पराशर उवाच:
मनोरथरथं प्राप्य इन्द्रिय़ार्थहय़ं नरः |
१ क
पराशर उवाच:
रश्मिभिर्ज्ञानसम्भूतैर्यो गच्छति स वुद्धिमान् ||
१ ख
पराशर उवाच:
सेवाश्रितेन मनसा वृत्तिहीनस्य शस्यते |
२ क
पराशर उवाच:
द्विजातिहस्तान्निर्वृत्ता न तु तुल्यात्परस्परम् ||
२ ख
पराशर उवाच:
आय़ुर्नसुलभं लव्ध्वा नावकर्षेद्विशां पते |
३ क
पराशर उवाच:
उत्कर्षार्थं प्रय़तते नरः पुण्येन कर्मणा ||
३ ख
पराशर उवाच:
वर्णेभ्योऽपि परिभ्रष्टः स वै संमानमर्हति |
४ क
पराशर उवाच:
न तु यः सत्क्रिय़ां प्राप्य राजसं कर्म सेवते ||
४ ख
पराशर उवाच:
वर्णोत्कर्षमवाप्नोति नरः पुण्येन कर्मणा |
५ क
पराशर उवाच:
दुर्लभं तमलव्धा हि हन्यात्पापेन कर्मणा ||
५ ख
पराशर उवाच:
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् |
६ क
पराशर उवाच:
पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वय़ं कृतम् |
६ ख
पराशर उवाच:
तस्मात्पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदय़म् ||
६ ग
पराशर उवाच:
पापानुवन्धं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् |
७ क
पराशर उवाच:
न तत्सेवेत मेधावी शुचिः कुसलिलं यथा ||
७ ख
पराशर उवाच:
किङ्कष्टमनुपश्यामि फलं पापस्य कर्मणः |
८ क
पराशर उवाच:
प्रत्यापन्नस्य हि सतो नात्मा तावद्विरोचते ||
८ ख
पराशर उवाच:
प्रत्यापत्तिश्च यस्येह वालिशस्य न जाय़ते |
९ क
पराशर उवाच:
तस्यापि सुमहांस्तापः प्रस्थितस्योपजाय़ते ||
९ ख
पराशर उवाच:
विरक्तं शोध्यते वस्त्रं न तु कृष्णोपसंहितम् |
१० क
पराशर उवाच:
प्रय़त्नेन मनुष्येन्द्र पापमेवं निवोध मे ||
१० ख
पराशर उवाच:
स्वय़ं कृत्वा तु यः पापं शुभमेवानुतिष्ठति |
११ क
पराशर उवाच:
प्राय़श्चित्तं नरः कर्तुमुभय़ं सोऽश्नुते पृथक् ||
११ ख
पराशर उवाच:
अज्ञानात्तु कृतां हिंसामहिंसा व्यपकर्षति |
१२ क
पराशर उवाच:
व्राह्मणाः शास्त्रनिर्देशादित्याहुर्व्रह्मवादिनः ||
१२ ख
पराशर उवाच:
तथा कामकृतं चास्य विहिंसैवापकर्षति |
१३ क
पराशर उवाच:
इत्याहुर्धर्मशास्त्रज्ञा व्राह्मणा वेदपारगाः ||
१३ ख
पराशर उवाच:
अहं तु तावत्पश्यामि कर्म यद्वर्तते कृतम् |
१४ क
पराशर उवाच:
गुणय़ुक्तं प्रकाशं च पापेनानुपसंहितम् ||
१४ ख
पराशर उवाच:
यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम् |
१५ क
पराशर उवाच:
वुद्धिय़ुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह ||
१५ ख
पराशर उवाच:
भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्वणम् |
१६ क
पराशर उवाच:
अवुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा ||
१६ ख
पराशर उवाच:
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा |
१७ क
पराशर उवाच:
नाचरेत्तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सय़ेत् ||
१७ ख
पराशर उवाच:
सञ्चिन्त्य मनसा राजन्विदित्वा शक्तिमात्मनः |
१८ क
पराशर उवाच:
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ||
१८ ख
पराशर उवाच:
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीय़ते यथा |
१९ क
पराशर उवाच:
नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ||
१९ ख
पराशर उवाच:
सतोय़ेऽन्यत्तु यत्तोय़ं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते |
२० क
पराशर उवाच:
वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ||
२० ख
पराशर उवाच:
एवं कर्माणि यानीह वुद्धिय़ुक्तानि भूपते |
२१ क
पराशर उवाच:
नसमानीह हीनानि तानि पुण्यतमान्यपि ||
२१ ख
पराशर उवाच:
राज्ञा जेतव्याः साय़ुधाश्चोन्नताश्च; सम्यक्कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम् |
२२ क
पराशर उवाच:
अग्निश्चेय़ो वहुभिश्चापि यज्ञै; रन्ते मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेय़म् ||
२२ ख
पराशर उवाच:
दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो; भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् |
२३ क
पराशर उवाच:
गरीय़सः पूजय़ेदात्मशक्त्या; सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ||
२३ ख