chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २६५
युधिष्ठिर उवाच:
कथं भवति पापात्मा कथं धर्मं करोति वा |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
केन निर्वेदमादत्ते मोक्षं वा केन गच्छति ||
१ ख
भीष्म उवाच:
विदिताः सर्वधर्मास्ते स्थित्यर्थमनुपृच्छसि |
२ क
भीष्म उवाच:
शृणु मोक्षं सनिर्वेदं पापं धर्मं च मूलतः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
विज्ञानार्थं हि पञ्चानामिच्छा पूर्वं प्रवर्तते |
३ क
भीष्म उवाच:
प्राप्य ताञ्जाय़ते कामो द्वेषो वा भरतर्षभ ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते पुनः |
४ क
भीष्म उवाच:
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च चिकीर्षति ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततो रागः प्रभवति द्वेषश्च तदनन्तरम् |
५ क
भीष्म उवाच:
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
लोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च |
६ क
भीष्म उवाच:
न धर्मे जाय़ते वुद्धिर्व्याजाद्धर्मं करोति च ||
६ ख
भीष्म उवाच:
व्याजेन चरतो धर्ममर्थव्याजोऽपि रोचते |
७ क
भीष्म उवाच:
व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु कुरुनन्दन ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तत्रैव कुरुते वुद्धिं ततः पापं चिकीर्षति |
८ क
भीष्म उवाच:
सुहृद्भिर्वार्यमाणोऽपि पण्डितैश्चापि भारत ||
८ ख
भीष्म उवाच:
उत्तरं न्याय़सम्वद्धं व्रवीति विधिय़ोजितम् |
९ क
भीष्म उवाच:
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागमोहजः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
पापं चिन्तय़ते चैव प्रव्रवीति करोति च |
१० क
भीष्म उवाच:
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य दोषान्पश्यन्ति साधवः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
एकशीलाश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः |
११ क
भीष्म उवाच:
स नेह सुखमाप्नोति कुत एव परत्र वै ||
११ ख
भीष्म उवाच:
एवं भवति पापात्मा धर्मात्मानं तु मे शृणु |
१२ क
भीष्म उवाच:
यथा कुशलधर्मा स कुशलं प्रतिपद्यते ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
य एतान्प्रज्ञय़ा दोषान्पूर्वमेवानुपश्यति |
१३ क
भीष्म उवाच:
कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्युपसेवते ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते |
१४ क
भीष्म उवाच:
प्रज्ञा धर्मे च रमते धर्मं चैवोपजीवति ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
सोऽथ धर्मादवाप्तेषु धनेषु कुरुते मनः |
१५ क
भीष्म उवाच:
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान्पश्यति यत्र वै ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
स मित्रधनलाभात्तु प्रेत्य चेह च नन्दति ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
शव्दे स्पर्शे तथा रूपे रसे गन्धे च भारत |
१७ क
भीष्म उवाच:
प्रभुत्वं लभते जन्तुर्धर्मस्यैतत्फलं विदुः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
स धर्मस्य फलं लव्ध्वा न तृप्यति युधिष्ठिर |
१८ क
भीष्म उवाच:
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
प्रज्ञाचक्षुर्यदा कामे दोषमेवानुपश्यति |
१९ क
भीष्म उवाच:
विरज्यते तदा कामान्न च धर्मं विमुञ्चति ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षय़ात्मकम् |
२० क
भीष्म उवाच:
ततो मोक्षाय़ यतते नानुपाय़ादुपाय़तः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च |
२१ क
भीष्म उवाच:
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
२२ क
भीष्म उवाच:
पापं धर्मं तथा मोक्षं निर्वेदं चैव भारत ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तस्माद्धर्मे प्रवर्तेथाः सर्वावस्थं युधिष्ठिर |
२३ क
भीष्म उवाच:
धर्मे स्थितानां कौन्तेय़ सिद्धिर्भवति शाश्वती ||
२३ ख