chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २८६
पराशर उवाच:
पिता सखाय़ो गुरवः स्त्रिय़श्च; न निर्गुणा नाम भवन्ति लोके |
१ क
पराशर उवाच:
अनन्यभक्ताः प्रिय़वादिनश्च; हिताश्च वश्याश्च तथैव राजन् ||
१ ख
पराशर उवाच:
पिता परं दैवतं मानवानां; मातुर्विशिष्टं पितरं वदन्ति |
२ क
पराशर उवाच:
ज्ञानस्य लाभं परमं वदन्ति; जितेन्द्रिय़ार्थाः परमाप्नुवन्ति ||
२ ख
पराशर उवाच:
रणाजिरे यत्र शराग्निसंस्तरे; नृपात्मजो घातमवाप्य दह्यते |
३ क
पराशर उवाच:
प्रय़ाति लोकानमरैः सुदुर्लभा; न्निषेवते स्वर्गफलं यथासुखम् ||
३ ख
पराशर उवाच:
श्रान्तं भीतं भ्रष्टशस्त्रं रुदन्तं; पराङ्मुखं परिवर्हैश्च हीनम् |
४ क
पराशर उवाच:
अनुद्यतं रोगिणं याचमानं; न वै हिंस्याद्वालवृद्धौ च राजन् ||
४ ख
पराशर उवाच:
परिवर्हैः सुसम्पन्नमुद्यतं तुल्यतां गतम् |
५ क
पराशर उवाच:
अतिक्रमेत नृपतिः सङ्ग्रामे क्षत्रिय़ात्मजम् ||
५ ख
पराशर उवाच:
तुल्यादिह वधः श्रेय़ान्विशिष्टाच्चेति निश्चय़ः |
६ क
पराशर उवाच:
निहीनात्कातराच्चैव नृपाणां गर्हितो वधः ||
६ ख
पराशर उवाच:
पापात्पापसमाचारान्निहीनाच्च नराधिप |
७ क
पराशर उवाच:
पाप एव वधः प्रोक्तो नरकाय़ेति निश्चय़ः ||
७ ख
पराशर उवाच:
न कश्चित्त्राति वै राजन्दिष्टान्तवशमागतम् |
८ क
पराशर उवाच:
सावशेषाय़ुषं चापि कश्चिदेवापकर्षति ||
८ ख
पराशर उवाच:
स्निग्धैश्च क्रिय़माणानि कर्माणीह निवर्तय़ेत् |
९ क
पराशर उवाच:
हिंसात्मकानि कर्माणि नाय़ुरिच्छेत्पराय़ुषा ||
९ ख
पराशर उवाच:
गृहस्थानां तु सर्वेषां विनाशमभिकाङ्क्षताम् |
१० क
पराशर उवाच:
निधनं शोभनं तात पुलिनेषु क्रिय़ावताम् ||
१० ख
पराशर उवाच:
आय़ुषि क्षय़मापन्ने पञ्चत्वमुपगच्छति |
११ क
पराशर उवाच:
नाकारणात्तद्भवति कारणैरुपपादितम् ||
११ ख
पराशर उवाच:
तथा शरीरं भवति देहाद्येनोपपादितम् |
१२ क
पराशर उवाच:
अध्वानं गतकश्चाय़ं प्राप्तश्चाय़ं गृहाद्गृहम् ||
१२ ख
पराशर उवाच:
द्वितीय़ं कारणं तत्र नान्यत्किञ्चन विद्यते |
१३ क
पराशर उवाच:
तद्देहं देहिनां युक्तं मोक्षभूतेषु वर्तते ||
१३ ख
पराशर उवाच:
सिरास्नाय़्वस्थिसङ्घातं वीभत्सामेध्यसङ्कुलम् |
१४ क
पराशर उवाच:
भूतानामिन्द्रिय़ाणां च गुणानां च समागमम् ||
१४ ख
पराशर उवाच:
त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तकाः |
१५ क
पराशर उवाच:
गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम् ||
१५ ख
पराशर उवाच:
शरीरिणा परित्यक्तं निश्चेष्टं गतचेतनम् |
१६ क
पराशर उवाच:
भूतैः प्रकृतिमापन्नैस्ततो भूमौ निमज्जति ||
१६ ख
पराशर उवाच:
भावितं कर्मय़ोगेन जाय़ते तत्र तत्र ह |
१७ क
पराशर उवाच:
इदं शरीरं वैदेह म्रिय़ते यत्र तत्र ह |
१७ ख
पराशर उवाच:
तत्स्वभावोऽपरो दृष्टो विसर्गः कर्मणस्तथा ||
१७ ग
पराशर उवाच:
न जाय़ते तु नृपते कञ्चित्कालमय़ं पुनः |
१८ क
पराशर उवाच:
परिभ्रमति भूतात्मा द्यामिवाम्वुधरो महान् ||
१८ ख
पराशर उवाच:
स पुनर्जाय़ते राजन्प्राप्येहाय़तनं नृप |
१९ क
पराशर उवाच:
मनसः परमो ह्यात्मा इन्द्रिय़ेभ्यः परं मनः ||
१९ ख
पराशर उवाच:
द्विविधानां च भूतानां जङ्गमाः परमा नृप |
२० क
पराशर उवाच:
जङ्गमानामपि तथा द्विपदाः परमा मताः |
२० ख
पराशर उवाच:
द्विपदानामपि तथा द्विजा वै परमाः स्मृताः ||
२० ग
पराशर उवाच:
द्विजानामपि राजेन्द्र प्रज्ञावन्तः परा मताः |
२१ क
पराशर उवाच:
प्राज्ञानामात्मसम्वुद्धाः सम्वुद्धानाममानिनः ||
२१ ख
पराशर उवाच:
जातमन्वेति मरणं नृणामिति विनिश्चय़ः |
२२ क
पराशर उवाच:
अन्तवन्ति हि कर्माणि सेवन्ते गुणतः प्रजाः ||
२२ ख
पराशर उवाच:
आपन्ने तूत्तरां काष्ठां सूर्ये यो निधनं व्रजेत् |
२३ क
पराशर उवाच:
नक्षत्रे च मुहूर्ते च पुण्ये राजन्स पुण्यकृत् ||
२३ ख
पराशर उवाच:
अय़ोजय़ित्वा क्लेशेन जनं प्लाव्य च दुष्कृतम् |
२४ क
पराशर उवाच:
मृत्युनाप्राकृतेनेह कर्म कृत्वात्मशक्तितः ||
२४ ख
पराशर उवाच:
विषमुद्वन्धनं दाहो दस्युहस्तात्तथा वधः |
२५ क
पराशर उवाच:
दंष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च प्राकृतो वध उच्यते ||
२५ ख
पराशर उवाच:
न चैभिः पुण्यकर्माणो युज्यन्ते नाभिसन्धिजैः |
२६ क
पराशर उवाच:
एवंविधैश्च वहुभिरपरैः प्राकृतैरपि ||
२६ ख
पराशर उवाच:
ऊर्ध्वं हित्वा प्रतिष्ठन्ते प्राणाः पुण्यकृतां नृप |
२७ क
पराशर उवाच:
मध्यतो मध्यपुण्यानामधो दुष्कृतकर्मणाम् ||
२७ ख
पराशर उवाच:
एकः शत्रुर्न द्वितीय़ोऽस्ति शत्रु; रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् |
२८ क
पराशर उवाच:
येनावृतः कुरुते सम्प्रय़ुक्तो; घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ||
२८ ख
पराशर उवाच:
प्रवोधनार्थं श्रुतिधर्मय़ुक्तं; वृद्धानुपास्यं च भवेत यस्य |
२९ क
पराशर उवाच:
प्रय़त्नसाध्यो हि स राजपुत्र; प्रज्ञाशरेणोन्मथितः परैति ||
२९ ख
पराशर उवाच:
अधीत्य वेदांस्तपसा व्रह्मचारी; यज्ञाञ्शक्त्या संनिसृज्येह पञ्च |
३० क
पराशर उवाच:
वनं गच्छेत्पुरुषो धर्मकामः; श्रेय़श्चित्वा स्थापय़ित्वा स्ववंशम् ||
३० ख
पराशर उवाच:
उपभोगैरपि त्यक्तं नात्मानमवसादय़ेत् |
३१ क
पराशर उवाच:
चण्डालत्वेऽपि मानुष्यं सर्वथा तात दुर्लभम् ||
३१ ख
पराशर उवाच:
इय़ं हि योनिः प्रथमा यां प्राप्य जगतीपते |
३२ क
पराशर उवाच:
आत्मा वै शक्यते त्रातुं कर्मभिः शुभलक्षणैः ||
३२ ख
पराशर उवाच:
कथं न विप्रणश्येम योनितोऽस्या इति प्रभो |
३३ क
पराशर उवाच:
कुर्वन्ति धर्मं मनुजाः श्रुतिप्रामाण्यदर्शनात् ||
३३ ख
पराशर उवाच:
यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यमिह वै नरः |
३४ क
पराशर उवाच:
धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते ||
३४ ख
पराशर उवाच:
यस्तु प्रीतिपुरोगेण चक्षुषा तात पश्यति |
३५ क
पराशर उवाच:
दीपोपमानि भूतानि यावदर्चिर्न नश्यति ||
३५ ख
पराशर उवाच:
सान्त्वेनानुप्रदानेन प्रिय़वादेन चाप्युत |
३६ क
पराशर उवाच:
समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीय़ते ||
३६ ख
पराशर उवाच:
दानं त्यागः शोभना मूर्तिरद्भ्यो; भूय़ः प्लाव्यं तपसा वै शरीरम् |
३७ क
पराशर उवाच:
सरस्वतीनैमिषपुष्करेषु; ये चाप्यन्ये पुण्यदेशाः पृथिव्याम् ||
३७ ख
पराशर उवाच:
गृहेषु येषामसवः पतन्ति; तेषामथो निर्हरणं प्रशस्तम् |
३८ क
पराशर उवाच:
यानेन वै प्रापणं च श्मशाने; शौचेन नूनं विधिना चैव दाहः ||
३८ ख
पराशर उवाच:
इष्टिः पुष्टिर्यजनं याजनं च; दानं पुण्यानां कर्मणां च प्रय़ोगः |
३९ क
पराशर उवाच:
शक्त्या पित्र्यं यच्च किञ्चित्प्रशस्तं; सर्वाण्यात्मार्थे मानवो यः करोति ||
३९ ख
पराशर उवाच:
धर्मशास्त्राणि वेदाश्च षडङ्गानि नराधिप |
४० क
पराशर उवाच:
श्रेय़सोऽर्थे विधीय़न्ते नरस्याक्लिष्टकर्मणः ||
४० ख
भीष्म उवाच:
एवद्वै सर्वमाख्यातं मुनिना सुमहात्मना |
४१ क
भीष्म उवाच:
विदेहराजाय़ पुरा श्रेय़सोऽर्थे नराधिप ||
४१ ख