chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २८३
पराशर उवाच:
प्रतिग्रहागता विप्रे क्षत्रिय़े शस्त्रनिर्जिताः |
१ क
पराशर उवाच:
वैश्ये न्याय़ार्जिताश्चैव शूद्रे शुश्रूषय़ार्जिताः |
१ ख
पराशर उवाच:
स्वल्पाप्यर्थाः प्रशस्यन्ते धर्मस्यार्थे महाफलाः ||
१ ग
पराशर उवाच:
नित्यं त्रय़ाणां वर्णानां शूद्रः शुश्रूषुरुच्यते |
२ क
पराशर उवाच:
क्षत्रधर्मा वैश्यधर्मा नावृत्तिः पतति द्विजः |
२ ख
पराशर उवाच:
शूद्रकर्मा यदा तु स्यात्तदा पतति वै द्विजः ||
२ ग
पराशर उवाच:
वाणिज्यं पाशुपाल्यं च तथा शिल्पोपजीवनम् |
३ क
पराशर उवाच:
शूद्रस्यापि विधीय़न्ते यदा वृत्तिर्न जाय़ते ||
३ ख
पराशर उवाच:
रङ्गावतरणं चैव तथा रूपोपजीवनम् |
४ क
पराशर उवाच:
मद्यमांसोपजीव्यं च विक्रय़ो लोहचर्मणोः ||
४ ख
पराशर उवाच:
अपूर्विणा न कर्तव्यं कर्म लोके विगर्हितम् |
५ क
पराशर उवाच:
कृतपूर्विणस्तु त्यजतो महान्धर्म इति श्रुतिः ||
५ ख
पराशर उवाच:
संसिद्धः पुरुषो लोके यदाचरति पापकम् |
६ क
पराशर उवाच:
मदेनाभिप्लुतमनास्तच्च नग्राह्यमुच्यते ||
६ ख
पराशर उवाच:
श्रूय़न्ते हि पुराणे वै प्रजा धिग्दण्डशासनाः |
७ क
पराशर उवाच:
दान्ता धर्मप्रधानाश्च न्याय़धर्मानुवर्तकाः ||
७ ख
पराशर उवाच:
धर्म एव सदा नॄणामिह राजन्प्रशस्यते |
८ क
पराशर उवाच:
धर्मवृद्धा गुणानेव सेवन्ते हि नरा भुवि ||
८ ख
पराशर उवाच:
तं धर्ममसुरास्तात नामृष्यन्त जनाधिप |
९ क
पराशर उवाच:
विवर्धमानाः क्रमशस्तत्र तेऽन्वाविशन्प्रजाः ||
९ ख
पराशर उवाच:
तेषां दर्पः समभवत्प्रजानां धर्मनाशनः |
१० क
पराशर उवाच:
दर्पात्मनां ततः क्रोधः पुनस्तेषामजाय़त ||
१० ख
पराशर उवाच:
ततः क्रोधाभिभूतानां वृत्तं लज्जासमन्वितम् |
११ क
पराशर उवाच:
ह्रीश्चैवाप्यनशद्राजंस्ततो मोहो व्यजाय़त ||
११ ख
पराशर उवाच:
ततो मोहपरीतास्ते नापश्यन्त यथा पुरा |
१२ क
पराशर उवाच:
परस्परावमर्देन वर्तय़न्ति यथासुखम् ||
१२ ख
पराशर उवाच:
तान्प्राप्य तु स धिग्दण्डो नकारणमतोऽभवत् |
१३ क
पराशर उवाच:
ततोऽभ्यगच्छन्देवांश्च व्राह्मणांश्चावमन्य ह ||
१३ ख
पराशर उवाच:
एतस्मिन्नेव काले तु देवा देववरं शिवम् |
१४ क
पराशर उवाच:
अगच्छञ्शरणं वीरं वहुरूपं गणाधिपम् ||
१४ ख
पराशर उवाच:
तेन स्म ते गगनगाः सपुराः पातिताः क्षितौ |
१५ क
पराशर उवाच:
तिस्रोऽप्येकेन वाणेन देवाप्याय़िततेजसा ||
१५ ख
पराशर उवाच:
तेषामधिपतिस्त्वासीद्भीमो भीमपराक्रमः |
१६ क
पराशर उवाच:
देवतानां भय़करः स हतः शूलपाणिना ||
१६ ख
पराशर उवाच:
तस्मिन्हतेऽथ स्वं भावं प्रत्यपद्यन्त मानवाः |
१७ क
पराशर उवाच:
प्रावर्तन्त च वेदा वै शास्त्राणि च यथा पुरा ||
१७ ख
पराशर उवाच:
ततोऽभ्यषिञ्चन्राज्येन देवानां दिवि वासवम् |
१८ क
पराशर उवाच:
सप्तर्षय़श्चान्वय़ुञ्जन्नराणां दण्डधारणे ||
१८ ख
पराशर उवाच:
सप्तर्षीणामथोर्ध्वं च विपृथुर्नाम पार्थिवः |
१९ क
पराशर उवाच:
राजानः क्षत्रिय़ाश्चैव मण्डलेषु पृथक्पृथक् ||
१९ ख
पराशर उवाच:
महाकुलेषु ये जाता वृत्ताः पूर्वतराश्च ये |
२० क
पराशर उवाच:
तेषामथासुरो भावो हृदय़ान्नापसर्पति ||
२० ख
पराशर उवाच:
तस्मात्तेनैव भावेन सानुषङ्गेन पार्थिवाः |
२१ क
पराशर उवाच:
आसुराण्येव कर्माणि न्यषेवन्भीमविक्रमाः ||
२१ ख
पराशर उवाच:
प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापय़न्ति च |
२२ क
पराशर उवाच:
भजन्ते तानि चाद्यापि ये वालिशतमा नराः ||
२२ ख
पराशर उवाच:
तस्मादहं व्रवीमि त्वां राजन्सञ्चिन्त्य शास्त्रतः |
२३ क
पराशर उवाच:
संसिद्धाधिगमं कुर्यात्कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ||
२३ ख
पराशर उवाच:
न सङ्करेण द्रविणं विचिन्वीत विचक्षणः |
२४ क
पराशर उवाच:
धर्मार्थं न्याय़मुत्सृज्य न तत्कल्याणमुच्यते ||
२४ ख
पराशर उवाच:
स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रिय़ः प्रिय़वान्धवः |
२५ क
पराशर उवाच:
प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय़ ||
२५ ख
पराशर उवाच:
इष्टानिष्टसमाय़ोगो वैरं सौहार्दमेव च |
२६ क
पराशर उवाच:
अथ जातिसहस्राणि वहूनि परिवर्तते ||
२६ ख
पराशर उवाच:
तस्माद्गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन |
२७ क
पराशर उवाच:
निर्गुणो यो हि दुर्वुद्धिरात्मनः सोऽरिरुच्यते ||
२७ ख
पराशर उवाच:
मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्ततः |
२८ क
पराशर उवाच:
न तथान्येषु भूतेषु मनुष्यरहितेष्विह ||
२८ ख
पराशर उवाच:
धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा |
२९ क
पराशर उवाच:
आत्मभूतः सदा लोके चरेद्भूतान्यहिंसय़न् ||
२९ ख
पराशर उवाच:
यदा व्यपेतहृल्लेखं मनो भवति तस्य वै |
३० क
पराशर उवाच:
नानृतं चैव भवति तदा कल्याणमृच्छति ||
३० ख