वैशम्पाय़न उवाच:
ततः कुमारविषय़े श्रेणिमन्तमथाजय़त् |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कोसलाधिपतिं चैव वृहद्वलमरिन्दमः ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अय़ोध्याय़ां तु धर्मज्ञं दीर्घप्रज्ञं महावलम् |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अजय़त्पाण्डवश्रेष्ठो नातितीव्रेण कर्मणा ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो गोपालकच्छं च सोत्तमानपि चोत्तरान् |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं व्यजय़त्प्रभुः ||
३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो हिमवतः पार्श्वे समभ्येत्य जरद्गवम् |
४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशे वली ||
४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं वहुविधान्देशान्विजित्य पुरुषर्षभः |
५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उन्नाटमभितो जिग्ये कुक्षिमन्तं च पर्वतम् |
५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पाण्डवः सुमहावीर्यो वलेन वलिनां वरः ||
५ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
स काशिराजं समरे सुवन्धुमनिवर्तिनम् |
६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वशे चक्रे महावाहुर्भीमो भीमपराक्रमः ||
६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं क्रथम् |
७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
युध्यमानं वलात्सङ्ख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः ||
७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो मत्स्यान्महातेजा मलय़ांश्च महावलान् |
८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अनवद्यान्गय़ांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः ||
८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
निवृत्य च महावाहुर्मदर्वीकं महीधरम् |
९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सोपदेशं विनिर्जित्य प्रय़यावुत्तरामुखः |
९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वत्सभूमिं च कौन्तेय़ो विजिग्ये वलवान्वलात् ||
९ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा |
१० क
वैशम्पाय़न उवाच:
विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान्वहून् ||
१० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पाण्डवः |
११ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तरसैवाजय़द्भीमो नातितीव्रेण कर्मणा ||
११ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
शर्मकान्वर्मकांश्चैव सान्त्वेनैवाजय़त्प्रभुः |
१२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् |
१२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा ||
१२ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
वैदेहस्थस्तु कौन्तेय़ इन्द्रपर्वतमन्तिकात् |
१३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
किरातानामधिपतीन्व्यजय़त्सप्त पाण्डवः ||
१३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः सुह्मान्प्राच्यसुह्मान्समक्षांश्चैव वीर्यवान् |
१४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
विजित्य युधि कौन्तेय़ो मागधानुपय़ाद्वली ||
१४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् |
१५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तैरेव सहितः सर्वैर्गिरिव्रजमुपाद्रवत् ||
१५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
जारासन्धिं सान्त्वय़ित्वा करे च विनिवेश्य ह |
१६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तैरेव सहितो राजन्कर्णमभ्यद्रवद्वली ||
१६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स कम्पय़न्निव महीं वलेन चतुरङ्गिणा |
१७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
युय़ुधे पाण्डवश्रेष्ठः कर्णेनामित्रघातिना ||
१७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स कर्णं युधि निर्जित्य वशे कृत्वा च भारत |
१८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो विजिग्ये वलवान्राज्ञः पर्वतवासिनः ||
१८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अथ मोदागिरिं चैव राजानं वलवत्तरम् |
१९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पाण्डवो वाहुवीर्येण निजघान महामृधे ||
१९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः पौण्ड्राधिपं वीरं वासुदेवं महावलम् |
२० क
वैशम्पाय़न उवाच:
कौशिकीकच्छनिलय़ं राजानं च महौजसम् ||
२० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
उभौ वलवृतौ वीरावुभौ तीव्रपराक्रमौ |
२१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
निर्जित्याजौ महाराज वङ्गराजमुपाद्रवत् ||
२१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् |
२२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ताम्रलिप्तं च राजानं काचं वङ्गाधिपं तथा ||
२२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सुह्मानामधिपं चैव ये च सागरवासिनः |
२३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सर्वान्म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ||
२३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं वहुविधान्देशान्विजित्य पवनात्मजः |
२४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वसु तेभ्य उपादाय़ लौहित्यमगमद्वली ||
२४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स सर्वान्म्लेच्छनृपतीन्सागरद्वीपवासिनः |
२५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
करमाहारय़ामास रत्नानि विविधानि च ||
२५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमुक्तमनुत्तमम् |
२६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
काञ्चनं रजतं वज्रं विद्रुमं च महाधनम् ||
२६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स कोटिशतसङ्ख्येन धनेन महता तदा |
२७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अभ्यवर्षदमेय़ात्मा धनवर्षेण पाण्डवम् ||
२७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
इन्द्रप्रस्थमथागम्य भीमो भीमपराक्रमः |
२८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
निवेदय़ामास तदा धर्मराजाय़ तद्धनम् ||
२८ ख