chevron_left वन पर्व अध्याय २६१
युधिष्ठिर उवाच:
उक्तं भगवता जन्म रामादीनां पृथक्पृथक् |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
प्रस्थानकारणं व्रह्मञ्श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
कथं दाशरथी वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
प्रस्थापितौ वनं व्रह्म मैथिली च यशस्विनी ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
जातपुत्रो दशरथः प्रीतिमानभवन्नृपः |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रिय़ारतिर्धर्मपरः सततं वृद्धसेविता ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रमेण चास्य ते पुत्रा व्यवर्धन्त महौजसः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वेदेषु सरहस्येषु धनुर्वेदे च पारगाः ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चरितव्रह्मचर्यास्ते कृतदाराश्च पार्थिव |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदा तदा दशरथः प्रीतिमानभवत्सुखी ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ज्येष्ठो रामोऽभवत्तेषां रमय़ामास हि प्रजाः |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मनोहरतय़ा धीमान्पितुर्हृदय़तोषणः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः स राजा मतिमान्मत्वात्मानं वय़ोऽधिकम् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मन्त्रय़ामास सचिवैर्धर्मज्ञैश्च पुरोहितैः ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिषेकाय़ रामस्य यौवराज्येन भारत |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राप्तकालं च ते सर्वे मेनिरे मन्त्रिसत्तमाः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोहिताक्षं महावाहुं मत्तमातङ्गगामिनम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दीर्घवाहुं महोरस्कं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दीप्यमानं श्रिय़ा वीरं शक्रादनवमं वले |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पारगं सर्वधर्माणां वृहस्पतिसमं मतौ ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वानुरक्तप्रकृतिं सर्वविद्याविशारदम् |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जितेन्द्रिय़ममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निय़न्तारमसाधूनां गोप्तारं धर्मचारिणाम् |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धृतिमन्तमनाधृष्यं जेतारमपराजितम् ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुत्रं राजा दशरथः कौसल्यानन्दवर्धनम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सन्दृश्य परमां प्रीतिमगच्छत्कुरुनन्दन ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चिन्तय़ंश्च महातेजा गुणान्रामस्य वीर्यवान् |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्यभाषत भद्रं ते प्रीय़माणः पुरोहितम् ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अद्य पुष्यो निशि व्रह्मन्पुण्यं योगमुपैष्यति |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सम्भाराः सम्भ्रिय़न्तां मे रामश्चोपनिमन्त्र्यताम् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इति तद्राजवचनं प्रतिश्रुत्याथ मन्थरा |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कैकेय़ीमभिगम्येदं काले वचनमव्रवीत् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अद्य कैकेय़ि दौर्भाग्यं राज्ञा ते ख्यापितं महत् |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आशीविषस्त्वां सङ्क्रुद्धश्चण्डो दशति दुर्भगे ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुभगा खलु कौसल्या यस्याः पुत्रोऽभिषेक्ष्यते |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुतो हि तव सौभाग्यं यस्याः पुत्रो न राज्यभाक् ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तद्वचनमाज्ञाय़ सर्वाभरणभूषिता |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वेदीविलग्नमध्येव विभ्रती रूपमुत्तमम् ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विविक्ते पतिमासाद्य हसन्तीव शुचिस्मिता |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रणय़ं व्यञ्जय़न्तीव मधुरं वाक्यमव्रवीत् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सत्यप्रतिज्ञ यन्मे त्वं काममेकं निसृष्टवान् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपाकुरुष्व तद्राजंस्तस्मान्मुच्यस्व सङ्कटात् ||
२१ ख
राजो उवाच:
वरं ददानि ते हन्त तद्गृहाण यदिच्छसि |
२२ क
राजो उवाच:
अवध्यो वध्यतां कोऽद्य वध्यः कोऽद्य विमुच्यताम् ||
२२ ख
राजो उवाच:
धनं ददानि कस्याद्य ह्रिय़तां कस्य वा पुनः |
२३ क
राजो उवाच:
व्राह्मणस्वादिहान्यत्र यत्किञ्चिद्वित्तमस्ति मे ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तद्वचनमाज्ञाय़ परिगृह्य नराधिपम् |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आत्मनो वलमाज्ञाय़ तत एनमुवाच ह ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आभिषेचनिकं यत्ते रामार्थमुपकल्पितम् |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भरतस्तदवाप्नोतु वनं गच्छतु राघवः ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तद्राजा वचः श्रुत्वा विप्रिय़ं दारुणोदय़म् |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दुःखार्तो भरतश्रेष्ठ न किञ्चिद्व्याजहार ह ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तथोक्तं पितरं रामो विज्ञाय़ वीर्यवान् |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वनं प्रतस्थे धर्मात्मा राजा सत्यो भवत्विति ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमन्वगच्छल्लक्ष्मीवान्धनुष्माँल्लक्ष्मणस्तदा |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीता च भार्या भद्रं ते वैदेही जनकात्मजा ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो वनं गते रामे राजा दशरथस्तदा |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समय़ुज्यत देहस्य कालपर्याय़धर्मणा ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामं तु गतमाज्ञाय़ राजानं च तथागतम् |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आनाय़्य भरतं देवी कैकेय़ी वाक्यमव्रवीत् ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतो दशरथः स्वर्गं वनस्थौ रामलक्ष्मणौ |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गृहाण राज्यं विपुलं क्षेमं निहतकण्टकम् ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तामुवाच स धर्मात्मा नृशंसं वत ते कृतम् |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पतिं हत्वा कुलं चेदमुत्साद्य धनलुव्धय़ा ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अय़शः पातय़ित्वा मे मूर्ध्नि त्वं कुलपांसने |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सकामा भव मे मातरित्युक्त्वा प्ररुरोद ह ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स चारित्रं विशोध्याथ सर्वप्रकृतिसंनिधौ |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्वय़ाद्भ्रातरं रामं विनिवर्तनलालसः ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेय़ीं च सुदुःखितः |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्रे प्रस्थाप्य यानैः स शत्रुघ्नसहितो यय़ौ ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वसिष्ठवामदेवाभ्यां विप्रैश्चान्यैः सहस्रशः |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पौरजानपदैः सार्धं रामानय़नकाङ्क्षय़ा ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददर्श चित्रकूटस्थं स रामं सहलक्ष्मणम् |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तापसानामलङ्कारं धारय़न्तं धनुर्धरम् ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विसर्जितः स रामेण पितुर्वचनकारिणा |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नन्दिग्रामेऽकरोद्राज्यं पुरस्कृत्यास्य पादुके ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामस्तु पुनराशङ्क्य पौरजानपदागमम् |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रविवेश महारण्यं शरभङ्गाश्रमं प्रति ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सत्कृत्य शरभङ्गं स दण्डकारण्यमाश्रितः |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नदीं गोदावरीं रम्यामाश्रित्य न्यवसत्तदा ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वसतस्तस्य रामस्य ततः शूर्पणखाकृतम् |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खरेणासीन्महद्वैरं जनस्थाननिवासिना ||
४१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रक्षार्थं तापसानां च राघवो धर्मवत्सलः |
४२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चतुर्दश सहस्राणि जघान भुवि रक्षसाम् ||
४२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दूषणं च खरं चैव निहत्य सुमहावलौ |
४३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चक्रे क्षेमं पुनर्धीमान्धर्मारण्यं स राघवः ||
४३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हतेषु तेषु रक्षःसु ततः शूर्पणखा पुनः |
४४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यय़ौ निकृत्तनासोष्ठी लङ्कां भ्रातुर्निवेशनम् ||
४४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो रावणमभ्येत्य राक्षसी दुःखमूर्छिता |
४५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पपात पादय़ोर्भ्रातुः संशुष्करुधिरानना ||
४५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तां तथा विकृतां दृष्ट्वा रावणः क्रोधमूर्छितः |
४६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्पपातासनात्क्रुद्धो दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ||
४६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वानमात्यान्विसृज्याथ विविक्ते तामुवाच सः |
४७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
केनास्येवं कृता भद्रे मामचिन्त्यावमन्य च ||
४७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कः शूलं तीक्ष्णमासाद्य सर्वगात्रैर्निषेवते |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कः शिरस्यग्निमादाय़ विश्वस्तः स्वपते सुखम् ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आशीविषं घोरतरं पादेन स्पृशतीह कः |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सिंहं केसरिणं कश्च दंष्ट्रासु स्पृश्य तिष्ठति ||
४९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवं व्रुवतस्तस्य स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निश्चेरुर्दह्यतो रात्रौ वृक्षस्येव स्वरन्ध्रतः ||
५० ख