chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २५४
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः स तदा तेन तुलाधारेण धीमता |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रोवाच वचनं धीमाञ्जाजलिर्जपतां वरः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
विक्रीणानः सर्वरसान्सर्वगन्धांश्च वाणिज |
२ क
भीष्म उवाच:
वनस्पतीनोषधीश्च तेषां मूलफलानि च ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अध्यगा नैष्ठिकीं वुद्धिं कुतस्त्वामिदमागतम् |
३ क
भीष्म उवाच:
एतदाचक्ष्व मे सर्वं निखिलेन महामते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तुलाधारो व्राह्मणेन यशस्विना |
४ क
भीष्म उवाच:
उवाच धर्मसूक्ष्माणि वैश्यो धर्मार्थतत्त्ववित् |
४ ख
भीष्म उवाच:
जाजलिं कष्टतपसं ज्ञानतृप्तस्तदा नृप ||
४ ग
भीष्म उवाच:
वेदाहं जाजले धर्मं सरहस्यं सनातनम् |
५ क
भीष्म उवाच:
सर्वभूतहितं मैत्रं पुराणं यं जना विदुः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः |
६ क
भीष्म उवाच:
या वृत्तिः स परो धर्मस्तेन जीवामि जाजले ||
६ ख
भीष्म उवाच:
परिच्छिन्नैः काष्ठतृणैर्मय़ेदं शरणं कृतम् |
७ क
भीष्म उवाच:
अलक्तं पद्मकं तुङ्गं गन्धांश्चोच्चावचांस्तथा ||
७ ख
भीष्म उवाच:
रसांश्च तांस्तान्विप्रर्षे मद्यवर्जानहं वहून् |
८ क
भीष्म उवाच:
क्रीत्वा वै प्रतिविक्रीणे परहस्तादमाय़या ||
८ ख
भीष्म उवाच:
सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः |
९ क
भीष्म उवाच:
कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ||
९ ख
भीष्म उवाच:
नाहं परेषां कर्माणि प्रशंसामि शपामि वा |
१० क
भीष्म उवाच:
आकाशस्येव विप्रर्षे पश्यँल्लोकस्य चित्रताम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
नानुरुध्ये विरुध्ये वा न द्वेष्मि न च कामय़े |
११ क
भीष्म उवाच:
समोऽस्मि सर्वभूतेषु पश्य मे जाजले व्रतम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
इष्टानिष्टविमुक्तस्य प्रीतिरागवहिष्कृतः |
१२ क
भीष्म उवाच:
तुला मे सर्वभूतेषु समा तिष्ठति जाजले ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
इति मां त्वं विजानीहि सर्वलोकस्य जाजले |
१३ क
भीष्म उवाच:
समं मतिमतां श्रेष्ठ समलोष्टाश्मकाञ्चनम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथान्धवधिरोन्मत्ता उच्छ्वासपरमाः सदा |
१४ क
भीष्म उवाच:
देवैरपिहितद्वाराः सोपमा पश्यतो मम ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यथा वृद्धातुरकृशा निःस्पृहा विषय़ान्प्रति |
१५ क
भीष्म उवाच:
तथार्थकामभोगेषु ममापि विगता स्पृहा ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
यदा चाय़ं न विभेति यदा चास्मान्न विभ्यति |
१६ क
भीष्म उवाच:
यदा नेच्छति न द्वेष्टि तदा सिध्यति वै द्विजः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
कर्मणा मनसा वाचा व्रह्म सम्पद्यते तदा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
न भूतो न भविष्यश्च न च धर्मोऽस्ति कश्चन |
१८ क
भीष्म उवाच:
योऽभय़ः सर्वभूतानां स प्राप्नोत्यभय़ं पदम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
यस्मादुद्विजते लोकः सर्वो मृत्युमुखादिव |
१९ क
भीष्म उवाच:
वाक्क्रूराद्दण्डपारुष्यात्स प्राप्नोति महद्भय़म् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
यथावद्वर्तमानानां वृद्धानां पुत्रपौत्रिणाम् |
२० क
भीष्म उवाच:
अनुवर्तामहे वृत्तमहिंस्राणां महात्मनाम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
प्रनष्टः शाश्वतो धर्मः सदाचारेण मोहितः |
२१ क
भीष्म उवाच:
तेन वैद्यस्तपस्वी वा वलवान्वा विमोह्यते ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
आचाराज्जाजले प्राज्ञः क्षिप्रं धर्ममवाप्नुय़ात् |
२२ क
भीष्म उवाच:
एवं यः साधुभिर्दान्तश्चरेदद्रोहचेतसा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
नद्यां यथा चेह काष्ठमुह्यमानं यदृच्छय़ा |
२३ क
भीष्म उवाच:
यदृच्छय़ैव काष्ठेन सन्धिं गच्छेत केनचित् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तत्रापराणि दारूणि संसृज्यन्ते ततस्ततः |
२४ क
भीष्म उवाच:
तृणकाष्ठकरीषाणि कदा चिन्नसमीक्षय़ा |
२४ ख
भीष्म उवाच:
एवमेवाय़माचारः प्रादुर्भूतो यतस्ततः ||
२४ ग
भीष्म उवाच:
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किञ्चित्कथञ्चन |
२५ क
भीष्म उवाच:
अभय़ं सर्वभूतेभ्यः स प्राप्नोति सदा मुने ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
यस्मादुद्विजते विद्वन्सर्वलोको वृकादिव |
२६ क
भीष्म उवाच:
क्रोशतस्तीरमासाद्य यथा सर्वे जलेचराः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
सहाय़वान्द्रव्यवान्यः सुभगोऽन्योऽपरस्तथा |
२७ क
भीष्म उवाच:
ततस्तानेव कवय़ः शास्त्रेषु प्रवदन्त्युत |
२७ ख
भीष्म उवाच:
कीर्त्यर्थमल्पहृल्लेखाः पटवः कृत्स्ननिर्णय़ाः ||
२७ ग
भीष्म उवाच:
तपोभिर्यज्ञदानैश्च वाक्यैः प्रज्ञाश्रितैस्तथा |
२८ क
भीष्म उवाच:
प्राप्नोत्यभय़दानस्य यद्यत्फलमिहाश्नुते ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
लोके यः सर्वभूतेभ्यो ददात्यभय़दक्षिणाम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
स सर्वय़ज्ञैरीजानः प्राप्नोत्यभय़दक्षिणाम् |
२९ ख
भीष्म उवाच:
न भूतानामहिंसाय़ा ज्याय़ान्धर्मोऽस्ति कश्चन ||
२९ ग
भीष्म उवाच:
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किञ्चित्कथञ्चन |
३० क
भीष्म उवाच:
सोऽभय़ं सर्वभूतेभ्यः सम्प्राप्नोति महामुने ||
३० ख
भीष्म उवाच:
यस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद्वेश्मगतादिव |
३१ क
भीष्म उवाच:
न स धर्ममवाप्नोति इह लोके परत्र च ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
सर्वभूतात्मभूतस्य सम्यग्भूतानि पश्यतः |
३२ क
भीष्म उवाच:
देवापि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
दानं भूताभय़स्याहुः सर्वदानेभ्य उत्तमम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
व्रवीमि ते सत्यमिदं श्रद्दधस्व च जाजले ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
स एव सुभगो भूत्वा पुनर्भवति दुर्भगः |
३४ क
भीष्म उवाच:
व्यापत्तिं कर्मणां दृष्ट्वा जुगुप्सन्ति जनाः सदा ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
अकारणो हि नेहास्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले |
३५ क
भीष्म उवाच:
भूतभव्यार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
सूक्ष्मत्वान्न स विज्ञातुं शक्यते वहुनिह्नवः |
३६ क
भीष्म उवाच:
उपलभ्यान्तरा चान्यानाचारानववुध्यते ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
ये च छिन्दन्ति वृषणान्ये च भिन्दन्ति नस्तकान् |
३७ क
भीष्म उवाच:
वहन्ति महतो भारान्वध्नन्ति दमय़न्ति च ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
हत्वा सत्त्वानि खादन्ति तान्कथं न विगर्हसे |
३८ क
भीष्म उवाच:
मानुषा मानुषानेव दासभोगेन वुञ्जते ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
वधवन्धविरोधेन कारय़न्ति दिवानिशम् |
३९ क
भीष्म उवाच:
आत्मना चापि जानासि यद्दुःखं वधताडने ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
पञ्चेन्द्रिय़ेषु भूतेषु सर्वं वसति दैवतम् |
४० क
भीष्म उवाच:
आदित्यश्चन्द्रमा वाय़ुर्व्रह्मा प्राणः क्रतुर्यमः ||
४० ख
भीष्म उवाच:
तानि जीवानि विक्रीय़ का मृतेषु विचारणा |
४१ क
भीष्म उवाच:
का तैले का घृते व्रह्मन्मधुन्यप्स्वौषधेषु वा ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
अदंशमशके देशे सुखं संवर्धितान्पशून् |
४२ क
भीष्म उवाच:
तांश्च मातुः प्रिय़ाञ्जानन्नाक्रम्य वहुधा नराः |
४२ ख
भीष्म उवाच:
वहुदंशकुशान्देशान्नय़न्ति वहुकर्दमान् ||
४२ ग
भीष्म उवाच:
वाहसम्पीडिता धुर्याः सीदन्त्यविधिनापरे |
४३ क
भीष्म उवाच:
न मन्ये भ्रूणहत्यापि विशिष्टा तेन कर्मणा ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा च वृत्तिः सुदारुणा |
४४ क
भीष्म उवाच:
भूमिं भूमिशय़ांश्चैव हन्ति काष्ठमय़ोमुखम् |
४४ ख
भीष्म उवाच:
तथैवानडुहो युक्तान्समवेक्षस्व जाजले ||
४४ ग
भीष्म उवाच:
अघ्न्या इति गवां नाम क एनान्हन्तुमर्हति |
४५ क
भीष्म उवाच:
महच्चकाराकुशलं पृषध्रो गालभन्निव ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
ऋषय़ो यतय़ो ह्येतन्नहुषे प्रत्यवेदय़न् |
४६ क
भीष्म उवाच:
गां मातरं चाप्यवधीर्वृषभं च प्रजापतिम् |
४६ ख
भीष्म उवाच:
अकार्यं नहुषाकार्षीर्लप्स्यामस्त्वत्कृते भय़म् ||
४६ ग
भीष्म उवाच:
शतं चैकं च रोगाणां सर्वभूतेष्वपातय़न् |
४७ क