chevron_left वन पर्व अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच:
विधाय़ रक्षां लङ्काय़ां विभीषणपुरस्कृतः |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सन्ततार पुनस्तेन सेतुना मकरालय़म् ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कामगेन यथा मुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ||
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिश्ये स पार्थिवः |
५३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः ||
५३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथैनान्राघवः काले समानीय़ाभिपूज्य च |
५४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विसर्जय़ामास तदा रत्नैः सन्तोष्य सर्वशः ||
५४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च |
५५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ||
५५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा |
५६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शय़न्वनम् ||
५६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
किष्किन्धां तु समासाद्य रामः प्रहरतां वरः |
५७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचय़त् ||
५७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तैरेव सहितो रामः सौमित्रिणा सह |
५८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यथागतेन मार्गेण प्रय़यौ स्वपुरं प्रति ||
५८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अय़ोध्यां स समासाद्य पुरीं राष्ट्रपतिस्ततः |
५९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भरताय़ हनूमन्तं दूतं प्रस्थापय़त्तदा ||
५९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
लक्षय़ित्वेङ्गितं सर्वं प्रिय़ं तस्मै निवेद्य च |
६० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वाय़ुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् ||
६० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तत्र मलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् |
६१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्रतः पादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने ||
६१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
समेत्य भरतेनाथ शत्रुघ्नेन च वीर्यवान् |
६२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ ||
६२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथा भरतशत्रुघ्नौ समेतौ गुरुणा तदा |
६३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वैदेह्या दर्शनेनोभौ प्रहर्षं समवापतुः ||
६३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मै तद्भरतो राज्यमागताय़ाभिसत्कृतम् |
६४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न्यासं निर्यातय़ामास युक्तः परमय़ा मुदा ||
६४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तं वैष्णवे शूरं नक्षत्रेऽभिमतेऽहनि |
६५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वसिष्ठो वामदेवश्च सहितावभ्यषिञ्चताम् ||
६५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम् |
६६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद्गृहान्प्रति ||
६६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्यर्च्य विविधै रत्नैः प्रीतिय़ुक्तौ मुदा युतौ |
६७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समाधाय़ेतिकर्तव्यं दुःखेन विससर्ज ह ||
६७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुष्पकं च विमानं तत्पूजय़ित्वा स राघवः |
६८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रादाद्वैश्रवणाय़ैव प्रीत्या स रघुनन्दनः ||
६८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो देवर्षिसहितः सरितं गोमतीमनु |
६९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दशाश्वमेधानाजह्रे जारूथ्यान्स निरर्गलान् ||
६९ ख