देवदूत उवाच:
महर्षेऽकार्यवुद्धिस्त्वं यः स्वर्गसुखमुत्तमम् |
१ क
देवदूत उवाच:
सम्प्राप्तं वहु मन्तव्यं विमृशस्यवुधो यथा ||
१ ख
देवदूत उवाच:
उपरिष्टादसौ लोको योऽय़ं स्वरिति सञ्ज्ञितः |
२ क
देवदूत उवाच:
ऊर्ध्वगः सत्पथः शश्वद्देवय़ानचरो मुने ||
२ ख
देवदूत उवाच:
नातप्ततपसः पुंसो नामहाय़ज्ञय़ाजिनः |
३ क
देवदूत उवाच:
नानृता नास्तिकाश्चैव तत्र गच्छन्ति मुद्गल ||
३ ख
देवदूत उवाच:
धर्मात्मानो जितात्मानः शान्ता दान्ता विमत्सराः |
४ क
देवदूत उवाच:
दानधर्मरताः पुंसः शूराश्चाहतलक्षणाः ||
४ ख
देवदूत उवाच:
तत्र गच्छन्ति कर्माग्र्यं कृत्वा शमदमात्मकम् |
५ क
देवदूत उवाच:
लोकान्पुण्यकृतां व्रह्मन्सद्भिरासेवितान्नृभिः ||
५ ख
देवदूत उवाच:
देवाः साध्यास्तथा विश्वे मरुतश्च महर्षिभिः |
६ क
देवदूत उवाच:
यामा धामाश्च मौद्गल्य गन्धर्वाप्सरसस्तथा ||
६ ख
देवदूत उवाच:
एषां देवनिकाय़ानां पृथक्पृथगनेकशः |
७ क
देवदूत उवाच:
भास्वन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमय़ाः शुभाः ||
७ ख
देवदूत उवाच:
त्रय़स्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानां हिरण्मय़ः |
८ क
देवदूत उवाच:
मेरुः पर्वतराड्यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ||
८ ख
देवदूत उवाच:
नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणाम् |
९ क
देवदूत उवाच:
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णभय़ं तथा ||
९ ख
देवदूत उवाच:
वीभत्समशुभं वापि रोगा वा तत्र केचन |
१० क
देवदूत उवाच:
मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ||
१० ख
देवदूत उवाच:
शव्दाः श्रुतिमनोग्राह्याः सर्वतस्तत्र वै मुने |
११ क
देवदूत उवाच:
न शोको न जरा तत्र नाय़ासपरिदेवने ||
११ ख
देवदूत उवाच:
ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः |
१२ क
देवदूत उवाच:
सुकृतैस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ||
१२ ख
देवदूत उवाच:
तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् |
१३ क
देवदूत उवाच:
कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ||
१३ ख
देवदूत उवाच:
न च स्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च |
१४ क
देवदूत उवाच:
तेषां न च रजो वस्त्रं वाधते तत्र वै मुने ||
१४ ख
देवदूत उवाच:
न म्लाय़न्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः |
१५ क
देवदूत उवाच:
पर्युह्यन्ते विमानैश्च व्रह्मन्नेवंविधाश्च ते ||
१५ ख
देवदूत उवाच:
ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः |
१६ क
देवदूत उवाच:
सुखं स्वर्गजितस्तत्र वर्तय़न्ति महामुने ||
१६ ख
देवदूत उवाच:
तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव |
१७ क
देवदूत उवाच:
उपर्युपरि शक्रस्य लोका दिव्यगुणान्विताः ||
१७ ख
देवदूत उवाच:
पुरस्ताद्व्रह्मणस्तत्र लोकास्तेजोमय़ाः शुभाः |
१८ क
देवदूत उवाच:
यत्र यान्त्यृषय़ो व्रह्मन्पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ||
१८ ख
देवदूत उवाच:
ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः |
१९ क
देवदूत उवाच:
तेषां लोकाः परतरे तान्यजन्तीह देवताः ||
१९ ख
देवदूत उवाच:
स्वय़म्प्रभास्ते भास्वन्तो लोकाः कामदुघाः परे |
२० क
देवदूत उवाच:
न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ||
२० ख
देवदूत उवाच:
न वर्तय़न्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः |
२१ क
देवदूत उवाच:
तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तय़ः ||
२१ ख
देवदूत उवाच:
न सुखे सुखकामाश्च देवदेवाः सनातनाः |
२२ क
देवदूत उवाच:
न कल्पपरिवर्तेषु परिवर्तन्ति ते तथा ||
२२ ख
देवदूत उवाच:
जरा मृत्युः कुतस्तेषां हर्षः प्रीतिः सुखं न च |
२३ क
देवदूत उवाच:
न दुःखं न सुखं चापि रागद्वेषौ कुतो मुने ||
२३ ख
देवदूत उवाच:
देवानामपि मौद्गल्य काङ्क्षिता सा गतिः परा |
२४ क
देवदूत उवाच:
दुष्प्रापा परमा सिद्धिरगम्या कामगोचरैः ||
२४ ख
देवदूत उवाच:
त्रय़स्त्रिंशदिमे लोकाः शेषा लोका मनीषिभिः |
२५ क
देवदूत उवाच:
गम्यन्ते निय़मैः श्रेष्ठैर्दानैर्वा विधिपूर्वकैः ||
२५ ख
देवदूत उवाच:
सेय़ं दानकृता व्युष्टिरत्र प्राप्ता सुखावहा |
२६ क
देवदूत उवाच:
तां भुङ्क्ष्व सुकृतैर्लव्धां तपसा द्योतितप्रभः ||
२६ ख
देवदूत उवाच:
एतत्स्वर्गसुखं विप्र लोका नानाविधास्तथा |
२७ क
देवदूत उवाच:
गुणाः स्वर्गस्य प्रोक्तास्ते दोषानपि निवोध मे ||
२७ ख
देवदूत उवाच:
कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत्फलं दिवि |
२८ क
देवदूत उवाच:
न चान्यत्क्रिय़ते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ||
२८ ख
देवदूत उवाच:
सोऽत्र दोषो मम मतस्तस्यान्ते पतनं च यत् |
२९ क
देवदूत उवाच:
सुखव्याप्तमनस्कानां पतनं यच्च मुद्गल ||
२९ ख
देवदूत उवाच:
असन्तोषः परीतापो दृष्ट्वा दीप्ततराः श्रिय़ः |
३० क
देवदूत उवाच:
यद्भवत्यवरे स्थाने स्थितानां तच्च दुष्करम् ||
३० ख
देवदूत उवाच:
सञ्ज्ञामोहश्च पततां रजसा च प्रधर्षणम् |
३१ क
देवदूत उवाच:
प्रम्लानेषु च माल्येषु ततः पिपतिषोर्भय़म् ||
३१ ख
देवदूत उवाच:
आ व्रह्मभवनादेते दोषा मौद्गल्य दारुणाः |
३२ क
देवदूत उवाच:
नाकलोके सुकृतिनां गुणास्त्वय़ुतशो नृणाम् ||
३२ ख
देवदूत उवाच:
अय़ं त्वन्यो गुणः श्रेष्ठश्च्युतानां स्वर्गतो मुने |
३३ क
देवदूत उवाच:
शुभानुशय़योगेन मनुष्येषूपजाय़ते ||
३३ ख
देवदूत उवाच:
तत्रापि सुमहाभागः सुखभागभिजाय़ते |
३४ क
देवदूत उवाच:
न चेत्सम्वुध्यते तत्र गच्छत्यधमतां ततः ||
३४ ख
देवदूत उवाच:
इह यत्क्रिय़ते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते |
३५ क
देवदूत उवाच:
कर्मभूमिरिय़ं व्रह्मन्फलभूमिरसौ मता ||
३५ ख
देवदूत उवाच:
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि मुद्गल |
३६ क
देवदूत उवाच:
तवानुकम्पय़ा साधो साधु गच्छाम माचिरम् ||
३६ ख
व्यास उवाच:
एतच्छ्रुत्वा तु मौद्गल्यो वाक्यं विममृशे धिय़ा |
३७ क
व्यास उवाच:
विमृश्य च मुनिश्रेष्ठो देवदूतमुवाच ह ||
३७ ख
व्यास उवाच:
देवदूत नमस्तेऽस्तु गच्छ तात यथासुखम् |
३८ क
व्यास उवाच:
महादोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा ||
३८ ख
व्यास उवाच:
पतनं तन्महद्दुःखं परितापः सुदारुणः |
३९ क
व्यास उवाच:
स्वर्गभाजश्च्यवन्तीह तस्मात्स्वर्गं न कामय़े ||
३९ ख
व्यास उवाच:
यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा |
४० क
व्यास उवाच:
तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गय़िष्यामि केवलम् ||
४० ख
व्यास उवाच:
इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम् |
४१ क
व्यास उवाच:
शिलोञ्छवृत्तिमुत्सृज्य शममातिष्ठदुत्तमम् ||
४१ ख
व्यास उवाच:
तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः |
४२ क
व्यास उवाच:
ज्ञानय़ोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो वभूव ह ||
४२ ख
व्यास उवाच:
ध्यानय़ोगाद्वलं लव्ध्वा प्राप्य चर्द्धिमनुत्तमाम् |
४३ क
व्यास उवाच:
जगाम शाश्वतीं सिद्धिं परां निर्वाणलक्षणाम् ||
४३ ख
व्यास उवाच:
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय़ न शोकं कर्तुमर्हसि |
४४ क
व्यास उवाच:
राज्यात्स्फीतात्परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ||
४४ ख
व्यास उवाच:
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् |
४५ क
व्यास उवाच:
पर्याय़ेणोपवर्तन्ते नरं नेमिमरा इव ||
४५ ख
व्यास उवाच:
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम |
४६ क
व्यास उवाच:
वर्षात्त्रय़ोदशादूर्ध्वं व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
४६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवमुक्त्वा स भगवान्व्यासः पाण्डवनन्दनम् |
४७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
जगाम तपसे धीमान्पुनरेवाश्रमं प्रति ||
४७ ख