भीष्म उवाच:
एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः |
१ क
भीष्म उवाच:
अतिष्ठदेकपादेन वर्षाणां शतमच्युत ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तमुवाच ततः शक्रः पुनरेव महाय़शाः |
२ क
भीष्म उवाच:
मतङ्ग परमं स्थानं प्रार्थय़न्नतिदुर्लभम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
मा कृथाः साहसं पुत्र नैष धर्मपथस्तव |
३ क
भीष्म उवाच:
अप्राप्यं प्रार्थय़ानो हि नचिराद्विनशिष्यसि ||
३ ख
भीष्म उवाच:
मतङ्ग परमं स्थानं वार्यमाणो मय़ा सकृत् |
४ क
भीष्म उवाच:
चिकीर्षस्येव तपसा सर्वथा न भविष्यसि ||
४ ख
भीष्म उवाच:
तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति |
५ क
भीष्म उवाच:
स जाय़ते पुल्कसो वा चण्डालो वा कदाचन ||
५ ख
भीष्म उवाच:
पुंश्चलः पापय़ोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते |
६ क
भीष्म उवाच:
स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते ||
६ ख
भीष्म उवाच:
ततो दशगुणे काले लभते शूद्रतामपि |
७ क
भीष्म उवाच:
शूद्रय़ोनावपि ततो वहुशः परिवर्तते ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि |
८ क
भीष्म उवाच:
वैश्यताय़ां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जाय़ते |
९ क
भीष्म उवाच:
राजन्यत्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ततः षष्टिगुणे काले लभते व्रह्मवन्धुताम् |
१० क
भीष्म उवाच:
व्रह्मवन्धुश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम् |
११ क
भीष्म उवाच:
काण्डपृष्ठश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तु त्रिशते काले लभते द्विजतामपि |
१२ क
भीष्म उवाच:
तां च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ततश्चतुःशते काले श्रोत्रिय़ो नाम जाय़ते |
१३ क
भीष्म उवाच:
श्रोत्रिय़त्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तदैव क्रोधहर्षौ च कामद्वेषौ च पुत्रक |
१४ क
भीष्म उवाच:
अतिमानातिवादौ तमाविशन्ति द्विजाधमम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तांश्चेज्जय़ति शत्रून्स तदा प्राप्नोति सद्गतिम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
अथ ते वै जय़न्त्येनं तालाग्रादिव पात्यते ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
मतङ्ग सम्प्रधार्यैतद्यदहं त्वामचूचुदम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
वृणीष्व काममन्यं त्वं व्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम् ||
१६ ख