युधिष्ठिर उवाच:
वहूनां यज्ञतपसामेकार्थानां पितामह |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
धर्मार्थं न सुखार्थार्थं कथं यज्ञः समाहितः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्र ते वर्तय़िष्यामि नारदेनानुकीर्तितम् |
२ क
भीष्म उवाच:
उञ्छवृत्तेः पुरावृत्तं यज्ञार्थे व्राह्मणस्य ह ||
२ ख
भीष्म उवाच:
राष्ट्रे धर्मोत्तरे श्रेष्ठे विदर्भेष्वभवद्द्विजः |
३ क
भीष्म उवाच:
उञ्छवृत्तिरृषिः कश्चिद्यज्ञे यज्ञं समादधे ||
३ ख
भीष्म उवाच:
श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपत्नी सुवर्चला |
४ क
भीष्म उवाच:
तिक्तं च विरसं शाकं तपसा स्वादुतां गतम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
उपगम्य वने पृथ्वीं सर्वभूतविहिंसय़ा |
५ क
भीष्म उवाच:
अपि मूलफलैरिज्यो यज्ञः स्वर्ग्यः परन्तप ||
५ ख
भीष्म उवाच:
तस्य भार्या व्रतकृशा शुचिः पुष्करचारिणी |
६ क
भीष्म उवाच:
यज्ञपत्नीत्वमानीता सत्येनानुविधीय़ते |
६ ख
भीष्म उवाच:
सा तु शापपरित्रस्ता न स्वभावानुवर्तिनी ||
६ ग
भीष्म उवाच:
मय़ूरजीर्णपर्णानां वस्त्रं तस्याश्च पर्णिनाम् |
७ क
भीष्म उवाच:
अकामाय़ाः कृतं तत्र यज्ञे होत्रानुमार्गतः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
शुक्रस्य पुनराजातिरपध्यानादधर्मवित् |
८ क
भीष्म उवाच:
तस्मिन्वने समीपस्थो मृगोऽभूत्सहचारिकः |
८ ख
भीष्म उवाच:
वचोभिरव्रवीत्सत्यं त्वय़ा दुष्कृतकं कृतम् ||
८ ग
भीष्म उवाच:
यदि मन्त्राङ्गहीनोऽय़ं यज्ञो भवति वैकृतः |
९ क
भीष्म उवाच:
मां भोः प्रक्षिप होत्रे त्वं गच्छ स्वर्गमतन्द्रितः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तु यज्ञे सावित्री साक्षात्तं संन्यमन्त्रय़त् |
१० क
भीष्म उवाच:
निमन्त्रय़न्ती प्रत्युक्ता न हन्यां सहवासिनम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्ता निवृत्ता सा प्रविष्टा यज्ञपावकम् |
११ क
भीष्म उवाच:
किं नु दुश्चरितं यज्ञे दिदृक्षुः सा रसातलम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
सा तु वद्धाञ्जलिं सत्यमय़ाचद्धरिणं पुनः |
१२ क
भीष्म उवाच:
सत्येन सम्परिष्वज्य सन्दिष्टो गम्यतामिति ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ततः स हरिणो गत्वा पदान्यष्टौ न्यवर्तत |
१३ क
भीष्म उवाच:
साधु हिंसय़ मां सत्य हतो यास्यामि सद्गतिम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
पश्य ह्यप्सरसो दिव्या मय़ा दत्तेन चक्षुषा |
१४ क
भीष्म उवाच:
विमानानि विचित्राणि गन्धर्वाणां महात्मनाम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततः सुरुचिरं दृष्ट्वा स्पृहालग्नेन चक्षुषा |
१५ क
भीष्म उवाच:
मृगमालोक्य हिंसाय़ां स्वर्गवासं समर्थय़त् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
स तु धर्मो मृगो भूत्वा वहुवर्षोषितो वने |
१६ क
भीष्म उवाच:
तस्य निष्कृतिमाधत्त न ह्यसौ यज्ञसंविधिः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तस्य तेन तु भावेन मृगहिंसात्मनस्तदा |
१७ क
भीष्म उवाच:
तपो महत्समुच्छिन्नं तस्माद्धिंसा न यज्ञिय़ा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तं भगवान्धर्मो यज्ञं याजय़त स्वय़म् |
१८ क
भीष्म उवाच:
समाधानं च भार्याय़ा लेभे स तपसा परम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अहिंसा सकलो धर्मो हिंसा यज्ञेऽसमाहिता |
१९ क
भीष्म उवाच:
सत्यं तेऽहं प्रवक्ष्यामि यो धर्मः सत्यवादिनाम् ||
१९ ख