सूत उवाच:
ततस्तस्मिन्द्विजश्रेष्ठ समुदीर्णे तथाविधे |
१ क
सूत उवाच:
गरुत्मान्पक्षिराट्तूर्णं सम्प्राप्तो विवुधान्प्रति ||
१ ख
सूत उवाच:
तं दृष्ट्वातिवलं चैव प्राकम्पन्त समन्ततः |
२ क
सूत उवाच:
परस्परं च प्रत्यघ्नन्सर्वप्रहरणान्यपि ||
२ ख
सूत उवाच:
तत्र चासीदमेय़ात्मा विद्युदग्निसमप्रभः |
३ क
सूत उवाच:
भौवनः सुमहावीर्यः सोमस्य परिरक्षिता ||
३ ख
सूत उवाच:
स तेन पतगेन्द्रेण पक्षतुण्डनखैः क्षतः |
४ क
सूत उवाच:
मुहूर्तमतुलं युद्धं कृत्वा विनिहतो युधि ||
४ ख
सूत उवाच:
रजश्चोद्धूय़ सुमहत्पक्षवातेन खेचरः |
५ क
सूत उवाच:
कृत्वा लोकान्निरालोकांस्तेन देवानवाकिरत् ||
५ ख
सूत उवाच:
तेनावकीर्णा रजसा देवा मोहमुपागमन् |
६ क
सूत उवाच:
न चैनं ददृशुश्छन्ना रजसामृतरक्षिणः ||
६ ख
सूत उवाच:
एवं संलोडय़ामास गरुडस्त्रिदिवालय़म् |
७ क
सूत उवाच:
पक्षतुण्डप्रहारैश्च देवान्स विददार ह ||
७ ख
सूत उवाच:
ततो देवः सहस्राक्षस्तूर्णं वाय़ुमचोदय़त् |
८ क
सूत उवाच:
विक्षिपेमां रजोवृष्टिं तवैतत्कर्म मारुत ||
८ ख
सूत उवाच:
अथ वाय़ुरपोवाह तद्रजस्तरसा वली |
९ क
सूत उवाच:
ततो वितिमिरे जाते देवाः शकुनिमार्दय़न् ||
९ ख
सूत उवाच:
ननाद चोच्चैर्वलवान्महामेघरवः खगः |
१० क
सूत उवाच:
वध्यमानः सुरगणैः सर्वभूतानि भीषय़न् |
१० ख
सूत उवाच:
उत्पपात महावीर्यः पक्षिराट्परवीरहा ||
१० ग
सूत उवाच:
तमुत्पत्यान्तरिक्षस्थं देवानामुपरि स्थितम् |
११ क
सूत उवाच:
वर्मिणो विवुधाः सर्वे नानाशस्त्रैरवाकिरन् ||
११ ख
सूत उवाच:
पट्टिशैः परिघैः शूलैर्गदाभिश्च सवासवाः |
१२ क
सूत उवाच:
क्षुरान्तैर्ज्वलितैश्चापि चक्रैरादित्यरूपिभिः ||
१२ ख
सूत उवाच:
नानाशस्त्रविसर्गैश्च वध्यमानः समन्ततः |
१३ क
सूत उवाच:
कुर्वन्सुतुमुलं युद्धं पक्षिराण्न व्यकम्पत ||
१३ ख
सूत उवाच:
विनर्दन्निव चाकाशे वैनतेय़ः प्रतापवान् |
१४ क
सूत उवाच:
पक्षाभ्यामुरसा चैव समन्ताद्व्याक्षिपत्सुरान् ||
१४ ख
सूत उवाच:
ते विक्षिप्तास्ततो देवाः प्रजग्मुर्गरुडार्दिताः |
१५ क
सूत उवाच:
नखतुण्डक्षताश्चैव सुस्रुवुः शोणितं वहु ||
१५ ख
सूत उवाच:
साध्याः प्राचीं सगन्धर्वा वसवो दक्षिणां दिशम् |
१६ क
सूत उवाच:
प्रजग्मुः सहिता रुद्रैः पतगेन्द्रप्रधर्षिताः ||
१६ ख
सूत उवाच:
दिशं प्रतीचीमादित्या नासत्या उत्तरां दिशम् |
१७ क
सूत उवाच:
मुहुर्मुहुः प्रेक्षमाणा युध्यमाना महौजसम् ||
१७ ख
सूत उवाच:
अश्वक्रन्देन वीरेण रेणुकेन च पक्षिणा |
१८ क
सूत उवाच:
क्रथनेन च शूरेण तपनेन च खेचरः ||
१८ ख
सूत उवाच:
उलूकश्वसनाभ्यां च निमेषेण च पक्षिणा |
१९ क
सूत उवाच:
प्ररुजेन च संय़ुद्धं चकार प्रलिहेन च ||
१९ ख
सूत उवाच:
तान्पक्षनखतुण्डाग्रैरभिनद्विनतासुतः |
२० क
सूत उवाच:
युगान्तकाले सङ्क्रुद्धः पिनाकीव महावलः ||
२० ख
सूत उवाच:
महावीर्या महोत्साहास्तेन ते वहुधा क्षताः |
२१ क
सूत उवाच:
रेजुरभ्रघनप्रख्या रुधिरौघप्रवर्षिणः ||
२१ ख
सूत उवाच:
तान्कृत्वा पतगश्रेष्ठः सर्वानुत्क्रान्तजीवितान् |
२२ क
सूत उवाच:
अतिक्रान्तोऽमृतस्यार्थे सर्वतोऽग्निमपश्यत ||
२२ ख
सूत उवाच:
आवृण्वानं महाज्वालमर्चिर्भिः सर्वतोऽम्वरम् |
२३ क
सूत उवाच:
दहन्तमिव तीक्ष्णांशुं घोरं वाय़ुसमीरितम् ||
२३ ख
सूत उवाच:
ततो नवत्या नवतीर्मुखानां; कृत्वा तरस्वी गरुडो महात्मा |
२४ क
सूत उवाच:
नदीः समापीय़ मुखैस्ततस्तैः; सुशीघ्रमागम्य पुनर्जवेन ||
२४ ख
सूत उवाच:
ज्वलन्तमग्निं तममित्रतापनः; समास्तरत्पत्ररथो नदीभिः |
२५ क
सूत उवाच:
ततः प्रचक्रे वपुरन्यदल्पं; प्रवेष्टुकामोऽग्निमभिप्रशाम्य ||
२५ ख