chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २५३
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१ क
भीष्म उवाच:
तुलाधारस्य वाक्यानि धर्मे जाजलिना सह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
वने वनचरः कश्चिज्जाजलिर्नाम वै द्विजः |
२ क
भीष्म उवाच:
सागरोद्देशमागम्य तपस्तेपे महातपाः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
निय़तो निय़ताहारश्चीराजिनजटाधरः |
३ क
भीष्म उवाच:
मलपङ्कधरो धीमान्वहून्वर्षगणान्मुनिः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स कदाचिन्महातेजा जलवासो महीपते |
४ क
भीष्म उवाच:
चचार लोकान्विप्रर्षिः प्रेक्षमाणो मनोजवः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
स चिन्तय़ामास मुनिर्जलमध्ये कदाचन |
५ क
भीष्म उवाच:
विप्रेक्ष्य सागरान्तां वै महीं सवनकाननाम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
न मय़ा सदृशोऽस्तीह लोके स्थावरजङ्गमे |
६ क
भीष्म उवाच:
अप्सु वैहाय़सं गच्छेन्मय़ा योऽन्यः सहेति वै ||
६ ख
भीष्म उवाच:
स दृश्यमानो रक्षोभिर्जलमध्येऽवदत्ततः |
७ क
भीष्म उवाच:
अव्रुवंश्च पिशाचास्तं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तुलाधारो वणिग्धर्मा वाराणस्यां महाय़शाः |
८ क
भीष्म उवाच:
सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं द्विजसत्तम ||
८ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तो जाजलिर्भूतैः प्रत्युवाच महातपाः |
९ क
भीष्म उवाच:
पश्येय़ं तमहं प्राज्ञं तुलाधारं यशस्विनम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
इति व्रुवाणं तमृषिं रक्षांस्युद्धृत्य सागरात् |
१० क
भीष्म उवाच:
अव्रुवन्गच्छ पन्थानमास्थाय़ेमं द्विजोत्तम ||
१० ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तो जाजलिर्भूतैर्जगाम विमनास्तदा |
११ क
भीष्म उवाच:
वाराणस्यां तुलाधारं समासाद्याव्रवीद्वचः ||
११ ख
युधिष्ठिर उवाच:
किं कृतं सुकृतं कर्म तात जाजलिना पुरा |
१२ क
युधिष्ठिर उवाच:
येन सिद्धिं परां प्राप्तस्तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अतीव तपसा युक्तो घोरेण स वभूव ह |
१३ क
भीष्म उवाच:
नद्युपस्पर्शनरतः साय़ं प्रातर्महातपाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
अग्नीन्परिचरन्सम्यक्स्वाध्याय़परमो द्विजः |
१४ क
भीष्म उवाच:
वानप्रस्थविधानज्ञो जाजलिर्ज्वलितः श्रिय़ा ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
सत्ये तपसि तिष्ठन्स न च धर्ममवैक्षत |
१५ क
भीष्म उवाच:
वर्षास्वाकाशशाय़ी स हेमन्ते जलसंश्रय़ः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
वतातपसहो ग्रीष्मे न च धर्ममविन्दत |
१६ क
भीष्म उवाच:
दुःखशय़्याश्च विविधा भूमौ च परिवर्तनम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततः कदाचित्स मुनिर्वर्षास्वाकाशमास्थितः |
१७ क
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षाज्जलं मूर्ध्ना प्रत्यगृह्णान्मुहुर्मुहुः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
अथ तस्य जटाः क्लिन्ना वभूवुर्ग्रथिताः प्रभो |
१८ क
भीष्म उवाच:
अरण्यगमनान्नित्यं मलिनो मलसंय़ुताः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
स कदाचिन्निराहारो वाय़ुभक्षो महातपाः |
१९ क
भीष्म उवाच:
तस्थौ काष्ठवदव्यग्रो न चचाल च कर्हिचित् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तस्य स्म स्थाणुभूतस्य निर्विचेष्टस्य भारत |
२० क
भीष्म उवाच:
कुलिङ्गशकुनौ राजन्नीडं शिरसि चक्रतुः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
स तौ दय़ावान्विप्रर्षिरुपप्रैक्षत दम्पती |
२१ क
भीष्म उवाच:
कुर्वाणं नीडकं तत्र जटासु तृणतन्तुभिः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
यदा स न चलत्येव स्थाणुभूतो महातपाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
ततस्तौ परिविश्वस्तौ सुखं तत्रोषतुस्तदा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
अतीतास्वथ वर्षासु शरत्काल उपस्थिते |
२३ क
भीष्म उवाच:
प्राजापत्येन विधिना विश्वासात्काममोहितौ ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तत्रापातय़तां राजञ्शिरस्यण्डानि खेचरौ |
२४ क
भीष्म उवाच:
तान्यवुध्यत तेजस्वी स विप्रः संशितव्रतः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
वुद्ध्वा च स महातेजा न चचालैव जाजलिः |
२५ क
भीष्म उवाच:
धर्मे धृतमना नित्यं नाधर्मं स त्वरोचय़त् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अहन्यहनि चागम्य ततस्तौ तस्य मूर्धनि |
२६ क
भीष्म उवाच:
आश्वासितौ वै वसतः सम्प्रहृष्टौ तदा विभो ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्रजाय़न्त शकुन्तकाः |
२७ क
भीष्म उवाच:
व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
स रक्षमाणस्त्वण्डानि कुलिङ्गानां यतव्रतः |
२८ क
भीष्म उवाच:
तथैव तस्थौ धर्मात्मा निर्विचेष्टः समाहितः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तु कालसमय़े वभूवुस्तेऽथ पक्षिणः |
२९ क
भीष्म उवाच:
वुवुधे तांश्च स मुनिर्जातपक्षाञ्शकुन्तकान् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
ततः कदाचित्तांस्तत्र पश्यन्पक्षीन्यतव्रतः |
३० क
भीष्म उवाच:
वभूव परमप्रीतस्तदा मतिमतां वरः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
तथा तानभिसंवृद्धान्दृष्ट्वा चाप्नुवतां मुदम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
शकुनौ निर्भय़ौ तत्र ऊषतुश्चात्मजैः सह ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
जातपक्षांश्च सोऽपश्यदुड्डीनान्पुनरागतान् |
३२ क
भीष्म उवाच:
साय़ं साय़ं द्विजान्विप्रो न चाकम्पत जाजलिः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
कदाचित्पुनरभ्येत्य पुनर्गच्छन्ति सन्ततम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
त्यक्ता मातृपितृभ्यां ते न चाकम्पत जाजलिः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
अथ ते दिवसं चारीं गत्वा साय़ं पुनर्नृप |
३४ क
भीष्म उवाच:
उपावर्तन्त तत्रैव निवासार्थं शकुन्तकाः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
कदाचिद्दिवसान्पञ्च समुत्पत्य विहङ्गमाः |
३५ क
भीष्म उवाच:
षष्ठेऽहनि समाजग्मुर्न चाकम्पत जाजलिः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
क्रमेण च पुनः सर्वे दिवसानि वहून्यपि |
३६ क
भीष्म उवाच:
नोपावर्तन्त शकुना जातप्राणाः स्म ते यदा ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
कदाचिन्मासमात्रेण समुत्पत्य विहङ्गमाः |
३७ क
भीष्म उवाच:
नैवागच्छंस्ततो राजन्प्रातिष्ठत स जाजलिः ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तेषु प्रलीनेषु जाजलिर्जातविस्मय़ः |
३८ क
भीष्म उवाच:
सिद्धोऽस्मीति मतिं चक्रे ततस्तं मान आविशत् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
स तथा निर्गतान्दृष्ट्वा शकुन्तान्निय़तव्रतः |
३९ क
भीष्म उवाच:
सम्भावितात्मा सम्भाव्य भृशं प्रीतस्तदाभवन् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
स नद्यां समुपस्पृश्य तर्पय़ित्वा हुताशनम् |
४० क
भीष्म उवाच:
उदय़न्तमथादित्यमभ्यगच्छन्महातपाः ||
४० ख
भीष्म उवाच:
सम्भाव्य चटकान्मूर्ध्नि जाजलिर्जपतां वरः |
४१ क
भीष्म उवाच:
आस्फोटय़त्तदाकाशे धर्मः प्राप्तो मय़ेति वै ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
अथान्तरिक्षे वागासीत्तां स शुश्राव जाजलिः |
४२ क
भीष्म उवाच:
धर्मेण न समस्त्वं वै तुलाधारस्य जाजले ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
वाराणस्यां महाप्राज्ञस्तुलाधारः प्रतिष्ठितः |
४३ क
भीष्म उवाच:
सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं भाषसे द्विज ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
सोऽमर्षवशमापन्नस्तुलाधारदिदृक्षय़ा |
४४ क
भीष्म उवाच:
पृथिवीमचरद्राजन्यत्रसाय़ङ्गृहो मुनिः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
कालेन महतागच्छत्स तु वाराणसीं पुरीम् |
४५ क
भीष्म उवाच:
विक्रीणन्तं च पण्यानि तुलाधारं ददर्श सः ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
सोऽपि दृष्ट्वैव तं विप्रमाय़ान्तं भाण्डजीवनः |
४६ क
भीष्म उवाच:
समुत्थाय़ सुसंहृष्टः स्वागतेनाभ्यपूजय़त् ||
४६ ख
तुलाधार उवाच:
आय़ानेवासि विदितो मम व्रह्मन्न संशय़ः |
४७ क
तुलाधार उवाच:
व्रवीमि यत्तु वचनं तच्छृणुष्व द्विजोत्तम ||
४७ ख
तुलाधार उवाच:
सागरानूपमाश्रित्य तपस्तप्तं त्वय़ा महत् |
४८ क
तुलाधार उवाच:
न च धर्मस्य सञ्ज्ञां त्वं पुरा वेत्थ कथञ्चन ||
४८ ख
तुलाधार उवाच:
ततः सिद्धस्य तपसा तव विप्र शकुन्तकाः |
४९ क
तुलाधार उवाच:
क्षिप्रं शिरस्यजाय़न्त ते च सम्भावितास्त्वय़ा ||
४९ ख
तुलाधार उवाच:
जातपक्षा यदा ते च गताश्चारीमितस्ततः |
५० क
तुलाधार उवाच:
मन्यमानस्ततो धर्मं चटकप्रभवं द्विज |
५० ख