chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २८१
पराशर उवाच:
कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रय़च्छति |
१ क
पराशर उवाच:
प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ||
१ ख
पराशर उवाच:
गौरवेण परित्यक्तं निःस्नेहं परिवर्जय़ेत् |
२ क
पराशर उवाच:
सोदर्यं भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम् ||
२ ख
पराशर उवाच:
विशिष्टस्य विशिष्टाच्च तुल्यौ दानप्रतिग्रहौ |
३ क
पराशर उवाच:
तय़ोः पुण्यतरं दानं तद्द्विजस्य प्रय़च्छतः ||
३ ख
पराशर उवाच:
न्याय़ागतं धनं वर्णैर्न्याय़ेनैव विवर्धितम् |
४ क
पराशर उवाच:
संरक्ष्यं यत्नमास्थाय़ धर्मार्थमिति निश्चय़ः ||
४ ख
पराशर उवाच:
न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जय़ेत् |
५ क
पराशर उवाच:
शक्तितः सर्वकार्याणि कुर्यान्नर्द्धिमनुस्मरेत् ||
५ ख
पराशर उवाच:
अपो हि प्रय़तः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा |
६ क
पराशर उवाच:
शक्तितोऽतिथय़े दत्त्वा क्षुधार्ताय़ाश्नुते फलम् ||
६ ख
पराशर उवाच:
रन्तिदेवेन लोकेष्टा सिद्धिः प्राप्ता महात्मना |
७ क
पराशर उवाच:
फलपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवानसौ ||
७ ख
पराशर उवाच:
तैरेव फलपत्रैश्च स माठरमतोषय़त् |
८ क
पराशर उवाच:
तस्माल्लेभे परं स्थानं शैव्योऽपि पृथिवीपतिः ||
८ ख
पराशर उवाच:
देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्योऽथात्मनस्तथा |
९ क
पराशर उवाच:
ऋणवाञ्जाय़ते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ||
९ ख
पराशर उवाच:
स्वाध्याय़ेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा |
१० क
पराशर उवाच:
पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ||
१० ख
पराशर उवाच:
वाचः शेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च |
११ क
पराशर उवाच:
यथावद्भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेद्धर्ममादितः ||
११ ख
पराशर उवाच:
प्रय़त्नेन च संसिद्धा धनैरपि विवर्जिताः |
१२ क
पराशर उवाच:
सम्यग्घुत्वा हुतवहं मुनय़ः सिद्धिमागताः ||
१२ ख
पराशर उवाच:
विश्वामित्रस्य पुत्रत्वमृचीकतनय़ोऽगमत् |
१३ क
पराशर उवाच:
ऋग्भिः स्तुत्वा महाभागो देवान्वै यज्ञभागिनः ||
१३ ख
पराशर उवाच:
गतः शुक्रत्वमुशना देवदेवप्रसादनात् |
१४ क
पराशर उवाच:
देवीं स्तुत्वा तु गगने मोदते तेजसा वृतः ||
१४ ख
पराशर उवाच:
असितो देवलश्चैव तथा नारदपर्वतौ |
१५ क
पराशर उवाच:
कक्षीवाञ्जामदग्न्यश्च रामस्ताण्ड्यस्तथांशुमान् ||
१५ ख
पराशर उवाच:
वसिष्ठो जमदग्निश्च विश्वामित्रोऽत्रिरेव च |
१६ क
पराशर उवाच:
भरद्वाजो हरिश्मश्रुः कुण्डधारः श्रुतश्रवाः ||
१६ ख
पराशर उवाच:
एते महर्षय़ः स्तुत्वा विष्णुमृग्भिः समाहिताः |
१७ क
पराशर उवाच:
लेभिरे तपसा सिद्धिं प्रसादात्तस्य धीमतः ||
१७ ख
पराशर उवाच:
अनर्हाश्चार्हतां प्राप्ताः सन्तः स्तुत्वा तमेव ह |
१८ क
पराशर उवाच:
न तु वृद्धिमिहान्विच्छेत्कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ||
१८ ख
पराशर उवाच:
येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् |
१९ क
पराशर उवाच:
धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद्धनकाङ्क्षय़ा ||
१९ ख
पराशर उवाच:
आहिताग्निर्हि धर्मात्मा यः स पुण्यकृदुत्तमः |
२० क
पराशर उवाच:
वेदा हि सर्वे राजेन्द्र स्थितास्त्रिष्वग्निषु प्रभो ||
२० ख
पराशर उवाच:
स चाप्यग्न्याहितो विप्रः क्रिय़ा यस्य न हीय़ते |
२१ क
पराशर उवाच:
श्रेय़ो ह्यनाहिताग्नित्वमग्निहोत्रं न निष्क्रिय़म् ||
२१ ख
पराशर उवाच:
अग्निरात्मा च माता च पिता जनय़िता तथा |
२२ क
पराशर उवाच:
गुरुश्च नरशार्दूल परिचर्या यथातथम् ||
२२ ख
पराशर उवाच:
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी; विद्वान्क्लीवः पश्यति प्रीतिय़ोगात् |
२३ क
पराशर उवाच:
दाक्ष्येणाहीनो धर्मय़ुक्तो नदान्तो; लोकेऽस्मिन्वै पूज्यते सद्भिरार्यः ||
२३ ख