भीष्म उवाच:
सप्तैव संहारमुपप्लवानि; सम्भाव्य सन्तिष्ठति सिद्धलोके |
५० क
भीष्म उवाच:
ततोऽव्ययं स्थानमनन्तमेति; देवस्य विष्णोरथ व्रह्मणश्च |
५० ख
भीष्म उवाच:
शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव; देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ||
५० ग
भीष्म उवाच:
संहारकाले परिदग्धकाय़ा; व्रह्माणमाय़ान्ति सदा प्रजा हि |
५१ क
भीष्म उवाच:
चेष्टात्मनो देवगणाश्च सर्वे; ये व्रह्मलोकादमराः स्म तेऽपि ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
प्रजाविसर्गं तु सशेषकालं; स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः |
५२ क
भीष्म उवाच:
निःशेषाणां तत्पदं यान्ति चान्ते; सर्वापदा ये सदृशा मनुष्याः ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
ये तु च्युताः सिद्धलोकात्क्रमेण; तेषां गतिं यान्ति तथानुपूर्व्या |
५३ क
भीष्म उवाच:
जीवाः परे तद्वलवेषरूपा; विधिं स्वकं यान्ति विपर्ययेण ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
स यावदेवास्ति सशेषभुक्ते; प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले |
५४ क
भीष्म उवाच:
तावत्तदा तेषु विशुद्धभावः; संय़म्य पञ्चेन्द्रिय़रूपमेतत् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
शुद्धां गतिं तां परमां परैति; शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन् |
५५ क
भीष्म उवाच:
ततोऽव्ययं स्थानमुपैति व्रह्म; दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै |
५५ ख
भीष्म उवाच:
इत्येतदाख्यातमहीनसत्त्व; नाराय़णस्येह वलं मय़ा ते ||
५५ ग
वृत्र उवाच:
एवं गते मे न विषादोऽस्ति कश्चि; त्सम्यक्च पश्यामि वचस्तवैतत् |
५६ क
वृत्र उवाच:
श्रुत्वा च ते वाचमदीनसत्त्व; विकल्मषोऽस्म्यद्य तथा विपाप्मा ||
५६ ख
वृत्र उवाच:
प्रवृत्तमेतद्भगवन्महर्षे; महाद्युतेश्चक्रमनन्तवीर्यम् |
५७ क
वृत्र उवाच:
विष्णोरनन्तस्य सनातनं त; त्स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः |
५७ ख
वृत्र उवाच:
स वै महात्मा पुरुषोत्तमो वै; तस्मिञ्जगत्सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ||
५७ ग
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा स कौन्तेय़ वृत्रः प्राणानवासृजत् |
५८ क
भीष्म उवाच:
योजय़ित्वा तथात्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ||
५८ ख
युधिष्ठिर उवाच:
अय़ं स भगवान्देवः पितामह जनार्दनः |
५९ क
युधिष्ठिर उवाच:
सनत्कुमारो वृत्राय़ यत्तदाख्यातवान्पुरा ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
मूलस्थाय़ी स भगवान्स्वेनानन्तेन तेजसा |
६० क
भीष्म उवाच:
तत्स्थः सृजति तान्भावान्नानारूपान्महातपाः ||
६० ख
भीष्म उवाच:
तुरीय़ार्धेन तस्येमं विद्धि केशवमच्युतम् |
६१ क
भीष्म उवाच:
तुरीय़ार्धेन लोकांस्त्रीन्भावय़त्येष वुद्धिमान् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
अर्वाक्स्थितस्तु यः स्थाय़ी कल्पान्ते परिवर्तते |
६२ क
भीष्म उवाच:
स शेते भगवानप्सु योऽसावतिवलः प्रभुः |
६२ ख
भीष्म उवाच:
तान्विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ||
६२ ग
भीष्म उवाच:
सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः; सनत्कुमारः सञ्चरते च लोकान् |
६३ क
भीष्म उवाच:
स चानिरुद्धः सृजते महात्मा; तत्स्थं जगत्सर्वमिदं विचित्रम् ||
६३ ख
युधिष्ठिर उवाच:
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः |
६४ क
युधिष्ठिर उवाच:
शुभा तस्मात्स सुखितो न शोचति पितामह ||
६४ ख
युधिष्ठिर उवाच:
शुक्लः शुक्लाभिजातीय़ः साध्यो नावर्ततेऽनघ |
६५ क
युधिष्ठिर उवाच:
तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निरय़ाच्च पितामह ||
६५ ख
युधिष्ठिर उवाच:
हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव |
६६ क
युधिष्ठिर उवाच:
तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ||
६६ ख
युधिष्ठिर उवाच:
वय़ं तु भृशमापन्ना रक्ताः कष्टमुखेऽसुखे |
६७ क
युधिष्ठिर उवाच:
कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः पाण्डवाः संशितव्रताः |
६८ क
भीष्म उवाच:
विहृत्य देवलोकेषु पुनर्मानुष्यमेष्यथ ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
प्रजाविसर्गं च सुखेन काले; प्रत्येत्य देवेषु सुखानि भुक्त्वा |
६९ क
भीष्म उवाच:
सुखेन संय़ास्यथ सिद्धसङ्ख्यां; मा वो भय़ं भूद्विमलाः स्थ सर्वे ||
६९ ख