ते दैत्यराजानस्त्रीँल्लोकानाशु तेजसा |
१९ क
दुर्योधन उवाच:
आक्रम्य तस्थुर्वर्षाणां पूगान्नाम प्रजापतिः ||
१९ ख
दुर्योधन उवाच:
तेषां दानवमुख्यानां प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
२० क
दुर्योधन उवाच:
कोट्यश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्ततस्ततः |
२० ख
दुर्योधन उवाच:
महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिताः ||
२० ग
दुर्योधन उवाच:
सर्वेषां च पुनस्तेषां सर्वय़ोगवहो मय़ः |
२१ क
दुर्योधन उवाच:
तमाश्रित्य हि ते सर्वे अवर्तन्ताकुतोभय़ाः ||
२१ ख
दुर्योधन उवाच:
यो हि यं मनसा कामं दध्यौ त्रिपुरसंश्रय़ः |
२२ क
दुर्योधन उवाच:
तस्मै कामं मय़स्तं तं विदधे माय़या तदा ||
२२ ख
दुर्योधन उवाच:
तारकाक्षसुतश्चासीद्धरिर्नाम महावलः |
२३ क
दुर्योधन उवाच:
तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत्पितामहः ||
२३ ख
दुर्योधन उवाच:
स तुष्टमवृणोद्देवं वापी भवतु नः पुरे |
२४ क
दुर्योधन उवाच:
शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्वलवत्तराः ||
२४ ख
दुर्योधन उवाच:
स तु लव्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरिः |
२५ क
दुर्योधन उवाच:
ससृजे तत्र वापीं तां मृतानां जीवनीं प्रभो ||
२५ ख
दुर्योधन उवाच:
येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह |
२६ क
दुर्योधन उवाच:
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान् ||
२६ ख
दुर्योधन उवाच:
तां प्राप्य त्रैपुरस्थास्तु सर्वाँल्लोकान्ववाधिरे |
२७ क
दुर्योधन उवाच:
महता तपसा सिद्धाः सुराणां भय़वर्धनाः |
२७ ख
दुर्योधन उवाच:
न तेषामभवद्राजन्क्षय़ो युद्धे कथञ्चन ||
२७ ग
दुर्योधन उवाच:
ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतसः |
२८ क
दुर्योधन उवाच:
निर्ह्रीकाः संस्थितिं सर्वे स्थापितां समलूलुपन् ||
२८ ख
दुर्योधन उवाच:
विद्राव्य सगणान्देवांस्तत्र तत्र तदा तदा |
२९ क
दुर्योधन उवाच:
विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ||
२९ ख
दुर्योधन उवाच:
देवारण्यानि सर्वाणि प्रिय़ाणि च दिवौकसाम् |
३० क
दुर्योधन उवाच:
ऋषीणामाश्रमान्पुण्यान्यूपाञ्जनपदांस्तथा |
३० ख
दुर्योधन उवाच:
व्यनाशय़न्त मर्यादा दानवा दुष्टचारिणः ||
३० ग
दुर्योधन उवाच:
ते देवाः सहिताः सर्वे पितामहमरिन्दम |
३१ क
दुर्योधन उवाच:
अभिजग्मुस्तदाख्यातुं विप्रकारं सुरेतरैः ||
३१ ख
दुर्योधन उवाच:
ते तत्त्वं सर्वमाख्याय़ शिरसाभिप्रणम्य च |
३२ क
दुर्योधन उवाच:
वधोपाय़मपृच्छन्त भगवन्तं पितामहम् ||
३२ ख
दुर्योधन उवाच:
श्रुत्वा तद्भगवान्देवो देवानिदमुवाच ह |
३३ क
दुर्योधन उवाच:
असुराश्च दुरात्मानस्ते चापि विवुधद्विषः |
३३ ख
दुर्योधन उवाच:
अपराध्यन्ति सततं ये युष्मान्पीडय़न्त्युत ||
३३ ग
दुर्योधन उवाच:
अहं हि तुल्यः सर्वेषां भूतानां नात्र संशय़ः |
३४ क
दुर्योधन उवाच:
अधार्मिकास्तु हन्तव्या इत्यहं प्रव्रवीमि वः ||
३४ ख
दुर्योधन उवाच:
ते यूय़ं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् |
३५ क
दुर्योधन उवाच:
योद्धारं वृणुतादित्याः स तान्हन्ता सुरेतरान् ||
३५ ख
दुर्योधन उवाच:
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः |
३६ क
दुर्योधन उवाच:
व्रह्माणमग्रतः कृत्वा वृषाङ्कं शरणं यय़ुः ||
३६ ख
दुर्योधन उवाच:
तपः परं समातस्थुर्गृणन्तो व्रह्म शाश्वतम् |
३७ क
दुर्योधन उवाच:
ऋषिभिः सह धर्मज्ञा भवं सर्वात्मना गताः ||
३७ ख
दुर्योधन उवाच:
तुष्टुवुर्वाग्भिरर्थ्याभिर्भय़ेष्वभय़कृत्तमम् |
३८ क
दुर्योधन उवाच:
सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना ||
३८ ख
दुर्योधन उवाच:
तपोविशेषैर्वहुभिर्योगं यो वेद चात्मनः |
३९ क
दुर्योधन उवाच:
यः साङ्ख्यमात्मनो वेद यस्य चात्मा वशे सदा ||
३९ ख
दुर्योधन उवाच:
ते तं ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् |
४० क
दुर्योधन उवाच:
अनन्यसदृशं लोके व्रतवन्तमकल्मषम् ||
४० ख
दुर्योधन उवाच:
एकं च भगवन्तं ते नानारूपमकल्पय़न् |
४१ क
दुर्योधन उवाच:
आत्मनः प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि |
४१ ख
दुर्योधन उवाच:
परस्परस्य चापश्यन्सर्वे परमविस्मिताः ||
४१ ग
दुर्योधन उवाच:
सर्वभूतमय़ं चेशं तमजं जगतः पतिम् |
४२ क
दुर्योधन उवाच:
देवा व्रह्मर्षय़श्चैव शिरोभिर्धरणीं गताः ||
४२ ख
दुर्योधन उवाच:
तान्स्वस्तिवाक्येनाभ्यर्च्य समुत्थाप्य च शङ्करः |
४३ क
दुर्योधन उवाच:
व्रूत व्रूतेति भगवान्स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||
४३ ख
दुर्योधन उवाच:
त्र्यम्वकेणाभ्यनुज्ञातास्ततस्तेऽस्वस्थचेतसः |
४४ क
दुर्योधन उवाच:
नमो नमस्तेऽस्तु विभो तत इत्यव्रुवन्भवम् ||
४४ ख