chevron_left वन पर्व अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः श्रुत्वा हतं सङ्ख्ये कुम्भकर्णं सहानुगम् |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम् ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुत्रमिन्द्रजितं शूरं रावणः प्रत्यभाषत |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जहि रामममित्रघ्न सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वय़ा हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जित्वा वज्रधरं सङ्ख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तर्हितः प्रकाशो वा दिव्यैर्दत्तवरैः शरैः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जहि शत्रूनमित्रघ्न मम शस्त्रभृतां वर ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामलक्ष्मणसुग्रीवाः शरस्पर्शं न तेऽनघ |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समर्थाः प्रतिसंसोढुं कुतस्तदनुय़ाय़िनः ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अकृता या प्रहस्तेन कुम्भकर्णेन चानघ |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खरस्यापचितिः सङ्ख्ये तां गच्छस्व महाभुज ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वमद्य निशितैर्वाणैर्हत्वा शत्रून्ससैनिकान् |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रतिनन्दय़ मां पुत्र पुरा वद्ध्वेव वासवम् ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा रथमास्थाय़ दंशितः |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रय़याविन्द्रजिद्राजंस्तूर्णमाय़ोधनं प्रति ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आह्वय़ामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं लक्ष्मणोऽप्यभ्यधावत्प्रगृह्य सशरं धनुः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रासय़ंस्तलघोषेण सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तय़ोः समभवद्युद्धं सुमहज्जय़गृद्धिनोः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिव्यास्त्रविदुषोस्तीव्रमन्योन्यस्पर्धिनोस्तदा ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणिस्तु यदा नैनं विशेषय़ति साय़कैः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो गुरुतरं यत्नमातिष्ठद्वलिनां वरः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत एनं महावेगैरर्दय़ामास तोमरैः |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तानागतान्स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः |
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ते निकृत्ताः शरैस्तीक्ष्णैर्न्यपतन्वसुधातले ||
१३ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमङ्गदो वालिसुतः श्रीमानुद्यम्य पादपम् |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिद्रुत्य महावेगस्ताडय़ामास मूर्धनि ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्येन्द्रजिदसम्भ्रान्तः प्रासेनोरसि वीर्यवान् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रहर्तुमैच्छत्तं चास्य प्रासं चिच्छेद लक्ष्मणः ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमभ्याशगतं वीरमङ्गदं रावणात्मजः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गदय़ाताडय़त्सव्ये पार्श्वे वानरपुङ्गवम् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमचिन्त्य प्रहारं स वलवान्वालिनः सुतः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ससर्जेन्द्रजितः क्रोधाच्छालस्कन्धममित्रजित् ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽङ्गदेन रुषोत्सृष्टो वधाय़ेन्द्रजितस्तरुः |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जघानेन्द्रजितः पार्थ रथं साश्वं ससारथिम् ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो हताश्वात्प्रस्कन्द्य रथात्स हतसारथिः |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्रैवान्तर्दधे राजन्माय़या रावणात्मजः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तर्हितं विदित्वा तं वहुमाय़ं च राक्षसम् |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामस्तं देशमागम्य तत्सैन्यं पर्यरक्षत ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स राममुद्दिश्य शरैस्ततो दत्तवरैस्तदा |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महारथम् ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमदृश्यं शरैः शूरौ माय़यान्तर्हितं तदा |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
योधय़ामासतुरुभौ रावणिं रामलक्ष्मणौ ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स रुषा सर्वगात्रेषु तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्यसृजत्साय़कान्भूय़ः शतशोऽथ सहस्रशः ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हरय़ो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स भृशं ताडय़न्वीरो रावणिर्माय़यावृतः ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ शरैराचितौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पेततुर्गगनाद्भूमिं सूर्याचन्द्रमसाविव ||
२६ ख