युधिष्ठिर उवाच:
इदं मे तत्त्वतो राजन्वक्तुमर्हसि भारत |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
अहिंसय़ित्वा केनेह व्रह्महत्या विधीय़ते ||
१ ख
भीष्म उवाच:
व्यासमामन्त्र्य राजेन्द्र पुरा यत्पृष्टवानहम् |
२ क
भीष्म उवाच:
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ||
२ ख
भीष्म उवाच:
चतुर्थस्त्वं वसिष्ठस्य तत्त्वमाख्याहि मे मुने |
३ क
भीष्म उवाच:
अहिंसय़ित्वा केनेह व्रह्महत्या विधीय़ते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
इति पृष्टो महाराज पराशरशरीरजः |
४ क
भीष्म उवाच:
अव्रवीन्निपुणो धर्मे निःसंशय़मनुत्तमम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणं स्वय़माहूय़ भिक्षार्थे कृशवृत्तिनम् |
५ क
भीष्म उवाच:
व्रूय़ान्नास्तीति यः पश्चात्तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत |
६ क
भीष्म उवाच:
वृत्तिं हरति दुर्वुद्धिस्तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
गोकुलस्य तृषार्तस्य जलार्थे वसुधाधिप |
७ क
भीष्म उवाच:
उत्पादय़ति यो विघ्नं तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक्षास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् |
८ क
भीष्म उवाच:
दूषय़त्यनभिज्ञाय़ तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे |
९ क
भीष्म उवाच:
न प्रय़च्छति यः कन्यां तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अधर्मनिरतो मूढो मिथ्या यो वै द्विजातिषु |
१० क
भीष्म उवाच:
दद्यान्मर्मातिगं शोकं तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
चक्षुषा विप्रहीनस्य पङ्गुलस्य जडस्य वा |
११ क
भीष्म उवाच:
हरेत यो वै सर्वस्वं तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
आश्रमे वा वने वा यो ग्रामे वा यदि वा पुरे |
१२ क
भीष्म उवाच:
अग्निं समुत्सृजेन्मोहात्तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
१२ ख