chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २९०
भीष्म उवाच:
देहविक्लवतां चैव सम्यग्विज्ञाय़ भारत ||
५० ख
भीष्म उवाच:
आत्मदोषांश्च विज्ञाय़ सर्वानात्मनि संश्रितान् |
५१ क
भीष्म उवाच:
स्वदेहादुत्थितान्गन्धांस्तथा विज्ञाय़ चाशुभान् ||
५१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
कान्स्वगात्रोद्भवान्दोषान्पश्यस्यमितविक्रम |
५२ क
युधिष्ठिर उवाच:
एतन्मे संशय़ं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
पञ्च दोषान्प्रभो देहे प्रवदन्ति मनीषिणः |
५३ क
भीष्म उवाच:
मार्गज्ञाः कापिलाः साङ्ख्याः शृणु तानरिसूदन ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
कामक्रोधौ भय़ं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते |
५४ क
भीष्म उवाच:
एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
छिन्दन्ति क्षमय़ा क्रोधं कामं सङ्कल्पवर्जनात् |
५५ क
भीष्म उवाच:
सत्त्वसंशीलनान्निद्रामप्रमादाद्भय़ं तथा |
५५ ख
भीष्म उवाच:
छिन्दन्ति पञ्चमं श्वासं लघ्वाहारतय़ा नृप ||
५५ ग
भीष्म उवाच:
गुणान्गुणशतैर्ज्ञात्वा दोषान्दोषशतैरपि |
५६ क
भीष्म उवाच:
हेतून्हेतुशतैश्चित्रैश्चित्रान्विज्ञाय़ तत्त्वतः ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
अपां फेनोपमं लोकं विष्णोर्माय़ाशतैर्वृतम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
चित्तभित्तिप्रतीकाशं नलसारमनर्थकम् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
तमः श्वभ्रनिभं दृष्ट्वा वर्षवुद्वुदसंनिभम् |
५८ क
भीष्म उवाच:
नाशप्राय़ं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमभावगम् |
५८ ख
भीष्म उवाच:
रजस्तमसि संमग्नं पङ्के द्विपमिवावशम् ||
५८ ग
भीष्म उवाच:
साङ्ख्या राजन्महाप्राज्ञास्त्यक्त्वा देहं प्रजाकृतम् |
५९ क
भीष्म उवाच:
ज्ञानज्ञेय़ेन साङ्ख्येन व्यापिना महता नृप ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
राजसानशुभान्गन्धांस्तामसांश्च तथाविधान् |
६० क
भीष्म उवाच:
पुण्यांश्च सात्त्विकान्गन्धान्स्पर्शजान्देहसंश्रितान् |
६० ख
भीष्म उवाच:
छित्त्वाशु ज्ञानशस्त्रेण तपोदण्डेन भारत ||
६० ग
भीष्म उवाच:
ततो दुःखोदकं घोरं चिन्ताशोकमहाह्रदम् |
६१ क
भीष्म उवाच:
व्याधिमृत्युमहाग्राहं महाभय़महोरगम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
तमःकूर्मं रजोमीनं प्रज्ञय़ा सन्तरन्त्युत |
६२ क
भीष्म उवाच:
स्नेहपङ्कं जरादुर्गं स्पर्शद्वीपमरिन्दम ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
कर्मागाधं सत्यतीरं स्थितव्रतमिदं नृप |
६३ क
भीष्म उवाच:
हिंसाशीघ्रमहावेगं नानारसमहाकरम् ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
नानाप्रीतिमहारत्नं दुःखज्वरसमीरणम् |
६४ क
भीष्म उवाच:
शोकतृष्णामहावर्तं तीक्ष्णव्याधिमहागजम् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
अस्थिसङ्घातसङ्घाटं श्लेष्मफेनमरिन्दम |
६५ क
भीष्म उवाच:
दानमुक्ताकरं भीमं शोणितह्रदविद्रुमम् ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
हसितोत्क्रुष्टनिर्घोषं नानाज्ञानसुदुस्तरम् |
६६ क
भीष्म उवाच:
रोदनाश्रुमलक्षारं सङ्गत्यागपराय़णम् ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
पुनराजन्मलोकौघं पुत्रवान्धवपत्तनम् |
६७ क
भीष्म उवाच:
अहिंसासत्यमर्यादं प्राणत्यागमहोर्मिणम् ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
वेदान्तगमनद्वीपं सर्वभूतदय़ोदधिम् |
६८ क
भीष्म उवाच:
मोक्षदुष्प्रापविषय़ं वडवामुखसागरम् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
तरन्ति मुनय़ः सिद्धा ज्ञानय़ोगेन भारत |
६९ क
भीष्म उवाच:
तीर्त्वा च दुस्तरं जन्म विशन्ति विमलं नभः ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तान्सुकृतीन्साङ्ख्यान्सूर्यो वहति रश्मिभिः |
७० क
भीष्म उवाच:
पद्मतन्तुवदाविश्य प्रवहन्विषय़ान्नृप ||
७० ख
भीष्म उवाच:
तत्र तान्प्रवहो वाय़ुः प्रतिगृह्णाति भारत |
७१ क
भीष्म उवाच:
वीतरागान्यतीन्सिद्धान्वीर्ययुक्तांस्तपोधनान् ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
सूक्ष्मः शीतः सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत |
७२ क
भीष्म उवाच:
सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान्गच्छति यः शुभान् |
७२ ख
भीष्म उवाच:
स तान्वहति कौन्तेय़ नभसः परमां गतिम् ||
७२ ग
भीष्म उवाच:
नभो वहति लोकेश रजसः परमां गतिम् |
७३ क
भीष्म उवाच:
रजो वहति राजेन्द्र सत्त्वस्य परमां गतिम् ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
सत्त्वं वहति शुद्धात्मन्परं नाराय़णं प्रभुम् |
७४ क
भीष्म उवाच:
प्रभुर्वहति शुद्धात्मा परमात्मानमात्मना ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
परमात्मानमासाद्य तद्भूताय़तनामलाः |
७५ क
भीष्म उवाच:
अमृतत्वाय़ कल्पन्ते न निवर्तन्ति चाभिभो |
७५ ख
भीष्म उवाच:
परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् ||
७५ ग
युधिष्ठिर उवाच:
स्थानमुत्तममासाद्य भगवन्तं स्थिरव्रताः |
७६ क
युधिष्ठिर उवाच:
आजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत न वानघ ||
७६ ख
युधिष्ठिर उवाच:
यदत्र तथ्यं तन्मे त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि |
७७ क
युधिष्ठिर उवाच:
त्वदृते मानवं नान्यं प्रष्टुमर्हामि कौरव ||
७७ ख
युधिष्ठिर उवाच:
मोक्षदोषो महानेष प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन् |
७८ क
युधिष्ठिर उवाच:
यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतय़ः परे ||
७८ ख
युधिष्ठिर उवाच:
प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं पश्यामि परमं नृप |
७९ क
युधिष्ठिर उवाच:
मग्नस्य हि परे ज्ञाने किं नु दुःखतरं भवेत् ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
यथान्याय़ं त्वय़ा तात प्रश्नः पृष्टः सुसङ्कटः |
८० क
भीष्म उवाच:
वुद्धानामपि संमोहः प्रश्नेऽस्मिन्भरतर्षभ |
८० ख
भीष्म उवाच:
अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ्मय़ेरितम् ||
८० ग
भीष्म उवाच:
वुद्धिश्च परमा यत्र कापिलानां महात्मनाम् |
८१ क
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ाण्यपि वुध्यन्ते स्वदेहं देहिनो नृप |
८१ ख
भीष्म उवाच:
कारणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ||
८१ ग
भीष्म उवाच:
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु |
८२ क
भीष्म उवाच:
विनश्यन्ति न सन्देहः फेना इव महार्णवे ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन |
८३ क
भीष्म उवाच:
सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
स पश्यति यथान्याय़ं स्पर्शान्स्पृशति चाभिभो |
८४ क
भीष्म उवाच:
वुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ाणीह सर्वाणि स्वे स्वे स्थाने यथाविधि |
८५ क
भीष्म उवाच:
अनीशत्वात्प्रलीय़न्ते सर्पा हतविषा इव ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ाणां तु सर्वेषां स्वस्थानेष्वेव सर्वशः |
८६ क
भीष्म उवाच:
आक्रम्य गतय़ः सूक्ष्माश्चरत्यात्मा न संशय़ः ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
सत्त्वस्य च गुणान्कृत्स्नान्रजसश्च गुणान्पुनः |
८७ क
भीष्म उवाच:
गुणांश्च तमसः सर्वान्गुणान्वुद्धेश्च भारत ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
गुणांश्च मनसस्तद्वन्नभसश्च गुणांस्तथा |
८८ क
भीष्म उवाच:
गुणान्वाय़ोश्च धर्मात्मंस्तेजसश्च गुणान्पुनः ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि |
८९ क
भीष्म उवाच:
सर्वात्मना गुणैर्व्याप्य क्षेत्रज्ञः स युधिष्ठिर ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
आत्मा च याति क्षेत्रज्ञं कर्मणी च शुभाशुभे |
९० क
भीष्म उवाच:
शिष्या इव महात्मानमिन्द्रिय़ाणि च तं विभो ||
९० ख
भीष्म उवाच:
प्रकृतिं चाप्यतिक्रम्य गच्छत्यात्मानमव्ययम् |
९१ क
भीष्म उवाच:
परं नाराय़णात्मानं निर्द्वन्द्वं प्रकृतेः परम् ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
विमुक्तः पुण्यपापेभ्यः प्रविष्टस्तमनामय़म् |
९२ क
भीष्म उवाच:
परमात्मानमगुणं न निवर्तति भारत ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
शिष्टं त्वत्र मनस्तात इन्द्रिय़ाणि च भारत |
९३ क
भीष्म उवाच:
आगच्छन्ति यथाकालं गुरोः सन्देशकारिणः ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
शक्यं चाल्पेन कालेन शान्तिं प्राप्तुं गुणार्थिना |
९४ क
भीष्म उवाच:
एवं युक्तेन कौन्तेय़ युक्तज्ञानेन मोक्षिणा ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
साङ्ख्या राजन्महाप्राज्ञा गच्छन्ति परमां गतिम् |
९५ क
भीष्म उवाच:
ज्ञानेनानेन कौन्तेय़ तुल्यं ज्ञानं न विद्यते ||
९५ ख
भीष्म उवाच:
अत्र ते संशय़ो मा भूज्ज्ञानं साङ्ख्यं परं मतम् |
९६ क
भीष्म उवाच:
अक्षरं ध्रुवमव्यक्तं पूर्वं व्रह्म सनातनम् ||
९६ ख