chevron_left वन पर्व अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच:
स हत्वा रावणं क्षुद्रं राक्षसेन्द्रं सुरद्विषम् |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वभूव हृष्टः ससुहृद्रामः सौमित्रिणा सह ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो हते दशग्रीवे देवाः सर्षिपुरोगमाः |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आशीर्भिर्जय़युक्ताभिरानर्चुस्तं महाभुजम् ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामं कमलपत्राक्षं तुष्टुवुः सर्वदेवताः |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गन्धर्वाः पुष्पवर्षैश्च वाग्भिश्च त्रिदशालय़ाः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पूजय़ित्वा यथा रामं प्रतिजग्मुर्यथागतम् |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तन्महोत्सवसङ्काशमासीदाकाशमच्युत ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो हत्वा दशग्रीवं लङ्कां रामो महाय़शाः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभीषणाय़ प्रददौ प्रभुः परपुरञ्जय़ः ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः सीतां पुरस्कृत्य विभीषणपुरस्कृताम् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अविन्ध्यो नाम सुप्रज्ञो वृद्धामात्यो विनिर्ययौ ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थितम् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रतीच्छ देवीं सद्वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्मादवतीर्य रथोत्तमात् |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वाष्पेणापिहितां सीतां ददर्शेक्ष्वाकुनन्दनः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत्कार्यं तन्मय़ा कृतम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जरां व्रजेथा इति मे निहतोऽसौ निशाचरः ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन्धर्मविनिश्चय़म् |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारय़ेत् ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नोत्सहे परिभोगाय़ श्वावलीढं हविर्यथा ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः सा सहसा वाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यो ह्यस्या हर्षसम्भूतो मुखरागस्तदाभवत् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षणेन स पुनर्भ्रष्टो निःश्वासादिव दर्पणे ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्ते हरय़ः सर्वे तच्छ्रुत्वा रामभाषितम् |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतासुकल्पा निश्चेष्टा वभूवुः सहलक्ष्मणाः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पितामहो जगत्स्रष्टा दर्शय़ामास राघवम् ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शक्रश्चाग्निश्च वाय़ुश्च यमो वरुण एव च |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षय़ोऽमलाः ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विमानेन महार्हेण हंसय़ुक्तेन भास्वता ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽन्तरिक्षं तत्सर्वं देवगन्धर्वसङ्कुलम् |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुशुभे तारकाचित्रं शरदीव नभस्तलम् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत उत्थाय़ वैदेहि तेषां मध्ये यशस्विनी |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राजपुत्र न ते कोपं करोमि विदिता हि मे |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स मे विमुञ्चतु प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निरापस्तथाकाशं पृथिवी वाय़ुरेव च |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विमुञ्चन्तु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत्सर्वा विश्रावय़न्दिशः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ||
२५ ख
वाय़ुरु उवाच:
भो भो राघव सत्यं वै वाय़ुरस्मि सदागतिः |
२६ क
वाय़ुरु उवाच:
अपापा मैथिली राजन्सङ्गच्छ सह भार्यया ||
२६ ख
अग्निरु उवाच:
अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन |
२७ क
अग्निरु उवाच:
सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ||
२७ ख
वरुण उवाच:
रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव |
२८ क
वरुण उवाच:
अहं वै त्वां प्रव्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ||
२८ ख
व्रह्मो उवाच:
पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वय़ि राजर्षिधर्मिणि |
२९ क
व्रह्मो उवाच:
साधो सद्वृत्तमार्गस्थे शृणु चेदं वचो मम ||
२९ ख
व्रह्मो उवाच:
शत्रुरेष त्वय़ा वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् |
३० क
व्रह्मो उवाच:
यक्षाणां दानवानां च महर्षीणां च पातितः ||
३० ख
व्रह्मो उवाच:
अवध्यः सर्वभूतानां मत्प्रसादात्पुराभवत् |
३१ क
व्रह्मो उवाच:
कस्माच्चित्कारणात्पापः कञ्चित्कालमुपेक्षितः ||
३१ ख
व्रह्मो उवाच:
वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना |
३२ क
व्रह्मो उवाच:
नलकूवरशापेन रक्षा चास्याः कृता मय़ा ||
३२ ख
व्रह्मो उवाच:
यदि ह्यकामामासेवेत्स्त्रिय़मन्यामपि ध्रुवम् |
३३ क
व्रह्मो उवाच:
शतधास्य फलेद्देह इत्युक्तः सोऽभवत्पुरा ||
३३ ख
व्रह्मो उवाच:
नात्र शङ्का त्वय़ा कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते |
३४ क
व्रह्मो उवाच:
कृतं त्वय़ा महत्कार्यं देवानाममरप्रभ ||
३४ ख
दशरथ उवाच:
प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते |
३५ क
दशरथ उवाच:
अनुजानामि राज्यं च प्रशाधि पुरुषोत्तम ||
३५ ख
राम उवाच:
अभिवादय़े त्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम |
३६ क
राम उवाच:
गमिष्यामि पुरीं रम्यामय़ोध्यां शासनात्तव ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमुवाच पिता भूय़ः प्रहृष्टो मनुजाधिप |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गच्छाय़ोध्यां प्रशाधि त्वं राम रक्तान्तलोचन ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो देवान्नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
महेन्द्र इव पौलोम्या भार्यया स समेय़िवान् ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो वरं ददौ तस्मै अविन्ध्याय़ परन्तपः |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजय़ामास राक्षसीम् ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमुवाच ततो व्रह्मा देवैः शक्रमुखैर्वृतः |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कौसल्यामातरिष्टांस्ते वरानद्य ददानि कान् ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वव्रे रामः स्थितिं धर्मे शत्रुभिश्चापराजय़म् |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसैर्निहतानां च वानराणां समुद्भवम् ||
४१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्ते व्रह्मणा प्रोक्ते तथेति वचने तदा |
४२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समुत्तस्थुर्महाराज वानरा लव्धचेतसः ||
४२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीता चापि महाभागा वरं हनुमते ददौ |
४३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामकीर्त्या समं पुत्र जीवितं ते भविष्यति ||
४३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा |
४४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन ||
४४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्ते प्रेक्षमाणानां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् |
४५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तर्धानं यय़ुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ||
४५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्ट्वा तु रामं जानक्या समेतं शक्रसारथिः |
४६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः ||
४६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवगन्धर्वय़क्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् |
४७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपनीतं त्वय़ा दुःखमिदं सत्यपराक्रम ||
४७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथय़िष्यन्ति लोकास्त्वां यावद्भूमिर्धरिष्यति ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवमुक्त्वानुज्ञाप्य रामं शस्त्रभृतां वरम् |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सम्पूज्यापाक्रमत्तेन रथेनादित्यवर्चसा ||
४९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः सीतां पुरस्कृत्य रामः सौमित्रिणा सह |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः ||
५० ख