सूत उवाच:
जाम्वूनदमय़ो भूत्वा मरीचिविकचोज्ज्वलः |
१ क
सूत उवाच:
प्रविवेश वलात्पक्षी वारिवेग इवार्णवम् ||
१ ख
सूत उवाच:
स चक्रं क्षुरपर्यन्तमपश्यदमृतान्तिके |
२ क
सूत उवाच:
परिभ्रमन्तमनिशं तीक्ष्णधारमय़स्मय़म् ||
२ ख
सूत उवाच:
ज्वलनार्कप्रभं घोरं छेदनं सोमहारिणाम् |
३ क
सूत उवाच:
घोररूपं तदत्यर्थं यन्त्रं देवैः सुनिर्मितम् ||
३ ख
सूत उवाच:
तस्यान्तरं स दृष्ट्वैव पर्यवर्तत खेचरः |
४ क
सूत उवाच:
अरान्तरेणाभ्यपतत्सङ्क्षिप्याङ्गं क्षणेन ह ||
४ ख
सूत उवाच:
अधश्चक्रस्य चैवात्र दीप्तानलसमद्युती |
५ क
सूत उवाच:
विद्युज्जिह्वौ महाघोरौ दीप्तास्यौ दीप्तलोचनौ ||
५ ख
सूत उवाच:
चक्षुर्विषौ महावीर्यौ नित्यक्रुद्धौ तरस्विनौ |
६ क
सूत उवाच:
रक्षार्थमेवामृतस्य ददर्श भुजगोत्तमौ ||
६ ख
सूत उवाच:
सदा संरव्धनय़नौ सदा चानिमिषेक्षणौ |
७ क
सूत उवाच:
तय़ोरेकोऽपि यं पश्येत्स तूर्णं भस्मसाद्भवेत् ||
७ ख
सूत उवाच:
तय़ोश्चक्षूंषि रजसा सुपर्णस्तूर्णमावृणोत् |
८ क
सूत उवाच:
अदृष्टरूपस्तौ चापि सर्वतः पर्यकालय़त् ||
८ ख
सूत उवाच:
तय़ोरङ्गे समाक्रम्य वैनतेय़ोऽन्तरिक्षगः |
९ क
सूत उवाच:
आच्छिनत्तरसा मध्ये सोममभ्यद्रवत्ततः ||
९ ख
सूत उवाच:
समुत्पाट्यामृतं तत्तु वैनतेय़स्ततो वली |
१० क
सूत उवाच:
उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ||
१० ख
सूत उवाच:
अपीत्वैवामृतं पक्षी परिगृह्याशु वीर्यवान् |
११ क
सूत उवाच:
अगच्छदपरिश्रान्त आवार्यार्कप्रभां खगः ||
११ ख
सूत उवाच:
विष्णुना तु तदाकाशे वैनतेय़ः समेय़िवान् |
१२ क
सूत उवाच:
तस्य नाराय़णस्तुष्टस्तेनालौल्येन कर्मणा ||
१२ ख
सूत उवाच:
तमुवाचाव्ययो देवो वरदोऽस्मीति खेचरम् |
१३ क
सूत उवाच:
स वव्रे तव तिष्ठेय़मुपरीत्यन्तरिक्षगः ||
१३ ख
सूत उवाच:
उवाच चैनं भूय़ोऽपि नाराय़णमिदं वचः |
१४ क
सूत उवाच:
अजरश्चामरश्च स्याममृतेन विनाप्यहम् ||
१४ ख
सूत उवाच:
प्रतिगृह्य वरौ तौ च गरुडो विष्णुमव्रवीत् |
१५ क
सूत उवाच:
भवतेऽपि वरं दद्मि वृणीतां भगवानपि ||
१५ ख
सूत उवाच:
तं वव्रे वाहनं कृष्णो गरुत्मन्तं महावलम् |
१६ क
सूत उवाच:
ध्वजं च चक्रे भगवानुपरि स्थास्यसीति तम् ||
१६ ख
सूत उवाच:
अनुपत्य खगं त्विन्द्रो वज्रेणाङ्गेऽभ्यताडय़त् |
१७ क
सूत उवाच:
विहङ्गमं सुरामित्रं हरन्तममृतं वलात् ||
१७ ख
सूत उवाच:
तमुवाचेन्द्रमाक्रन्दे गरुडः पततां वरः |
१८ क
सूत उवाच:
प्रहसञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा तथा वज्रसमाहतः ||
१८ ख
सूत उवाच:
ऋषेर्मानं करिष्यामि वज्रं यस्यास्थिसम्भवम् |
१९ क
सूत उवाच:
वज्रस्य च करिष्यामि तव चैव शतक्रतो ||
१९ ख
सूत उवाच:
एष पत्रं त्यजाम्येकं यस्यान्तं नोपलप्स्यसे |
२० क
सूत उवाच:
न हि वज्रनिपातेन रुजा मेऽस्ति कदाचन ||
२० ख
सूत उवाच:
तत्र तं सर्वभूतानि विस्मितान्यव्रुवंस्तदा |
२१ क
सूत उवाच:
सुरूपं पत्रमालक्ष्य सुपर्णोऽय़ं भवत्विति ||
२१ ख
सूत उवाच:
दृष्ट्वा तदद्भुतं चापि सहस्राक्षः पुरन्दरः |
२२ क
सूत उवाच:
खगो महदिदं भूतमिति मत्वाभ्यभाषत ||
२२ ख
सूत उवाच:
वलं विज्ञातुमिच्छामि यत्ते परमनुत्तमम् |
२३ क
सूत उवाच:
सख्यं चानन्तमिच्छामि त्वय़ा सह खगोत्तम ||
२३ ख