chevron_left वन पर्व अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्दग्धपक्षः पतितो ह्यहमस्मिन्महागिरौ ||
४९ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यैवं वदतोऽस्माभिर्हतो भ्राता निवेदितः |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्यसनं भवतश्चेदं सङ्क्षेपाद्वै निवेदितम् ||
५० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स सम्पातिस्तदा राजञ्श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विषण्णचेताः पप्रच्छ पुनरस्मानरिन्दम ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कः स रामः कथं सीता जटाय़ुश्च कथं हतः |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इच्छामि सर्वमेवैतच्छ्रोतुं प्लवगसत्तमाः ||
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्याहं सर्वमेवैतं भवतो व्यसनागमम् |
५३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राय़ोपवेशने चैव हेतुं विस्तरतोऽव्रुवम् ||
५३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽस्मानुत्थापय़ामास वाक्येनानेन पक्षिराट् |
५४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणो विदितो मह्यं लङ्का चास्य महापुरी ||
५४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्टा पारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरे |
५५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्र विचारणा ||
५५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इति तस्य वचः श्रुत्वा वय़मुत्थाय़ सत्वराः |
५६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सागरप्लवने मन्त्रं मन्त्रय़ामः परन्तप ||
५६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नाध्यवस्यद्यदा कश्चित्सागरस्य विलङ्घने |
५७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः पितरमाविश्य पुप्लुवेऽहं महार्णवम् |
५७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शतय़ोजनविस्तीर्णं निहत्य जलराक्षसीम् ||
५७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र सीता मय़ा दृष्टा रावणान्तःपुरे सती |
५८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपवासतपःशीला भर्तृदर्शनलालसा |
५८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
जटिला मलदिग्धाङ्गी कृशा दीना तपस्विनी ||
५८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
निमित्तैस्तामहं सीतामुपलभ्य पृथग्विधैः |
५९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपसृत्याव्रुवं चार्यामभिगम्य रहोगताम् ||
५९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीते रामस्य दूतोऽहं वानरो मारुतात्मजः |
६० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वद्दर्शनमभिप्रेप्सुरिह प्राप्तो विहाय़सा ||
६० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राजपुत्रौ कुशलिनौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ |
६१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वशाखामृगेन्द्रेण सुग्रीवेणाभिपालितौ ||
६१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुशलं त्वाव्रवीद्रामः सीते सौमित्रिणा सह |
६२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सखिभावाच्च सुग्रीवः कुशलं त्वानुपृच्छति ||
६२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सर्वशाखामृगैः सह |
६३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ||
६३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा सीता मां प्रत्युवाच ह |
६४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवैमि त्वां हनूमन्तमविन्ध्यवचनादहम् ||
६४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अविन्ध्यो हि महावाहो राक्षसो वृद्धसंमतः |
६५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथितस्तेन सुग्रीवस्त्वद्विधैः सचिवैर्वृतः ||
६५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गम्यतामिति चोक्त्वा मां सीता प्रादादिमं मणिम् |
६६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धारिता येन वैदेही कालमेतमनिन्दिता ||
६६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रत्ययार्थं कथां चेमां कथय़ामास जानकी |
६७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षिप्तामिषीकां काकस्य चित्रकूटे महागिरौ |
६७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भवता पुरुषव्याघ्र प्रत्यभिज्ञानकारणात् ||
६७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रावय़ित्वा तदात्मानं ततो दग्ध्वा च तां पुरीम् |
६८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सम्प्राप्त इति तं रामः प्रिय़वादिनमर्चय़त् ||
६८ ख