chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २८७
भीष्म उवाच:
पुनरेव तु पप्रच्छ जनको मिथिलाधिपः |
१ क
भीष्म उवाच:
पराशरं महात्मानं धर्मे परमनिश्चय़म् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
किं श्रेय़ः का गतिर्व्रह्मन्किं कृतं न विनश्यति |
२ क
भीष्म उवाच:
क्व गतो न निवर्तेत तन्मे व्रूहि महामुने ||
२ ख
पराशर उवाच:
असङ्गः श्रेय़सो मूलं ज्ञानं ज्ञानगतिः परा |
३ क
पराशर उवाच:
चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ||
३ ख
पराशर उवाच:
छित्त्वाधर्ममय़ं पाशं यदा धर्मेऽभिरज्यते |
४ क
पराशर उवाच:
दत्त्वाभय़कृतं दानं तदा सिद्धिमवाप्नुय़ात् ||
४ ख
पराशर उवाच:
यो ददाति सहस्राणि गवामश्वशतानि च |
५ क
पराशर उवाच:
अभय़ं सर्वभूतेभ्यस्तद्दानमतिवर्तते ||
५ ख
पराशर उवाच:
वसन्विषय़मध्येऽपि न वसत्येव वुद्धिमान् |
६ क
पराशर उवाच:
संवसत्येव दुर्वुद्धिरसत्सु विषय़ेष्वपि ||
६ ख
पराशर उवाच:
नाधर्मः श्लिष्यते प्राज्ञमापः पुष्करपर्णवत् |
७ क
पराशर उवाच:
अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतु काष्ठवत् ||
७ ख
पराशर उवाच:
नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति |
८ क
पराशर उवाच:
कर्ता खलु यथाकालं तत्सर्वमभिपद्यते |
८ ख
पराशर उवाच:
न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः ||
८ ग
पराशर उवाच:
वुद्धिकर्मेन्द्रिय़ाणां हि प्रमत्तो यो न वुध्यते |
९ क
पराशर उवाच:
शुभाशुभेषु सक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद्भय़म् ||
९ ख
पराशर उवाच:
वीतरागो जितक्रोधः सम्यग्भवति यः सदा |
१० क
पराशर उवाच:
विषय़े वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ||
१० ख
पराशर उवाच:
मर्यादाय़ां धर्मसेतुर्निवद्धो नैव सीदति |
११ क
पराशर उवाच:
पुष्टस्रोत इवाय़त्तः स्फीतो भवति सञ्चय़ः ||
११ ख
पराशर उवाच:
यथा भानुगतं तेजो मणिः शुद्धः समाधिना |
१२ क
पराशर उवाच:
आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ||
१२ ख
पराशर उवाच:
यथा तिलानामिह पुष्पसंश्रय़ा; त्पृथक्पृथग्याति गुणोऽतिसौम्यताम् |
१३ क
पराशर उवाच:
तथा नराणां भुवि भावितात्मनां; यथाश्रय़ं सत्त्वगुणः प्रवर्तते ||
१३ ख
पराशर उवाच:
जहाति दारानिहते न सम्पदः; सदश्वय़ानं विविधाश्च याः क्रिय़ाः |
१४ क
पराशर उवाच:
त्रिविष्टपे जातमतिर्यदा नर; स्तदास्य वुद्धिर्विषय़ेषु भिद्यते ||
१४ ख
पराशर उवाच:
प्रसक्तवुद्धिर्विषय़ेषु यो नरो; यो वुध्यते ह्यात्महितं कदा च न |
१५ क
पराशर उवाच:
स सर्वभावानुगतेन चेतसा; नृपामिषेणेव झषो विकृष्यते ||
१५ ख
पराशर उवाच:
सङ्घातवान्मर्त्यलोकः परस्परमपाश्रितः |
१६ क
पराशर उवाच:
कदलीगर्भनिःसारो नौरिवाप्सु निमज्जति ||
१६ ख
पराशर उवाच:
न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो; न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते |
१७ क
पराशर उवाच:
क्रिय़ा हि धर्मस्य सदैव शोभना; यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ||
१७ ख
पराशर उवाच:
यथान्धः स्वगृहे युक्तो ह्यभ्यासादेव गच्छति |
१८ क
पराशर उवाच:
तथा युक्तेन मनसा प्राज्ञो गच्छति तां गतिम् ||
१८ ख
पराशर उवाच:
मरणं जन्मनि प्रोक्तं जन्म वै मरणाश्रितम् |
१९ क
पराशर उवाच:
अविद्वान्मोक्षधर्मेषु वद्धो भ्रमति चक्रवत् ||
१९ ख
पराशर उवाच:
यथा मृणालोऽनुगतमाशु मुञ्चति कर्दमम् |
२० क
पराशर उवाच:
तथात्मा पुरुषस्येह मनसा परिमुच्यते |
२० ख
पराशर उवाच:
मनः प्रणय़तेऽऽत्मानं स एनमभिय़ुञ्जति ||
२० ग
पराशर उवाच:
परार्थे वर्तमानस्तु स्वकार्यं योऽभिमन्यते |
२१ क
पराशर उवाच:
इन्द्रिय़ार्थेषु सक्तः सन्स्वकार्यात्परिहीय़ते ||
२१ ख
पराशर उवाच:
अधस्तिर्यग्गतिं चैव स्वर्गे चैव परां गतिम् |
२२ क
पराशर उवाच:
प्राप्नोति स्वकृतैरात्मा प्राज्ञस्येहेतरस्य च ||
२२ ख
पराशर उवाच:
मृन्मय़े भाजने पक्वे यथा वै न्यस्यते द्रवः |
२३ क
पराशर उवाच:
तथा शरीरं तपसा तप्तं विषय़मश्नुते ||
२३ ख
पराशर उवाच:
विषय़ानश्नुते यस्तु न स भोक्ष्यत्यसंशय़म् |
२४ क
पराशर उवाच:
यस्तु भोगांस्त्यजेदात्मा स वै भोक्तुं व्यवस्यति ||
२४ ख
पराशर उवाच:
नीहारेण हि संवीतः शिश्नोदरपराय़णः |
२५ क
पराशर उवाच:
जात्यन्ध इव पन्थानमावृतात्मा न वुध्यते ||
२५ ख
पराशर उवाच:
वणिग्यथा समुद्राद्वै यथार्थं लभते धनम् |
२६ क
पराशर उवाच:
तथा मर्त्यार्णवे जन्तोः कर्मविज्ञानतो गतिः ||
२६ ख
पराशर उवाच:
अहोरात्रमय़े लोके जरारूपेण सञ्चरन् |
२७ क
पराशर उवाच:
मृत्युर्ग्रसति भूतानि पवनं पन्नगो यथा ||
२७ ख
पराशर उवाच:
स्वय़ं कृतानि कर्माणि जातो जन्तुः प्रपद्यते |
२८ क
पराशर उवाच:
नाकृतं लभते कश्चित्किञ्चिदत्र प्रिय़ाप्रिय़म् ||
२८ ख
पराशर उवाच:
शय़ानं यान्तमासीनं प्रवृत्तं विषय़ेषु च |
२९ क
पराशर उवाच:
शुभाशुभानि कर्माणि प्रपद्यन्ते नरं सदा ||
२९ ख
पराशर उवाच:
न ह्यन्यत्तीरमासाद्य पुनस्तर्तुं व्यवस्यति |
३० क
पराशर उवाच:
दुर्लभो दृश्यते ह्यस्य विनिपातो महार्णवे ||
३० ख
पराशर उवाच:
यथा भारावसक्ता हि नौर्महाम्भसि तन्तुना |
३१ क
पराशर उवाच:
तथा मनोऽभिय़ोगाद्वै शरीरं प्रतिकर्षति ||
३१ ख
पराशर उवाच:
यथा समुद्रमभितः संस्यूताः सरितोऽपराः |
३२ क
पराशर उवाच:
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंस्यूय़ते सदा ||
३२ ख
पराशर उवाच:
स्नेहपाशैर्वहुविधैरासक्तमनसो नराः |
३३ क
पराशर उवाच:
प्रकृतिस्था विषीदन्ति जले सैकतवेश्मवत् ||
३३ ख
पराशर उवाच:
शरीरगृहसंस्थस्य शौचतीर्थस्य देहिनः |
३४ क
पराशर उवाच:
वुद्धिमार्गप्रय़ातस्य सुखं त्विह परत्र च ||
३४ ख
पराशर उवाच:
विस्तराः क्लेशसंय़ुक्ताः सङ्क्षेपास्तु सुखावहाः |
३५ क
पराशर उवाच:
परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ||
३५ ख
पराशर उवाच:
सङ्कल्पजो मित्रवर्गो ज्ञातय़ः कारणात्मकाः |
३६ क
पराशर उवाच:
भार्या दासाश्च पुत्राश्च स्वमर्थमनुय़ुञ्जते ||
३६ ख
पराशर उवाच:
न माता न पिता किञ्चित्कस्यचित्प्रतिपद्यते |
३७ क
पराशर उवाच:
दानपथ्योदनो जन्तुः स्वकर्मफलमश्नुते ||
३७ ख
पराशर उवाच:
माता पुत्रः पिता भ्राता भार्या मित्रजनस्तथा |
३८ क
पराशर उवाच:
अष्टापदपदस्थाने त्वक्षमुद्रेव न्यस्यते ||
३८ ख
पराशर उवाच:
सर्वाणि कर्माणि पुरा कृतानि; शुभाशुभान्यात्मनो यान्ति जन्तोः |
३९ क
पराशर उवाच:
उपस्थितं कर्मफलं विदित्वा; वुद्धिं तथा चोदय़तेऽन्तरात्मा ||
३९ ख
पराशर उवाच:
व्यवसाय़ं समाश्रित्य सहाय़ान्योऽधिगच्छति |
४० क
पराशर उवाच:
न तस्य कश्चिदारम्भः कदाचिदवसीदति ||
४० ख
पराशर उवाच:
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम् |
४१ क
पराशर उवाच:
न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मय़ः ||
४१ ख
पराशर उवाच:
आस्तिक्यव्यवसाय़ाभ्यामुपाय़ाद्विस्मय़ाद्धिय़ा |
४२ क
पराशर उवाच:
यमारभत्यनिन्द्यात्मा न सोऽर्थः परिसीदति ||
४२ ख
पराशर उवाच:
गर्भात्सम्प्रतिपद्यते तदुभय़ं यत्तेन पूर्वं कृतम् |
४३ क
पराशर उवाच:
दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापय़ेत् ||
४३ ख
पराशर उवाच:
स्वरूपतामात्मकृतं च विस्तरं; कुलान्वय़ं द्रव्यसमृद्धिसञ्चय़म् |
४४ क
पराशर उवाच:
नरो हि सर्वो लभते यथाकृतं; शुभाशुभेनात्मकृतेन कर्मणा ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तो जनको राजन्यथातथ्यं मनीषिणा |
४५ क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा धर्मविदां श्रेष्ठः परां मुदमवाप ह ||
४५ ख