मार्कण्डेय़ उवाच:
अप्येवाहं निराहारा जीवितप्रिय़वर्जिता |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शोषय़िष्यामि गात्राणि व्याली तालगता यथा ||
५० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न त्वन्यमभिगच्छेय़ं पुमांसं राघवादृते |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इति जानीत सत्यं मे क्रिय़तां यदनन्तरम् ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा राक्षस्यस्ताः खरस्वनाः |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आख्यातुं राक्षसेन्द्राय़ जग्मुस्तत्सर्वमादितः ||
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतासु तासु सर्वासु त्रिजटा नाम राक्षसी |
५३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सान्त्वय़ामास वैदेहीं धर्मज्ञा प्रिय़वादिनी ||
५३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीते वक्ष्यामि ते किञ्चिद्विश्वासं कुरु मे सखि |
५४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भय़ं ते व्येतु वामोरु शृणु चेदं वचो मम ||
५४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः |
५५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स रामस्य हितान्वेषी त्वदर्थे हि स मावदत् ||
५५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीता मद्वचनाद्वाच्या समाश्वास्य प्रसाद्य च |
५६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भर्ता ते कुशली रामो लक्ष्मणानुगतो वली ||
५६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सख्यं वानरराजेन शक्रप्रतिमतेजसा |
५७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतवान्राघवः श्रीमांस्त्वदर्थे च समुद्यतः ||
५७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मा च तेऽस्तु भय़ं भीरु रावणाल्लोकगर्हितात् |
५८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नलकूवरशापेन रक्षिता ह्यस्यनिन्दिते ||
५८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् |
५९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न शक्तो विवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रिय़ः ||
५९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सुग्रीवेणाभिरक्षितः |
६० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सौमित्रिसहितो धीमांस्त्वां चेतो मोक्षय़िष्यति ||
६० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वप्ना हि सुमहाघोरा दृष्टा मेऽनिष्टदर्शनाः |
६१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विनाशाय़ास्य दुर्वुद्धेः पौलस्त्यकुलघातिनः ||
६१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दारुणो ह्येष दुष्टात्मा क्षुद्रकर्मा निशाचरः |
६२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वभावाच्छीलदोषेण सर्वेषां भय़वर्धनः ||
६२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्पर्धते सर्वदेवैर्यः कालोपहतचेतनः |
६३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मय़ा विनाशलिङ्गानि स्वप्ने दृष्टानि तस्य वै ||
६३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तैलाभिषिक्तो विकचो मज्जन्पङ्के दशाननः |
६४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
असकृत्खरय़ुक्ते तु रथे नृत्यन्निव स्थितः ||
६४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुम्भकर्णादय़श्चेमे नग्नाः पतितमूर्धजाः |
६५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृष्यन्ते दक्षिणामाशां रक्तमाल्यानुलेपनाः ||
६५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्वेतातपत्रः सोष्णीषः शुक्लमाल्यविभूषणः |
६६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्वेतपर्वतमारूढ एक एव विभीषणः ||
६६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सचिवाश्चास्य चत्वारः शुक्लमाल्यानुलेपनाः |
६७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्वेतपर्वतमारूढा मोक्ष्यन्तेऽस्मान्महाभय़ात् ||
६७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामस्यास्त्रेण पृथिवी परिक्षिप्ता ससागरा |
६८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यशसा पृथिवीं कृत्स्नां पूरय़िष्यति ते पतिः ||
६८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अस्थिसञ्चय़मारूढो भुञ्जानो मधुपाय़सम् |
६९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लक्ष्मणश्च मय़ा दृष्टो निरीक्षन्सर्वतोदिशः ||
६९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रुदती रुधिरार्द्राङ्गी व्याघ्रेण परिरक्षिता |
७० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
असकृत्त्वं मय़ा दृष्टा गच्छन्ती दिशमुत्तराम् ||
७० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हर्षमेष्यसि वैदेहि क्षिप्रं भर्तृसमन्विता |
७१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
राघवेण सह भ्रात्रा सीते त्वमचिरादिव ||
७१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इति सा मृगशावाक्षी तच्छ्रुत्वा त्रिजटावचः |
७२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वभूवाशावती वाला पुनर्भर्तृसमागमे ||
७२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यावदभ्यागता रौद्राः पिशाच्यस्ताः सुदारुणाः |
७३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददृशुस्तां त्रिजटय़ा सहासीनां यथा पुरा ||
७३ ख