मार्कण्डेय़ उवाच:
सखा दशरथस्यासीज्जटाय़ुररुणात्मजः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गृध्रराजो महावीर्यः सम्पातिर्यस्य सोदरः ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स ददर्श तदा सीतां रावणाङ्कगतां स्नुषाम् |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रोधादभ्यद्रवत्पक्षी रावणं राक्षसेश्वरम् ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथैनमव्रवीद्गृध्रो मुञ्च मुञ्चेति मैथिलीम् |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ध्रिय़माणे मय़ि कथं हरिष्यसि निशाचर |
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे वधूम् ||
३ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
उक्त्वैवं राक्षसेन्द्रं तं चकर्त नखरैर्भृशम् |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पक्षतुण्डप्रहारैश्च वहुशो जर्जरीकृतः |
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चक्षार रुधिरं भूरि गिरिः प्रस्रवणैरिव ||
४ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
स वध्यमानो गृध्रेण रामप्रिय़हितैषिणा |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खड्गमादाय़ चिच्छेद भुजौ तस्य पतत्रिणः ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निहत्य गृध्रराजं स छिन्नाभ्रशिखरोपमम् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऊर्ध्वमाचक्रमे सीतां गृहीत्वाङ्केन राक्षसः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यत्र यत्र तु वैदेही पश्यत्याश्रममण्डलम् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सरो वा सरितं वापि तत्र मुञ्चति भूषणम् ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा ददर्श गिरिप्रस्थे पञ्च वानरपुङ्गवान् |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र वासो महद्दिव्यमुत्ससर्ज मनस्विनी ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्तेषां वानरेन्द्राणां पपात पवनोद्धुतम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मध्ये सुपीतं पञ्चानां विद्युन्मेघान्तरे यथा ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं हृताय़ां वैदेह्यां रामो हत्वा महामृगम् |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निवृत्तो ददृशे धीमान्भ्रातरं लक्ष्मणं तदा ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथमुत्सृज्य वैदेहीं वने राक्षससेविते |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवं भ्रातरं दृष्ट्वा प्राप्तोऽसीति व्यगर्हय़त् ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मृगरूपधरेणाथ रक्षसा सोऽपकर्षणम् |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भ्रातुरागमनं चैव चिन्तय़न्पर्यतप्यत ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गर्हय़न्नेव रामस्तु त्वरितस्तं समासदत् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपि जीवति वैदेही नेति पश्यामि लक्ष्मण ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य तत्सर्वमाचख्यौ सीताय़ा लक्ष्मणो वचः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदुक्तवत्यसदृशं वैदेही पश्चिमं वचः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दह्यमानेन तु हृदा रामोऽभ्यपतदाश्रमम् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स ददर्श तदा गृध्रं निहतं पर्वतोपमम् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसं शङ्कमानस्तु विकृष्य वलवद्धनुः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्यधावत काकुत्स्थस्ततस्तं सहलक्ष्मणः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तावुवाच तेजस्वी सहितौ रामलक्ष्मणौ |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गृध्रराजोऽस्मि भद्रं वां सखा दशरथस्य ह ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सङ्गृह्य धनुषी शुभे |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कोऽय़ं पितरमस्माकं नाम्नाहेत्यूचतुश्च तौ ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो ददृशतुस्तौ तं छिन्नपक्षद्वय़ं तथा |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तय़ोः शशंस गृध्रस्तु सीतार्थे रावणाद्वधम् ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपृच्छद्राघवो गृध्रं रावणः कां दिशं गतः |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य गृध्रः शिरःकम्पैराचचक्षे ममार च ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दक्षिणामिति काकुत्स्थो विदित्वास्य तदिङ्गितम् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
संस्कारं लम्भय़ामास सखाय़ं पूजय़न्पितुः ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो दृष्ट्वाश्रमपदं व्यपविद्धवृसीघटम् |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विध्वस्तकलशं शून्यं गोमाय़ुवलसेवितम् ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दुःखशोकसमाविष्टौ वैदेहीहरणार्दितौ |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जग्मतुर्दण्डकारण्यं दक्षिणेन परन्तपौ ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वने महति तस्मिंस्तु रामः सौमित्रिणा सह |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददर्श मृगय़ूथानि द्रवमाणानि सर्वशः |
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शव्दं च घोरं सत्त्वानां दावाग्नेरिव वर्धतः ||
२४ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपश्येतां मुहूर्ताच्च कवन्धं घोरदर्शनम् |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मेघपर्वतसङ्काशं शालस्कन्धं महाभुजम् |
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उरोगतविशालाक्षं महोदरमहामुखम् ||
२५ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदृच्छय़ाथ तद्रक्षः करे जग्राह लक्ष्मणम् |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विषादमगमत्सद्यः सौमित्रिरथ भारत ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स राममभिसम्प्रेक्ष्य कृष्यते येन तन्मुखम् |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विषण्णश्चाव्रवीद्रामं पश्यावस्थामिमां मम ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हरणं चैव वैदेह्या मम चाय़मुपप्लवः |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
राज्यभ्रंशश्च भवतस्तातस्य मरणं तथा ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नाहं त्वां सह वैदेह्या समेतं कोसलागतम् |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्रक्ष्यामि पृथिवीराज्ये पितृपैतामहे स्थितम् ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्रक्ष्यन्त्यार्यस्य धन्या ये कुशलाजशमीलवैः |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिषिक्तस्य वदनं सोमं साभ्रलवं यथा ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं वहुविधं धीमान्विललाप स लक्ष्मणः |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमुवाचाथ काकुत्स्थः सम्भ्रमेष्वप्यसम्भ्रमः ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मा विषीद नरव्याघ्र नैष कश्चिन्मय़ि स्थिते |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
छिन्ध्यस्य दक्षिणं वाहुं छिन्नः सव्यो मय़ा भुजः ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवं वदता तस्य भुजो रामेण पातितः |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खड्गेन भृशतीक्ष्णेन निकृत्तस्तिलकाण्डवत् ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽस्य दक्षिणं वाहुं खड्गेनाजघ्निवान्वली |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सौमित्रिरपि सम्प्रेक्ष्य भ्रातरं राघवं स्थितम् ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुनरभ्याहनत्पार्श्वे तद्रक्षो लक्ष्मणो भृशम् |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतासुरपतद्भूमौ कवन्धः सुमहांस्ततः ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य देहाद्विनिःसृत्य पुरुषो दिव्यदर्शनः |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददृशे दिवमास्थाय़ दिवि सूर्य इव ज्वलन् ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पप्रच्छ रामस्तं वाग्मी कस्त्वं प्रव्रूहि पृच्छतः |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कामय़ा किमिदं चित्रमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्याचचक्षे गन्धर्वो विश्वावसुरहं नृप |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राप्तो व्रह्मानुशापेन योनिं राक्षससेविताम् ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणेन हृता सीता राज्ञा लङ्कानिवासिना |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवमभिगच्छस्व स ते साह्यं करिष्यति ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एषा पम्पा शिवजला हंसकारण्डवाय़ुता |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऋश्यमूकस्य शैलस्य संनिकर्षे तटाकिनी ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
संवसत्यत्र सुग्रीवश्चतुर्भिः सचिवैः सह |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भ्राता वानरराजस्य वालिनो हेममालिनः ||
४१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतावच्छक्यमस्माभिर्वक्तुं द्रष्टासि जानकीम् |
४२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ध्रुवं वानरराजस्य विदितो रावणालय़ः ||
४२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्त्वान्तर्हितो दिव्यः पुरुषः स महाप्रभः |
४३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विस्मय़ं जग्मतुश्चोभौ तौ वीरौ रामलक्ष्मणौ ||
४३ ख