पराशर उवाच:
वृत्तिः सकाशाद्वर्णेभ्यस्त्रिभ्यो हीनस्य शोभना |
१ क
पराशर उवाच:
प्रीत्योपनीता निर्दिष्टा धर्मिष्ठान्कुरुते सदा ||
१ ख
पराशर उवाच:
वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा |
२ क
पराशर उवाच:
न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रय़ोजय़ेत् ||
२ ख
पराशर उवाच:
सद्भिस्तु सह संसर्गः शोभते धर्मदर्शिभिः |
३ क
पराशर उवाच:
नित्यं सर्वास्ववस्थासु नासद्भिरिति मे मतिः ||
३ ख
पराशर उवाच:
यथोदय़गिरौ द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते |
४ क
पराशर उवाच:
तथा सत्संनिकर्षेण हीनवर्णोऽपि दीप्यते ||
४ ख
पराशर उवाच:
यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्वरम् |
५ क
पराशर उवाच:
तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवैहि मे ||
५ ख
पराशर उवाच:
तस्माद्गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन |
६ क
पराशर उवाच:
अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम् ||
६ ख
पराशर उवाच:
सुखे वा यदि वा दुःखे वर्तमानो विचक्षणः |
७ क
पराशर उवाच:
यश्चिनोति शुभान्येव स भद्राणीह पश्यति ||
७ ख
पराशर उवाच:
धर्मादपेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् |
८ क
पराशर उवाच:
न तत्सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ||
८ ख
पराशर उवाच:
यो हृत्वा गोसहस्राणि नृपो दद्यादरक्षिता |
९ क
पराशर उवाच:
स शव्दमात्रफलभाग्राजा भवति तस्करः ||
९ ख
पराशर उवाच:
स्वय़म्भूरसृजच्चाग्रे धातारं लोकपूजितम् |
१० क
पराशर उवाच:
धातासृजत्पुत्रमेकं प्रजानां धारणे रतम् ||
१० ख
पराशर उवाच:
तमर्चय़ित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् |
११ क
पराशर उवाच:
रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपय़ोज्यं द्विजातिभिः ||
११ ख
पराशर उवाच:
अजिह्मैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रय़ोक्तृभिः |
१२ क
पराशर उवाच:
शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ||
१२ ख
पराशर उवाच:
अप्रनष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः |
१३ क
पराशर उवाच:
सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ||
१३ ख
पराशर उवाच:
तस्माद्यो रक्षति नृपः स धर्मेणाभिपूज्यते |
१४ क
पराशर उवाच:
अधीते चापि यो विप्रो वैश्यो यश्चार्जने रतः ||
१४ ख
पराशर उवाच:
यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं निय़तेन्द्रिय़ः |
१५ क
पराशर उवाच:
अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात्परिहीय़ते ||
१५ ख
पराशर उवाच:
प्राणसन्तापनिर्दिष्टाः काकिण्योऽपि महाफलाः |
१६ क
पराशर उवाच:
न्याय़ेनोपार्जिता दत्ताः किमुतान्याः सहस्रशः ||
१६ ख
पराशर उवाच:
सत्कृत्य तु द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिप |
१७ क
पराशर उवाच:
यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम् ||
१७ ख
पराशर उवाच:
अभिगम्य दत्तं तुष्ट्या यद्धन्यमाहुरभिष्टुतम् |
१८ क
पराशर उवाच:
याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं वुधाः ||
१८ ख
पराशर उवाच:
अवज्ञय़ा दीय़ते यत्तथैवाश्रद्धय़ापि च |
१९ क
पराशर उवाच:
तदाहुरधमं दानं मुनय़ः सत्यवादिनः ||
१९ ख
पराशर उवाच:
अतिक्रमे मज्जमानो विविधेन नरः सदा |
२० क
पराशर उवाच:
तथा प्रय़त्नं कुर्वीत यथा मुच्येत संशय़ात् ||
२० ख
पराशर उवाच:
दमेन शोभते विप्रः क्षत्रिय़ो विजय़ेन तु |
२१ क
पराशर उवाच:
धनेन वैश्यः शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते ||
२१ ख