वैशम्पाय़न उवाच:
स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य भारत |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
देशं किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम् ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
महता संनिपातेन क्षत्रिय़ान्तकरेण ह |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
व्यजय़त्पाण्डवश्रेष्ठः करे चैव न्यवेशय़त् ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यकरक्षितम् |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पाकशासनिरव्यग्रः सहसैन्यः समासदत् ||
३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तांस्तु सान्त्वेन निर्जित्य मानसं सर उत्तमम् |
४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ऋषिकुल्याश्च ताः सर्वा ददर्श कुरुनन्दनः ||
४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः |
५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गन्धर्वरक्षितं देशं व्यजय़त्पाण्डवस्ततः ||
५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तत्र तित्तिरिकल्माषान्मण्डूकाक्षान्हय़ोत्तमान् |
६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
लेभे स करमत्यन्तं गन्धर्वनगरात्तदा ||
६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
उत्तरं हरिवर्षं तु समासाद्य स पाण्डवः |
७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
इय़ेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः ||
७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तत एनं महाकाय़ा महावीर्या महावलाः |
८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमव्रुवन् ||
८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पार्थ नेदं त्वय़ा शक्यं पुरं जेतुं कथञ्चन |
९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत ||
९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
इदं पुरं यः प्रविशेद्ध्रुवं स न भवेन्नरः |
१० क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रीय़ामहे त्वय़ा वीर पर्याप्तो विजय़स्तव ||
१० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
न चापि किञ्चिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते |
११ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उत्तराः कुरवो ह्येते नात्र युद्धं प्रवर्तते ||
११ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रविष्टश्चापि कौन्तेय़ नेह द्रक्ष्यसि किञ्चन |
१२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
न हि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम् ||
१२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अथेह पुरुषव्याघ्र किञ्चिदन्यच्चिकीर्षसि |
१३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तद्व्रवीहि करिष्यामो वचनात्तव भारत ||
१३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततस्तानव्रवीद्राजन्नर्जुनः पाकशासनिः |
१४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः ||
१४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
न प्रवेक्ष्यामि वो देशं वाध्यत्वं यदि मानुषैः |
१५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
युधिष्ठिराय़ यत्किञ्चित्करवन्नः प्रदीय़ताम् ||
१५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च |
१६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
मोकाजिनानि दिव्यानि तस्मै ते प्रददुः करम् ||
१६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं स पुरुषव्याघ्रो विजिग्ये दिशमुत्तराम् |
१७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सङ्ग्रामान्सुवहून्कृत्वा क्षत्रिय़ैर्दस्युभिस्तथा ||
१७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स विनिर्जित्य राज्ञस्तान्करे च विनिवेश्य ह |
१८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धनान्यादाय़ सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ||
१८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
हय़ांस्तित्तिरिकल्माषाञ्शुकपत्रनिभानपि |
१९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
मय़ूरसदृशांश्चान्यान्सर्वाननिलरंहसः ||
१९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वृतः सुमहता राजन्वलेन चतुरङ्गिणा |
२० क
वैशम्पाय़न उवाच:
आजगाम पुनर्वीरः शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ||
२० ख