मार्कण्डेय़ उवाच:
एवमेतन्महावाहो रामेणामिततेजसा |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रिय़ोऽसि परन्तप |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वाहुवीर्याश्रय़े मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णय़े ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न हि ते वृजिनं किञ्चिद्दृश्यते परमण्वपि |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अस्मिन्मार्गे विषीदेय़ुः सेन्द्रा अपि सुरासुराः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
संहत्य निहतो वृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नमुचिश्चैव दुर्धर्षो दीर्घजिह्वा च राक्षसी ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सहाय़वति सर्वार्थाः सन्तिष्ठन्तीह सर्वशः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
किं नु तस्याजितं सङ्ख्ये भ्राता यस्य धनञ्जय़ः ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अय़ं च वलिनां श्रेष्ठो भीमो भीमपराक्रमः |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
युवानौ च महेष्वासौ यमौ माद्रवतीसुतौ |
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एभिः सहाय़ैः कस्मात्त्वं विषीदसि परन्तप ||
६ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
य इमे वज्रिणः सेनां जय़ेय़ुः समरुद्गणाम् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वमप्येभिर्महेष्वासैः सहाय़ैर्देवरूपिभिः |
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विजेष्यसि रणे सर्वानमित्रान्भरतर्षभ ||
७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
इतश्च त्वमिमां पश्य सैन्धवेन दुरात्मना |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वलिना वीर्यमत्तेन हृतामेभिर्महात्मभिः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आनीतां द्रौपदीं कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जय़द्रथं च राजानं विजितं वशमागतम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
असहाय़ेन रामेण वैदेही पुनराहृता |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हत्वा सङ्ख्ये दशग्रीवं राक्षसं भीमविक्रमम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यस्य शाखामृगा मित्रा ऋक्षाः कालमुखास्तथा |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जात्यन्तरगता राजन्नेतद्वुद्ध्यानुचिन्तय़ ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मात्त्वं कुरुशार्दूल मा शुचो भरतर्षभ |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परन्तप ||
१२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवमाश्वासितो राजा मार्कण्डेय़ेन धीमता |
१३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
त्यक्त्वा दुःखमदीनात्मा पुनरेवेदमव्रवीत् ||
१३ ख