द्रौपद्यु उवाच:
अहं सैरन्ध्रिवेषेण चरन्ती राजवेश्मनि |
१ क
द्रौपद्यु उवाच:
शौचदास्मि सुदेष्णाय़ा अक्षधूर्तस्य कारणात् ||
१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
विक्रिय़ां पश्य मे तीव्रां राजपुत्र्याः परन्तप |
२ क
द्रौपद्यु उवाच:
आसे कालमुपासीना सर्वं दुःखं किलार्तवत् ||
२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अनित्या किल मर्त्यानामर्थसिद्धिर्जय़ाजय़ौ |
३ क
द्रौपद्यु उवाच:
इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तॄणामुदय़ं पुनः ||
३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
य एव हेतुर्भवति पुरुषस्य जय़ावहः |
४ क
द्रौपद्यु उवाच:
पराजय़े च हेतुः स इति च प्रतिपालय़े ||
४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा वध्यन्ति चापरे |
५ क
द्रौपद्यु उवाच:
पातय़ित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम् ||
५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
न दैवस्यातिभारोऽस्ति न दैवस्यातिवर्तनम् |
६ क
द्रौपद्यु उवाच:
इति चाप्यागमं भूय़ो दैवस्य प्रतिपालय़े ||
६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स्थितं पूर्वं जलं यत्र पुनस्तत्रैव तिष्ठति |
७ क
द्रौपद्यु उवाच:
इति पर्याय़मिच्छन्ती प्रतीक्षाम्युदय़ं पुनः ||
७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
दैवेन किल यस्यार्थः सुनीतोऽपि विपद्यते |
८ क
द्रौपद्यु उवाच:
दैवस्य चागमे यत्नस्तेन कार्यो विजानता ||
८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यत्तु मे वचनस्यास्य कथितस्य प्रय़ोजनम् |
९ क
द्रौपद्यु उवाच:
पृच्छ मां दुःखितां तत्त्वमपृष्टा वा व्रवीमि ते ||
९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
महिषी पाण्डुपुत्राणां दुहिता द्रुपदस्य च |
१० क
द्रौपद्यु उवाच:
इमामवस्थां सम्प्राप्ता का मदन्या जिजीविषेत् ||
१० ख
द्रौपद्यु उवाच:
कुरून्परिभवन्सर्वान्पाञ्चालानपि भारत |
११ क
द्रौपद्यु उवाच:
पाण्डवेय़ांश्च सम्प्राप्तो मम क्लेशो ह्यरिन्दम ||
११ ख
द्रौपद्यु उवाच:
भ्रातृभिः श्वशुरैः पुत्रैर्वहुभिः परवीरहन् |
१२ क
द्रौपद्यु उवाच:
एवं समुदिता नारी का न्वन्या दुःखिता भवेत् ||
१२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नूनं हि वालय़ा धातुर्मय़ा वै विप्रिय़ं कृतम् |
१३ क
द्रौपद्यु उवाच:
यस्य प्रसादाद्दुर्नीतं प्राप्तास्मि भरतर्षभ ||
१३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
वर्णावकाशमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम् |
१४ क
द्रौपद्यु उवाच:
यादृशो मे न तत्रासीद्दुःखे परमके तदा ||
१४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
त्वमेव भीम जानीषे यन्मे पार्थ सुखं पुरा |
१५ क
द्रौपद्यु उवाच:
साहं दासत्वमापन्ना न शान्तिमवशा लभे ||
१५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नादैविकमिदं मन्ये यत्र पार्थो धनञ्जय़ः |
१६ क
द्रौपद्यु उवाच:
भीमधन्वा महावाहुरास्ते शान्त इवानलः ||
१६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अशक्या वेदितुं पार्थ प्राणिनां वै गतिर्नरैः |
१७ क
द्रौपद्यु उवाच:
विनिपातमिमं मन्ये युष्माकमविचिन्तितम् ||
१७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्या मम मुखप्रेक्षा यूय़मिन्द्रसमाः सदा |
१८ क
द्रौपद्यु उवाच:
सा प्रेक्षे मुखमन्यासामवराणां वरा सती ||
१८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पश्य पाण्डव मेऽवस्थां यथा नार्हामि वै तथा |
१९ क
द्रौपद्यु उवाच:
युष्मासु ध्रिय़माणेषु पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्याः सागरपर्यन्ता पृथिवी वशवर्तिनी |
२० क
द्रौपद्यु उवाच:
आसीत्साद्य सुदेष्णाय़ा भीताहं वशवर्तिनी ||
२० ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्याः पुरःसरा आसन्पृष्ठतश्चानुगामिनः |
२१ क
द्रौपद्यु उवाच:
साहमद्य सुदेष्णाय़ाः पुरः पश्चाच्च गामिनी |
२१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
इदं तु दुःखं कौन्तेय़ ममासह्यं निवोध तत् ||
२१ ग
द्रौपद्यु उवाच:
या न जातु स्वय़ं पिंषे गात्रोद्वर्तनमात्मनः |
२२ क
द्रौपद्यु उवाच:
अन्यत्र कुन्त्या भद्रं ते साद्य पिंषामि चन्दनम् |
२२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पश्य कौन्तेय़ पाणी मे नैवं यौ भवतः पुरा ||
२२ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
इत्यस्य दर्शय़ामास किणवद्धौ करावुभौ |
२३ क
द्रौपद्यु उवाच:
विभेमि कुन्त्या या नाहं युष्माकं वा कदाचन |
२४ क
द्रौपद्यु उवाच:
साद्याग्रतो विराटस्य भीता तिष्ठामि किङ्करी ||
२४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
किं नु वक्ष्यति सम्राण्मां वर्णकः सुकृतो न वा |
२५ क
द्रौपद्यु उवाच:
नान्यपिष्टं हि मत्स्यस्य चन्दनं किल रोचते ||
२५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सा कीर्तय़न्ती दुःखानि भीमसेनस्य भामिनी |
२६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
रुरोद शनकैः कृष्णा भीमसेनमुदीक्षती ||
२६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सा वाष्पकलय़ा वाचा निःश्वसन्ती पुनः पुनः |
२७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
हृदय़ं भीमसेनस्य घट्टय़न्तीदमव्रवीत् ||
२७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
नाल्पं कृतं मय़ा भीम देवानां किल्विषं पुरा |
२८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अभाग्या यत्तु जीवामि मर्तव्ये सति पाण्डव ||
२८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततस्तस्याः करौ शूनौ किणवद्धौ वृकोदरः |
२९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
मुखमानीय़ वेपन्त्या रुरोद परवीरहा ||
२९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तौ गृहीत्वा च कौन्तेय़ो वाष्पमुत्सृज्य वीर्यवान् |
३० क
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः परमदुःखार्त इदं वचनमव्रवीत् ||
३० ख