उशनो उवाच:
नमस्तस्मै भगवते देवाय़ प्रभविष्णवे |
१ क
उशनो उवाच:
यस्य पृथ्वीतलं तात साकाशं वाहुगोचरम् ||
१ ख
उशनो उवाच:
मूर्धा यस्य त्वनन्तं च स्थानं दानवसत्तम |
२ क
उशनो उवाच:
तस्याहं ते प्रवक्ष्यामि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
तय़ोः संवदतोरेवमाजगाम महामुनिः |
३ क
भीष्म उवाच:
सनत्कुमारो धर्मात्मा संशय़च्छेदनाय़ वै ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स पूजितोऽसुरेन्द्रेण मुनिनोशनसा तथा |
४ क
भीष्म उवाच:
निषसादासने राजन्महार्हे मुनिपुङ्गवः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
तमासीनं महाप्राज्ञमुशना वाक्यमव्रवीत् |
५ क
भीष्म उवाच:
व्रूह्यस्मै दानवेन्द्राय़ विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
सनत्कुमारस्तु ततः श्रुत्वा प्राह वचोऽर्थवत् |
६ क
भीष्म उवाच:
विष्णोर्माहात्म्यसंय़ुक्तं दानवेन्द्राय़ धीमते ||
६ ख
भीष्म उवाच:
शृणु सर्वमिदं दैत्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् |
७ क
भीष्म उवाच:
विष्णौ जगत्स्थितं सर्वमिति विद्धि परन्तप ||
७ ख
भीष्म उवाच:
सृजत्येष महावाहो भूतग्रामं चराचरम् |
८ क
भीष्म उवाच:
एष चाक्षिपते काले काले विसृजते पुनः |
८ ख
भीष्म उवाच:
अस्मिन्गच्छन्ति विलय़मस्माच्च प्रभवन्त्युत ||
८ ग
भीष्म उवाच:
नैष दानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया |
९ क
भीष्म उवाच:
सम्प्राप्तुमिन्द्रिय़ाणां तु संय़मेनैव शक्यते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
वाह्ये चाभ्यन्तरे चैव कर्मणा मनसि स्थितः |
१० क
भीष्म उवाच:
निर्मलीकुरुते वुद्ध्या सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ||
१० ख
भीष्म उवाच:
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधय़ेत् |
११ क
भीष्म उवाच:
वहुशोऽतिप्रय़त्नेन महतात्मकृतेन ह ||
११ ख
भीष्म उवाच:
तद्वज्जातिशतैर्जीवः शुध्यतेऽल्पेन कर्मणा |
१२ क
भीष्म उवाच:
यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुध्यते ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
लीलय़ाल्पं यथा गात्रात्प्रमृज्यादात्मनो रजः |
१३ क
भीष्म उवाच:
वहु यत्नेन महता दोषनिर्हरणं तथा ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथा चाल्पेन माल्येन वासितं तिलसर्षपम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
न मुञ्चति स्वकं गन्धं तद्वत्सूक्ष्मस्य दर्शनम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तदेव वहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुनः पुनः |
१५ क
भीष्म उवाच:
विमुञ्चति स्वकं गन्धं माल्यगन्धेऽवतिष्ठति ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एवं जातिशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु |
१६ क
भीष्म उवाच:
वुद्ध्या निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन वै ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
कर्मणा स्वेन रक्तानि विरक्तानि च दानव |
१७ क
भीष्म उवाच:
यथा कर्मविशेषांश्च प्राप्नुवन्ति तथा शृणु ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
यथा च सम्प्रवर्तन्ते यस्मिंस्तिष्ठन्ति वा विभो |
१८ क
भीष्म उवाच:
तत्तेऽनुपूर्व्या व्याख्यास्ये तदिहैकमनाः शृणु ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अनादिनिधनः श्रीमान्हरिर्नाराय़णः प्रभुः |
१९ क
भीष्म उवाच:
स वै सृजति भूतानि स्थावराणि चराणि च ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
एष सर्वेषु भूतेषु क्षरश्चाक्षर एव च |
२० क
भीष्म उवाच:
एकादशविकारात्मा जगत्पिवति रश्मिभिः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
पादौ तस्य महीं विद्धि मूर्धानं दिवमेव च |
२१ क
भीष्म उवाच:
वाहवस्तु दिशो दैत्य श्रोत्रमाकाशमेव च ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
तस्य तेजोमय़ः सूर्यो मनश्चन्द्रमसि स्थितम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिर्ज्ञानगता नित्यं रसस्त्वप्सु प्रवर्तते ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
भ्रुवोरनन्तरास्तस्य ग्रहा दानवसत्तम |
२३ क
भीष्म उवाच:
नक्षत्रचक्रं नेत्राभ्यां पादय़ोर्भूश्च दानव ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
रजस्तमश्च सत्त्वं च विद्धि नाराय़णात्मकम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
सोऽऽश्रमाणां मुखं तात कर्मणस्तत्फलं विदुः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
अकर्मणः फलं चैव स एव परमव्ययः |
२५ क
भीष्म उवाच:
छन्दांसि तस्य रोमाणि अक्षरं च सरस्वती ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
वह्वाश्रय़ो वहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः |
२६ क
भीष्म उवाच:
स व्रह्मपरमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
श्रुतिशास्त्रग्रहोपेतः षोडशर्त्विक्क्रतुश्च सः |
२७ क
भीष्म उवाच:
पितामहश्च विष्णुश्च सोऽश्विनौ स पुरन्दरः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
मित्रश्च वरुणश्चैव यमोऽथ धनदस्तथा |
२८ क
भीष्म उवाच:
ते पृथग्दर्शनास्तस्य संविदन्ति तथैकताम् |
२८ ख
भीष्म उवाच:
एकस्य विद्धि देवस्य सर्वं जगदिदं वशे ||
२८ ग
भीष्म उवाच:
नानाभूतस्य दैत्येन्द्र तस्यैकत्वं वदत्ययम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
जन्तुः पश्यति ज्ञानेन ततः सत्त्वं प्रकाशते ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
संहारविक्षेपसहस्रकोटी; स्तिष्ठन्ति जीवाः प्रचरन्ति चान्ये |
३० क
भीष्म उवाच:
प्रजाविसर्गस्य च पारिमाण्यं; वापीसहस्राणि वहूनि दैत्य ||
३० ख
भीष्म उवाच:
वाप्यः पुनर्योजनविस्तृतास्ताः; क्रोशं च गम्भीरतय़ावगाढाः |
३१ क
भीष्म उवाच:
आय़ामतः पञ्चशताश्च सर्वाः; प्रत्येकशो योजनतः प्रवृद्धाः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
वाप्या जलं क्षिप्यति वालकोट्या; त्वह्ना सकृच्चाप्यथ न द्वितीय़म् |
३२ क
भीष्म उवाच:
तासां क्षय़े विद्धि कृतं विसर्गं; संहारमेकं च तथा प्रजानाम् ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
षड्जीववर्णाः परमं प्रमाणं; कृष्णो धूम्रो नीलमथास्य मध्यम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
रक्तं पुनः सह्यतरं सुखं तु; हारिद्रवर्णं सुसुखं च शुक्लम् ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं; गतक्लमं सिध्यति दानवेन्द्र |
३४ क
भीष्म उवाच:
गत्वा तु योनिप्रभवानि दैत्य; सहस्रशः सिद्धिमुपैति जीवः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
गतिं च यां दर्शनमाह देवो; गत्वा शुभं दर्शनमेव चाह |
३५ क
भीष्म उवाच:
गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां; वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
शतं सहस्राणि चतुर्दशेह; परा गतिर्जीवगुणस्य दैत्य |
३६ क
भीष्म उवाच:
आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि; स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम् ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
कृष्णस्य वर्णस्य गतिर्निकृष्टा; स मज्जते नरके पच्यमानः |
३७ क
भीष्म उवाच:
स्थानं तथा दुर्गतिभिस्तु तस्य; प्रजाविसर्गान्सुवहून्वदन्ति ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
शतं सहस्राणि ततश्चरित्वा; प्राप्नोति वर्णं हरितं तु पश्चात् |
३८ क
भीष्म उवाच:
स चैव तस्मिन्निवसत्यनीशो; युगक्षय़े तमसा संवृतात्मा ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
स वै यदा सत्त्वगुणेन युक्त; स्तमो व्यपोहन्घटते स्ववुद्ध्या |
३९ क
भीष्म उवाच:
स लोहितं वर्णमुपैति नीलो; मनुष्यलोके परिवर्तते च ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
स तत्र संहारविसर्गमेव; स्वकर्मजैर्वन्धनैः क्लिश्यमानः |
४० क
भीष्म उवाच:
ततः स हारिद्रमुपैति वर्णं; संहारविक्षेपशते व्यतीते ||
४० ख
भीष्म उवाच:
हारिद्रवर्णस्तु प्रजाविसर्गा; न्सहस्रशस्तिष्ठति सञ्चरन्वै |
४१ क
भीष्म उवाच:
अविप्रमुक्तो निरय़े च दैत्य; ततः सहस्राणि दशापराणि ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
गतीः सहस्राणि च पञ्च तस्य; चत्वारि संवर्तकृतानि चैव |
४२ क
भीष्म उवाच:
विमुक्तमेनं निरय़ाच्च विद्धि; सर्वेषु चान्येषु च सम्भवेषु ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
स देवलोके विहरत्यभीक्ष्णं; ततश्च्युतो मानुषतामुपैति |
४३ क
भीष्म उवाच:
संहारविक्षेपशतानि चाष्टौ; मर्त्येषु तिष्ठन्नमृतत्वमेति ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालय़ोगा; त्कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकष्टे |
४४ क
भीष्म उवाच:
यथा त्वय़ं सिध्यति जीवलोक; स्तत्तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
दैवानि स व्यूहशतानि सप्त; रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्लः |
४५ क
भीष्म उवाच:
संश्रित्य सन्धावति शुक्लमेत; मष्टापरानर्च्यतमान्स लोकान् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
अष्टौ च षष्टिं च शतानि यानि; मनोविरुद्धानि महाद्युतीनाम् |
४६ क
भीष्म उवाच:
शुक्लस्य वर्णस्य परा गतिर्या; त्रीण्येव रुद्धानि महानुभाव ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
संहारविक्षेपमनिष्टमेकं; चत्वारि चान्यानि वसत्यनीशः |
४७ क
भीष्म उवाच:
षष्ठस्य वर्णस्य परा गतिर्या; सिद्धा विशिष्टस्य गतक्लमस्य ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
सप्तोत्तरं तेषु वसत्यनीशः; संहारविक्षेपशतं सशेषम् |
४८ क
भीष्म उवाच:
तस्मादुपावृत्य मनुष्यलोके; ततो महान्मानुषतामुपैति ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
तस्मादुपावृत्य ततः क्रमेण; सोऽग्रे स्म सन्तिष्ठति भूतसर्गम् |
४९ क
भीष्म उवाच:
स सप्तकृत्वश्च परैति लोका; न्संहारविक्षेपकृतप्रवासः ||
४९ ख