chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २९७
भीष्म उवाच:
मृगय़ां विचरन्कश्चिद्विजने जनकात्मजः |
१ क
भीष्म उवाच:
वने ददर्श विप्रेन्द्रमृषिं वंशधरं भृगोः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तमासीनमुपासीनः प्रणम्य शिरसा मुनिम् |
२ क
भीष्म उवाच:
पश्चादनुमतस्तेन पप्रच्छ वसुमानिदम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
भगवन्किमिदं श्रेय़ः प्रेत्य वापीह वा भवेत् |
३ क
भीष्म उवाच:
पुरुषस्याध्रुवे देहे कामस्य वशवर्तिनः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सत्कृत्य परिपृष्टः सन्सुमहात्मा महातपाः |
४ क
भीष्म उवाच:
निजगाद ततस्तस्मै श्रेय़स्करमिदं वचः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
मनसोऽप्रतिकूलानि प्रेत्य चेह च वाञ्छसि |
५ क
भीष्म उवाच:
भूतानां प्रतिकूलेभ्यो निवर्तस्व यतेन्द्रिय़ः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
धर्मः सतां हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रय़ः सताम् |
६ क
भीष्म उवाच:
धर्माल्लोकास्त्रय़स्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
स्वादुकामुक कामानां वैतृष्ण्यं किं न गच्छसि |
७ क
भीष्म उवाच:
मधु पश्यसि दुर्वुद्धे प्रपातं नानुपश्यसि ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यथा ज्ञाने परिचय़ः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना |
८ क
भीष्म उवाच:
तथा धर्मे परिचय़ः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ||
८ ख
भीष्म उवाच:
असता धर्मकामेन विशुद्धं कर्म दुष्करम् |
९ क
भीष्म उवाच:
सता तु धर्मकामेन सुकरं कर्म दुष्करम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
वने ग्राम्यसुखाचारो यथा ग्राम्यस्तथैव सः |
१० क
भीष्म उवाच:
ग्रामे वनसुखाचारो यथा वनचरस्तथा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
मनोवाक्कर्मके धर्मे कुरु श्रद्धां समाहितः |
११ क
भीष्म उवाच:
निवृत्तौ वा प्रवृत्तौ वा सम्प्रधार्य गुणागुणान् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
नित्यं च वहु दातव्यं साधुभ्यश्चानसूय़ता |
१२ क
भीष्म उवाच:
प्रार्थितं व्रतशौचाभ्यां सत्कृतं देशकालय़ोः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
शुभेन विधिना लव्धमर्हाय़ प्रतिपादय़ेत् |
१३ क
भीष्म उवाच:
क्रोधमुत्सृज्य दत्त्वा च नानुतप्येन्न कीर्तय़ेत् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
अनृशंसः शुचिर्दान्तः सत्यवागार्जवे स्थितः |
१४ क
भीष्म उवाच:
योनिकर्मविशुद्धश्च पात्रं स्याद्वेदविद्द्विजः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
सत्कृता चैकपत्नी च जात्या योनिरिहेष्यते |
१५ क
भीष्म उवाच:
ऋग्यजुःसामगो विद्वान्षट्कर्मा पात्रमुच्यते ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
स एव धर्मः सोऽधर्मस्तं तं प्रतिनरं भवेत् |
१६ क
भीष्म उवाच:
पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
लीलय़ाल्पं यथा गात्रात्प्रमृज्याद्रजसः पुमान् |
१७ क
भीष्म उवाच:
वहुय़त्नेन महता पापनिर्हरणं तथा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
विरिक्तस्य यथा सम्यग्घृतं भवति भेषजम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
तथा निर्हृतदोषस्य प्रेत्यधर्मः सुखावहः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
मानसं सर्वभूतेषु वर्तते वै शुभाशुभे |
१९ क
भीष्म उवाच:
अशुभेभ्यः समाक्षिप्य शुभेष्वेवावतारय़ेत् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सर्वं सर्वेण सर्वत्र क्रिय़माणं च पूजय़ |
२० क
भीष्म उवाच:
स्वधर्मे यत्र रागस्ते कामं धर्मो विधीय़ताम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
अधृतात्मन्धृतौ तिष्ठ दुर्वुद्धे वुद्धिमान्भव |
२१ क
भीष्म उवाच:
अप्रशान्त प्रशाम्य त्वमप्राज्ञ प्राज्ञवच्चर ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
तेजसा शक्यते प्राप्तुमुपाय़सहचारिणा |
२२ क
भीष्म उवाच:
इह च प्रेत्य च श्रेय़स्तस्य मूलं धृतिः परा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
राजर्षिरधृतिः स्वर्गात्पतितो हि महाभिषः |
२३ क
भीष्म उवाच:
यय़ातिः क्षीणपुण्यश्च धृत्या लोकानवाप्तवान् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तपस्विनां धर्मवतां विदुषां चोपसेवनात् |
२४ क
भीष्म उवाच:
प्राप्स्यसे विपुलां वुद्धिं तथा श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
स तु स्वभावसम्पन्नस्तच्छ्रुत्वा मुनिभाषितम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
विनिवर्त्य मनः कामाद्धर्मे वुद्धिं चकार ह ||
२५ ख