chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २५४
भीष्म उवाच:
ऋषय़स्ते महाभागाः प्रजास्वेव हि जाजले |
४७ ख
भीष्म उवाच:
भ्रूणहं नहुषं त्वाहुर्न ते होष्यामहे हविः ||
४७ ग
भीष्म उवाच:
इत्युक्त्वा ते महात्मानः सर्वे तत्त्वार्थदर्शिनः |
४८ क
भीष्म उवाच:
ऋषय़ो यतय़ः शान्तास्तरसा प्रत्यवेदय़न् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
ईदृशानशिवान्घोरानाचारानिह जाजले |
४९ क
भीष्म उवाच:
केवलाचरितत्वात्तु निपुणान्नाववुध्यसे ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
कारणाद्धर्ममन्विच्छेन्न लोकचरितं चरेत् |
५० क
भीष्म उवाच:
यो हन्याद्यश्च मां स्तौति तत्रापि शृणु जाजले ||
५० ख
भीष्म उवाच:
समौ तावपि मे स्यातां न हि मे स्तः प्रिय़ाप्रिय़े |
५१ क
भीष्म उवाच:
एतदीदृशकं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
उपपत्त्या हि सम्पन्नो यतिभिश्चैव सेव्यते |
५२ क
भीष्म उवाच:
सततं धर्मशीलैश्च नैपुण्येनोपलक्षितः ||
५२ ख