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शल्य पर्व अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच:
न त्वा व्रवीमि कार्पण्यान्न प्राणपरिरक्षणात् |
४९ ख
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सञ्जय़ उवाच:
पथ्यं राजन्व्रवीमि त्वां तत्परासुः स्मरिष्यसि ||
४९ ग
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सञ्जय़ उवाच:
इति वृद्धो विलप्यैतत्कृपः शारद्वतो वचः |
५० क
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सञ्जय़ उवाच:
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य शुशोच च मुमोह च ||
५० ख
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