भीष्म उवाच:
वृत्रस्य तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः |
१ क
भीष्म उवाच:
अभवन्यानि लिङ्गानि शरीरे तानि मे शृणु ||
१ ख
भीष्म उवाच:
ज्वलितास्योऽभवद्घोरो वैवर्ण्यं चागमत्परम् |
२ क
भीष्म उवाच:
गात्रकम्पश्च सुमहाञ्श्वासश्चाप्यभवन्महान् |
२ ख
भीष्म उवाच:
रोमहर्षश्च तीव्रोऽभून्निःश्वासश्च महान्नृप ||
२ ग
भीष्म उवाच:
शिवा चाशिवसङ्काशा तस्य वक्त्रात्सुदारुणा |
३ क
भीष्म उवाच:
निष्पपात महाघोरा स्मृतिः सा तस्य भारत |
३ ख
भीष्म उवाच:
उल्काश्च ज्वलितास्तस्य दीप्ताः पार्श्वे प्रपेदिरे ||
३ ग
भीष्म उवाच:
गृध्रकङ्कवडाश्चैव वाचोऽमुञ्चन्सुदारुणाः |
४ क
भीष्म उवाच:
वृत्रस्योपरि संहृष्टाश्चक्रवत्परिवभ्रमुः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तं रथमास्थाय़ देवाप्याय़ितमाहवे |
५ क
भीष्म उवाच:
वज्रोद्यतकरः शक्रस्तं दैत्यं प्रत्यवैक्षत ||
५ ख
भीष्म उवाच:
अमानुषमथो नादं स मुमोच महासुरः |
६ क
भीष्म उवाच:
व्यजृम्भत च राजेन्द्र तीव्रज्वरसमन्वितः |
६ ख
भीष्म उवाच:
अथास्य जृम्भतः शक्रस्ततो वज्रमवासृजत् ||
६ ग
भीष्म उवाच:
स वज्रः सुमहातेजाः कालाग्निसदृशोपमः |
७ क
भीष्म उवाच:
क्षिप्रमेव महाकाय़ं वृत्रं दैत्यमपातय़त् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततो नादः समभवत्पुनरेव समन्ततः |
८ क
भीष्म उवाच:
वृत्रं विनिहतं दृष्ट्वा देवानां भरतर्षभ ||
८ ख
भीष्म उवाच:
वृत्रं तु हत्वा भगवान्दानवारिर्महाय़शाः |
९ क
भीष्म उवाच:
वज्रेण विष्णुय़ुक्तेन दिवमेव समाविशत् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अथ वृत्रस्य कौरव्य शरीरादभिनिःसृता |
१० क
भीष्म उवाच:
व्रह्महत्या महाघोरा रौद्रा लोकभय़ावहा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
करालदशना भीमा विकृता कृष्णपिङ्गला |
११ क
भीष्म उवाच:
प्रकीर्णमूर्धजा चैव घोरनेत्रा च भारत ||
११ ख
भीष्म उवाच:
कपालमालिनी चैव कृशा च भरतर्षभ |
१२ क
भीष्म उवाच:
रुधिरार्द्रा च धर्मज्ञ चीरवस्त्रनिवासिनी ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
साभिनिष्क्रम्य राजेन्द्र तादृग्रूपा भय़ावहा |
१३ क
भीष्म उवाच:
वज्रिणं मृगय़ामास तदा भरतसत्तम ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
कस्यचित्त्वथ कालस्य वृत्रहा कुरुनन्दन |
१४ क
भीष्म उवाच:
स्वर्गाय़ाभिमुखः प्राय़ाल्लोकानां हितकाम्यया ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
विसान्निःसरमाणं तु दृष्ट्वा शक्रं महौजसम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
कण्ठे जग्राह देवेन्द्रं सुलग्ना चाभवत्तदा ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
स हि तस्मिन्समुत्पन्ने व्रह्महत्याकृते भय़े |
१६ क
भीष्म उवाच:
नलिन्यां विसमध्यस्थो वभूवाव्दगणान्वहून् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अनुसृत्य तु यत्नात्स तय़ा वै व्रह्महत्यया |
१७ क
भीष्म उवाच:
तदा गृहीतः कौरव्य निश्चेष्टः समपद्यत ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तस्या व्यपोहने शक्रः परं यत्नं चकार ह |
१८ क
भीष्म उवाच:
न चाशकत्तां देवेन्द्रो व्रह्महत्यां व्यपोहितुम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
गृहीत एव तु तय़ा देवेन्द्रो भरतर्षभ |
१९ क
भीष्म उवाच:
पितामहमुपागम्य शिरसा प्रत्यपूजय़त् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ज्ञात्वा गृहीतं शक्रं तु द्विजप्रवरहत्यया |
२० क
भीष्म उवाच:
व्रह्मा सञ्चिन्तय़ामास तदा भरतसत्तम ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तामुवाच महावाहो व्रह्महत्यां पितामहः |
२१ क
भीष्म उवाच:
स्वरेण मधुरेणाथ सान्त्वय़न्निव भारत ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
मुच्यतां त्रिदशेन्द्रोऽय़ं मत्प्रिय़ं कुरु भामिनि |
२२ क
भीष्म उवाच:
व्रूहि किं ते करोम्यद्य कामं कं त्वमिहेच्छसि ||
२२ ख
व्रह्महत्यो उवाच:
त्रिलोकपूजिते देवे प्रीते त्रैलोक्यकर्तरि |
२३ क
व्रह्महत्यो उवाच:
कृतमेवेह मन्येऽहं निवासं तु विधत्स्व मे ||
२३ ख
व्रह्महत्यो उवाच:
त्वय़ा कृतेय़ं मर्यादा लोकसंरक्षणार्थिना |
२४ क
व्रह्महत्यो उवाच:
स्थापना वै सुमहती त्वय़ा देव प्रवर्तिता ||
२४ ख
व्रह्महत्यो उवाच:
प्रीते तु त्वय़ि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वरे प्रभो |
२५ क
व्रह्महत्यो उवाच:
शक्रादपगमिष्यामि निवासं तु विधत्स्व मे ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
तथेति तां प्राह तदा व्रह्महत्यां पितामहः |
२६ क
भीष्म उवाच:
उपाय़तः स शक्रस्य व्रह्महत्यां व्यपोहत ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ततः स्वय़म्भुवा ध्यातस्तत्र वह्निर्महात्मना |
२७ क
भीष्म उवाच:
व्रह्माणमुपसङ्गम्य ततो वचनमव्रवीत् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
प्राप्तोऽस्मि भगवन्देव त्वत्सकाशमरिन्दम |
२८ क
भीष्म उवाच:
यत्कर्तव्यं मय़ा देव तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
२८ ख
व्रह्मो उवाच:
वहुधा विभजिष्यामि व्रह्महत्यामिमामहम् |
२९ क
व्रह्मो उवाच:
शक्रस्याद्य विमोक्षार्थं चतुर्भागं प्रतीच्छ मे ||
२९ ख
अग्निरु उवाच:
मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै व्रह्मन्ध्याय़स्व वै प्रभो |
३० क
अग्निरु उवाच:
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वतो लोकपूजित ||
३० ख
व्रह्मो उवाच:
यस्त्वां ज्वलन्तमासाद्य स्वय़ं वै मानवः क्वचित् |
३१ क
व्रह्मो उवाच:
वीजौषधिरसैर्वह्ने न यक्ष्यति तमोवृतः ||
३१ ख
व्रह्मो उवाच:
तमेषा यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति |
३२ क
व्रह्मो उवाच:
व्रह्महत्या हव्यवाह व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः प्रतिजग्राह तद्वचो हव्यकव्यभुक् |
३३ क
भीष्म उवाच:
पितामहस्य भगवांस्तथा च तदभूत्प्रभो ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
ततो वृक्षौषधितृणं समाहूय़ पितामहः |
३४ क
भीष्म उवाच:
इममर्थं महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
ततो वृक्षौषधितृणं तथैवोक्तं यथातथम् |
३५ क
भीष्म उवाच:
व्यथितं वह्निवद्राजन्व्रह्माणमिदमव्रवीत् ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
अस्माकं व्रह्महत्यातो कोऽन्तो लोकपितामह |
३६ क
भीष्म उवाच:
स्वभावनिहतानस्मान्न पुनर्हन्तुमर्हसि ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
वय़मग्निं तथा शीतं वर्षं च पवनेरितम् |
३७ क
भीष्म उवाच:
सहामः सततं देव तथा छेदनभेदनम् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्महत्यामिमामद्य भवतः शासनाद्वय़म् |
३८ क
भीष्म उवाच:
ग्रहीष्यामस्त्रिलोकेश मोक्षं चिन्तय़तां भवान् ||
३८ ख
व्रह्मो उवाच:
पर्वकाले तु सम्प्राप्ते यो वै छेदनभेदनम् |
३९ क
व्रह्मो उवाच:
करिष्यति नरो मोहात्तमेषानुगमिष्यति ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
ततो वृक्षौषधितृणमेवमुक्तं महात्मना |
४० क
भीष्म उवाच:
व्रह्माणमभिसम्पूज्य जगामाशु यथागतम् ||
४० ख
भीष्म उवाच:
आहूय़ाप्सरसो देवस्ततो लोकपितामहः |
४१ क
भीष्म उवाच:
वाचा मधुरय़ा प्राह सान्त्वय़न्निव भारत ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
इय़मिन्द्रादनुप्राप्ता व्रह्महत्या वराङ्गनाः |
४२ क
भीष्म उवाच:
चतुर्थमस्या भागं हि मय़ोक्ताः सम्प्रतीच्छत ||
४२ ख
अप्सरस ऊचुः:
ग्रहणे कृतवुद्धीनां देवेश तव शासनात् |
४३ क
अप्सरस ऊचुः:
मोक्षं समय़तोऽस्माकं चिन्तय़स्व पितामह ||
४३ ख
व्रह्मो उवाच:
रजस्वलासु नारीषु यो वै मैथुनमाचरेत् |
४४ क
व्रह्मो उवाच:
तमेषा यास्यति क्षिप्रं व्येतु वो मानसो ज्वरः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
तथेति हृष्टमनस उक्त्वाथाप्सरसां गणाः |
४५ क
भीष्म उवाच:
स्वानि स्थानानि सम्प्राप्य रेमिरे भरतर्षभ ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
ततस्त्रिलोककृद्देवः पुनरेव महातपाः |
४६ क
भीष्म उवाच:
अपः सञ्चिन्तय़ामास ध्यातास्ताश्चाप्यथागमन् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
तास्तु सर्वाः समागम्य व्रह्माणममितौजसम् |
४७ क
भीष्म उवाच:
इदमूचुर्वचो राजन्प्रणिपत्य पितामहम् ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
इमाः स्म देव सम्प्राप्तास्त्वत्सकाशमरिन्दम |
४८ क
भीष्म उवाच:
शासनात्तव देवेश समाज्ञापय़ नो विभो ||
४८ ख
व्रह्मो उवाच:
इय़ं वृत्रादनुप्राप्ता पुरुहूतं महाभय़ा |
४९ क