पराशर उवाच:
एष धर्मविधिस्तात गृहस्थस्य प्रकीर्तितः |
१ क
पराशर उवाच:
तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ||
१ ख
पराशर उवाच:
प्राय़ेण हि गृहस्थस्य ममत्वं नाम जाय़ते |
२ क
पराशर उवाच:
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावैस्तामसराजसैः ||
२ ख
पराशर उवाच:
गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च |
३ क
पराशर उवाच:
दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ||
३ ख
पराशर उवाच:
एवं तस्य प्रवृत्तस्य नित्यमेवानुपश्यतः |
४ क
पराशर उवाच:
रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ||
४ ख
पराशर उवाच:
रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम् |
५ क
पराशर उवाच:
मोहजाता रतिर्नाम समुपैति नराधिप ||
५ ख
पराशर उवाच:
कृतार्थो भोगतो भूत्वा स वै रतिपराय़णः |
६ क
पराशर उवाच:
लाभं ग्राम्यसुखादन्यं रतितो नानुपश्यति ||
६ ख
पराशर उवाच:
ततो लोभाभिभूतात्मा सङ्गाद्वर्धय़ते जनम् |
७ क
पराशर उवाच:
पुष्ट्यर्थं चैव तस्येह जनस्यार्थं चिकीर्षति ||
७ ख
पराशर उवाच:
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः |
८ क
पराशर उवाच:
वालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षय़ाच्चानुतप्यते ||
८ ख
पराशर उवाच:
ततो मानेन सम्पन्नो रक्षन्नात्मपराजय़म् |
९ क
पराशर उवाच:
करोति येन भोगी स्यामिति तस्माद्विनश्यति ||
९ ख
पराशर उवाच:
तपो हि वुद्धिय़ुक्तानां शाश्वतं व्रह्मदर्शनम् |
१० क
पराशर उवाच:
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ||
१० ख
पराशर उवाच:
स्नेहाय़तननाशाच्च धननाशाच्च पार्थिव |
११ क
पराशर उवाच:
आधिव्याधिप्रतापाच्च निर्वेदमुपगच्छति ||
११ ख
पराशर उवाच:
निर्वेदादात्मसम्वोधः सम्वोधाच्छास्त्रदर्शनम् |
१२ क
पराशर उवाच:
शास्त्रार्थदर्शनाद्राजंस्तप एवानुपश्यति ||
१२ ख
पराशर उवाच:
दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् |
१३ क
पराशर उवाच:
यो वै प्रिय़सुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ||
१३ ख
पराशर उवाच:
तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीय़ते |
१४ क
पराशर उवाच:
जितेन्द्रिय़स्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रदेशकम् ||
१४ ख
पराशर उवाच:
प्रजापतिः प्रजाः पूर्वमसृजत्तपसा विभुः |
१५ क
पराशर उवाच:
क्वचित्क्वचिद्व्रतपरो व्रतान्यास्थाय़ पार्थिव ||
१५ ख
पराशर उवाच:
आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः |
१६ क
पराशर उवाच:
विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ||
१६ ख
पराशर उवाच:
यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः |
१७ क
पराशर उवाच:
संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ||
१७ ख
पराशर उवाच:
ये चादौ व्रह्मणा सृष्टा व्राह्मणास्तपसा पुरा |
१८ क
पराशर उवाच:
ते भावय़न्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ||
१८ ख
पराशर उवाच:
मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः |
१९ क
पराशर उवाच:
महाकुलेषु दृश्यन्ते तत्सर्वं तपसः फलम् ||
१९ ख
पराशर उवाच:
कौशिकानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च |
२० क
पराशर उवाच:
वाहनासनय़ानानि सर्वं तत्तपसः फलम् ||
२० ख
पराशर उवाच:
मनोनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः |
२१ क
पराशर उवाच:
वासः प्रासादपृष्ठे च तत्सर्वं तपसः फलम् ||
२१ ख
पराशर उवाच:
शय़नानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च |
२२ क
पराशर उवाच:
अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति कृतकर्मणाम् ||
२२ ख
पराशर उवाच:
नाप्राप्यं तपसा किञ्चित्त्रैलोक्येऽस्मिन्परन्तप |
२३ क
पराशर उवाच:
उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ||
२३ ख
पराशर उवाच:
सुखितो दुःखितो वापि नरो लोभं परित्यजेत् |
२४ क
पराशर उवाच:
अवेक्ष्य मनसा शास्त्रं वुद्ध्या च नृपसत्तम ||
२४ ख
पराशर उवाच:
असन्तोषोऽसुखाय़ैव लोभादिन्द्रिय़विभ्रमः |
२५ क
पराशर उवाच:
ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ||
२५ ख
पराशर उवाच:
नष्टप्रज्ञो यदा भवति तदा न्याय़ं न पश्यति |
२६ क
पराशर उवाच:
तस्मात्सुखक्षय़े प्राप्ते पुमानुग्रं तपश्चरेत् ||
२६ ख
पराशर उवाच:
यदिष्टं तत्सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहोच्यते |
२७ क
पराशर उवाच:
कृताकृतस्य तपसः फलं पश्यस्व यादृशम् ||
२७ ख
पराशर उवाच:
नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषय़ांश्चोपभुञ्जते |
२८ क
पराशर उवाच:
प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ||
२८ ख
पराशर उवाच:
अप्रिय़ाण्यवमानांश्च दुःखं वहुविधात्मकम् |
२९ क
पराशर उवाच:
फलार्थी सत्पथत्यक्तः प्राप्नोति विषय़ात्मकम् ||
२९ ख
पराशर उवाच:
धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जाय़ते |
३० क
पराशर उवाच:
स कृत्वा पापकान्येव निरय़ं प्रतिपद्यते ||
३० ख
पराशर उवाच:
सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वापि नरोत्तम |
३१ क
पराशर उवाच:
स्ववृत्ताद्यो न चलति शास्त्रचक्षुः स मानवः ||
३१ ख
पराशर उवाच:
इषुप्रपातमात्रं हि स्पर्शय़ोगे रतिः स्मृता |
३२ क
पराशर उवाच:
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशां पते ||
३२ ख
पराशर उवाच:
ततोऽस्य जाय़ते तीव्रा वेदना तत्क्षय़ात्पुनः |
३३ क
पराशर उवाच:
वुधा येन प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ||
३३ ख
पराशर उवाच:
ततः फलार्थं चरति भवन्ति ज्याय़सो गुणाः |
३४ क
पराशर उवाच:
धर्मवृत्त्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीय़ते ||
३४ ख
पराशर उवाच:
अप्रय़त्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषय़ाः सदा |
३५ क
पराशर उवाच:
प्रय़त्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ||
३५ ख
पराशर उवाच:
मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् |
३६ क
पराशर उवाच:
धर्मक्रिय़ाविय़ुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ||
३६ ख
पराशर उवाच:
क्रिय़माणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम् |
३७ क
पराशर उवाच:
तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ||
३७ ख
पराशर उवाच:
सर्वात्मना तु कुर्वीत गृहस्थः कर्मनिश्चय़म् |
३८ क
पराशर उवाच:
दाक्ष्येण हव्यकव्यार्थं स्वधर्मं विचरेन्नृप ||
३८ ख
पराशर उवाच:
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् |
३९ क
पराशर उवाच:
एवमाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ||
३९ ख