मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य तत्सर्वमाचख्यौ भगिनी रामविक्रमम् |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खरदूषणसंय़ुक्तं राक्षसानां पराभवम् ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स निश्चित्य ततः कृत्यं स्वसारमुपसान्त्व्य च |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऊर्ध्वमाचक्रमे राजा विधाय़ नगरे विधिम् ||
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रिकूटं समतिक्रम्य कालपर्वतमेव च |
५३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददर्श मकरावासं गम्भीरोदं महोदधिम् ||
५३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमतीत्याथ गोकर्णमभ्यगच्छद्दशाननः |
५४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दय़ितं स्थानमव्यग्रं शूलपाणेर्महात्मनः ||
५४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्राभ्यगच्छन्मारीचं पूर्वामात्यं दशाननः |
५५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुरा रामभय़ादेव तापस्यं समुपाश्रितम् ||
५५ ख