मार्कण्डेय़ उवाच:
तावुभौ पतितौ दृष्ट्वा भ्रातरावमितौजसौ |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ववन्ध रावणिर्भूय़ः शरैर्दत्तवरैस्तदा ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ वीरौ शरजालेन वद्धाविन्द्रजिता रणे |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रेजतुः पुरुषव्याघ्रौ शकुन्ताविव पञ्जरे ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ दृष्ट्वा पतितौ भूमौ शतशः साय़कैश्चितौ |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवः कपिभिः सार्धं परिवार्य ततः स्थितः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुषेणमैन्दद्विविदैः कुमुदेनाङ्गदेन च |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हनूमन्नीलतारैश्च नलेन च कपीश्वरः ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तं देशमागम्य कृतकर्मा विभीषणः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वोधय़ामास तौ वीरौ प्रज्ञास्त्रेण प्रवोधितौ ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विशल्यौ चापि सुग्रीवः क्षणेनोभौ चकार तौ |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विशल्यया महौषध्या दिव्यमन्त्रप्रय़ुक्तय़ा ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ लव्धसञ्ज्ञौ नृवरौ विशल्यावुदतिष्ठताम् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गततन्द्रीक्लमौ चास्तां क्षणेनोभौ महारथौ ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो विभीषणः पार्थ राममिक्ष्वाकुनन्दनम् |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच विज्वरं दृष्ट्वा कृताञ्जलिरिदं वचः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अय़मम्भो गृहीत्वा तु राजराजस्य शासनात् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गुह्यकोऽभ्यागतः श्वेतात्त्वत्सकाशमरिन्दम ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इदमम्भः कुवेरस्ते महाराजः प्रय़च्छति |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परन्तप ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनेन स्पृष्टनय़नो भूतान्यन्तर्हितान्युत |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भवान्द्रक्ष्यति यस्मै च भवानेतत्प्रदास्यति ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथेति रामस्तद्वारि प्रतिगृह्याथ सत्कृतम् |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चकार नेत्रय़ोः शौचं लक्ष्मणश्च महामनाः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवजाम्ववन्तौ च हनूमानङ्गदस्तथा |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मैन्दद्विविदनीलाश्च प्राय़ः प्लवगसत्तमाः ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथा समभवच्चापि यदुवाच विभीषणः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षणेनातीन्द्रिय़ाण्येषां चक्षूंष्यासन्युधिष्ठिर ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इन्द्रजित्कृतकर्मा तु पित्रे कर्म तदात्मनः |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निवेद्य पुनरागच्छत्त्वरय़ाजिशिरः प्रति ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमापतन्तं सङ्क्रुद्धं पुनरेव युय़ुत्सय़ा |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिदुद्राव सौमित्रिर्विभीषणमते स्थितः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम् |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शरैर्जघान सङ्क्रुद्धः कृतसञ्ज्ञोऽथ लक्ष्मणः ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तय़ोः समभवद्युद्धं तदान्योन्यं जिगीषतोः |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अतीव चित्रमाश्चर्यं शक्रप्रह्लादय़ोरिव ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अविध्यदिन्द्रजित्तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सौमित्रिश्चानलस्पर्शैरविध्यद्रावणिं शरैः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सौमित्रिशरसंस्पर्शाद्रावणिः क्रोधमूर्छितः |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
असृजल्लक्ष्मणाय़ाष्टौ शरानाशीविषोपमान् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यासून्पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यथा निरहरद्वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एकेनास्य धनुष्मन्तं वाहुं देहादपातय़त् |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्वितीय़ेन सनाराचं भुजं भूमौ न्यपातय़त् ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तृतीय़ेन तु वाणेन पृथुधारेण भास्वता |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जहार सुनसं चारु शिरो भ्राजिष्णुकुण्डलम् ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विनिकृत्तभुजस्कन्धं कवन्धं भीमदर्शनम् |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं हत्वा सूतमप्यस्त्रैर्जघान वलिनां वरः ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
लङ्कां प्रवेशय़ामासुर्वाजिनस्तं रथं तदा |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम् ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स पुत्रं निहतं दृष्ट्वा त्रासात्सम्भ्रान्तलोचनः |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणः शोकमोहार्तो वैदेहीं हन्तुमुद्यतः ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अशोकवनिकास्थां तां रामदर्शनलालसाम् |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खड्गमादाय़ दुष्टात्मा जवेनाभिपपात ह ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं दृष्ट्वा तस्य दुर्वुद्धेरविन्ध्यः पापनिश्चय़म् |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शमय़ामास सङ्क्रुद्धं श्रूय़तां येन हेतुना ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
महाराज्ये स्थितो दीप्ते न स्त्रिय़ं हन्तुमर्हसि |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हतैवैषा यदा स्त्री च वन्धनस्था च ते गृहे ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न चैषा देहभेदेन हता स्यादिति मे मतिः |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जहि भर्तारमेवास्या हते तस्मिन्हता भवेत् ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न हि ते विक्रमे तुल्यः साक्षादपि शतक्रतुः |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
असकृद्धि त्वय़ा सेन्द्रास्त्रासितास्त्रिदशा युधि ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं वहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदा |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रुद्धं संशमय़ामास जगृहे च स तद्वचः ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्याणे स मतिं कृत्वा निधाय़ासिं क्षपाचरः |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आज्ञापय़ामास तदा रथो मे कल्प्यतामिति ||
३३ ख