chevron_left आदि पर्व अध्याय ३
सूत उवाच:
जनमेजय़ः पारिक्षितः सह भ्रातृभिः कुरुक्षेत्रे दीर्घसत्रमुपास्ते |
१ क
सूत उवाच:
तस्य भ्रातरस्त्रय़ः श्रुतसेन उग्रसेनो भीमसेन इति ||
१ ख
सूत उवाच:
तेषु तत्सत्रमुपासीनेषु तत्र श्वाभ्यागच्छत्सारमेय़ः |
२ क
सूत उवाच:
स जनमेजय़स्य भ्रातृभिरभिहतो रोरूय़माणो मातुः समीपमुपागच्छत् |
२ ख
सूत उवाच:
किमहं व्रुवाणीति ||
२ ग
सूत उवाच:
तं माता रोरूय़माणमुवाच |
३ क
सूत उवाच:
किं रोदिषि |
३ ख
सूत उवाच:
केनास्यभिहत इति ||
३ ग
सूत उवाच:
स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच |
४ क
सूत उवाच:
जनमेजय़स्य भ्रातृभिरभिहतोऽस्मीति ||
४ ख
सूत उवाच:
तं माता प्रत्युवाच |
५ क
सूत उवाच:
व्यक्तं त्वय़ा तत्रापराद्धं येनास्यभिहत इति ||
५ ख
सूत उवाच:
स तां पुनरुवाच |
६ क
सूत उवाच:
नापराध्यामि किञ्चित् |
६ ख
सूत उवाच:
नावेक्षे हवींषि नावलिह इति ||
६ ग
सूत उवाच:
तच्छ्रुत्वा तस्य माता सरमा पुत्रशोकार्ता तत्सत्रमुपागच्छद्यत्र स जनमेजय़ः सह भ्रातृभिर्दीर्घसत्रमुपास्ते |
७ क
सूत उवाच:
ततो वक्ष्यसि यत्त्वां स प्रक्ष्यति द्विजसत्तमः ||
७ ख
सूत उवाच:
स तय़ा क्रुद्धय़ा तत्रोक्तः |
८ क
सूत उवाच:
अय़ं मे पुत्रो न किञ्चिदपराध्यति |
८ ख
सूत उवाच:
किमर्थमभिहत इति |
८ ग
सूत उवाच:
यस्माच्चाय़मभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भय़मागमिष्यतीति ||
८ घ
सूत उवाच:
स जनमेजय़ एवमुक्तो देवशुन्या सरमय़ा दृढं सम्भ्रान्तो विषण्णश्चासीत् |
९ क
सूत उवाच:
देवान्वाग्भिः पितृनद्भिस्तर्पय़ित्वाजगाम ह ||
९ ख
सूत उवाच:
स तस्मिन्सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विच्छमानः परं यत्नमकरोद्यो मे पापकृत्यां शमय़ेदिति |
१० क
सूत उवाच:
यज्ञाय़तनमाश्रित्य सूतपुत्रपुरःसराः ||
१० ख
सूत उवाच:
स कदाचिन्मृगय़ां यातः पारिक्षितो जनमेजय़ः कस्मिंश्चित्स्वविषय़ोद्देशे आश्रममपश्यत् |
११ क
सूत उवाच:
उपविष्टेषूपविष्टः शौनकोऽथाव्रवीदिदम् ||
११ ख
सूत उवाच:
तत्र कश्चिदृषिरासां चक्रे श्रुतश्रवा नाम |
१२ क
सूत उवाच:
तस्याभिमतः पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम ||
१२ ख
सूत उवाच:
तस्य तं पुत्रमभिगम्य जनमेजय़ः पारिक्षितः पौरोहित्याय़ वव्रे ||
१३ क
सूत उवाच:
स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच |
१४ क
सूत उवाच:
भगवन्नय़ं तव पुत्रो मम पुरोहितोऽस्त्विति ||
१४ ख
सूत उवाच:
स एवमुक्तः प्रत्युवाच |
१५ क
सूत उवाच:
भो जनमेजय़ पुत्रोऽय़ं मम सर्प्यां जातः |
१५ ख
सूत उवाच:
महातपस्वी स्वाध्याय़सम्पन्नो मत्तपोवीर्यसम्भृतो मच्छुक्रं पीतवत्यास्तस्याः कुक्षौ संवृद्धः |
१५ ग
सूत उवाच:
समर्थोऽय़ं भवतः सर्वाः पापकृत्याः शमय़ितुमन्तरेण महादेवकृत्याम् |
१५ घ
सूत उवाच:
अस्य त्वेकमुपांशुव्रतम् |
१५ 5
सूत उवाच:
यदेनं कश्चिद्व्राह्मणः कञ्चिदर्थमभिय़ाचेत्तं तस्मै दद्यादय़म् |
१५ 6
सूत उवाच:
यद्येतदुत्सहसे ततो नय़स्वैनमिति ||
१५ 7
सूत उवाच:
तेनैवमुत्को जनमेजय़स्तं प्रत्युवाच |
१६ क
सूत उवाच:
भगवंस्तथा भविष्यतीति ||
१६ ख
सूत उवाच:
स तं पुरोहितमुपादाय़ोपावृत्तो भ्रातृनुवाच |
१७ क
सूत उवाच:
मय़ाय़ं वृत उपाध्याय़ः |
१७ ख
सूत उवाच:
यदय़ं व्रूय़ात्तत्कार्यमविचारय़द्भिरिति ||
१७ ग
सूत उवाच:
तेनैवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्रुः |
१८ क
सूत उवाच:
स तथा भ्रातृन्सन्दिश्य तक्षशिलां प्रत्यभिप्रतस्थे |
१८ ख
सूत उवाच:
तं च देशं वशे स्थापय़ामास ||
१८ ग
सूत उवाच:
एतस्मिन्नन्तरे कश्चिदृषिर्धौम्यो नामाय़ोदः |
१९ क
सूत उवाच:
तस्य शिष्यास्त्रय़ो वभूवुरुपमन्युरारुणिर्वेदश्चेति ||
१९ ख
सूत उवाच:
स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषय़ामास |
२० क
सूत उवाच:
गच्छ केदारखण्डं वधानेति ||
२० ख
सूत उवाच:
स उपाध्याय़ेन सन्दिष्ट आरुणिः पाञ्चाल्यस्तत्र गत्वा तत्केदारखण्डं वद्धुं नाशक्नोत् ||
२१ क
सूत उवाच:
स क्लिश्यमानोऽपश्यदुपाय़म् |
२२ क
सूत उवाच:
भवत्वेवं करिष्यामीति ||
२२ ख
सूत उवाच:
स तत्र संविवेश केदारखण्डे |
२३ क
सूत उवाच:
शय़ाने तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ ||
२३ ख
सूत उवाच:
ततः कदाचिदुपाध्याय़ आय़ोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत् |
२४ क
सूत उवाच:
क्व आरुणिः पाञ्चाल्यो गत इति ||
२४ ख
सूत उवाच:
ते प्रत्यूचुः |
२५ क
सूत उवाच:
भगवतैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं वधानेति ||
२५ ख
सूत उवाच:
स एवमुक्तस्ताञ्शिष्यान्प्रत्युवाच |
२६ क
सूत उवाच:
तस्मात्सर्वे तत्र गच्छामो यत्र स इति ||
२६ ख
सूत उवाच:
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय़ शव्दं चकार |
२७ क
सूत उवाच:
भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि |
२७ ख
सूत उवाच:
वत्सैहीति ||
२७ ग
सूत उवाच:
स तच्छ्रुत्वा आरुणिरुपाध्याय़वाक्यं तस्मात्केदारखण्डात्सहसोत्थाय़ तमुपाध्याय़मुपतस्थे |
२८ क
सूत उवाच:
प्रोवाच चैनम् |
२८ ख
सूत उवाच:
अय़मस्म्यत्र केदारखण्डे निःसरमाणमुदकमवारणीय़ं संरोद्धुं संविष्टो भगवच्छव्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थितः |
२८ ग
सूत उवाच:
तदभिवादय़े भगवन्तम् |
२८ घ
सूत उवाच:
आज्ञापय़तु भवान् |
२८ 5
सूत उवाच:
किं करवाणीति ||
२८ 6
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ोऽव्रवीत् |
२९ क
सूत उवाच:
यस्माद्भवान्केदारखण्डमवदार्योत्थितस्तस्माद्भवानुद्दालक एव नाम्ना भविष्यतीति ||
२९ ख
सूत उवाच:
स उपाध्याय़ेनानुगृहीतः |
३० क
सूत उवाच:
यस्मात्त्वय़ा मद्वचोऽनुष्ठितं तस्माच्छ्रेय़ोऽवाप्स्यसीति |
३० ख
सूत उवाच:
सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति ||
३० ग
सूत उवाच:
स एवमुक्त उपाध्याय़ेनेष्टं देशं जगाम ||
३१ क
सूत उवाच:
अथापरः शिष्यस्तस्यैवाय़ोदस्य धौम्यस्योपमन्युर्नाम ||
३२ क
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रेषय़ामास |
३३ क
सूत उवाच:
वत्सोपमन्यो गा रक्षस्वेति ||
३३ ख
सूत उवाच:
स उपाध्याय़वचनादरक्षद्गाः |
३४ क
सूत उवाच:
स चाहनि गा रक्षित्वा दिवसक्षय़ेऽभ्यागम्योपाध्याय़स्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
३४ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः पीवानमपश्यत् |
३५ क
सूत उवाच:
उवाच चैनम् |
३५ ख
सूत उवाच:
वत्सोपमन्यो केन वृत्तिं कल्पय़सि |
३५ ग
सूत उवाच:
पीवानसि दृढमिति ||
३५ घ
सूत उवाच:
स उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
३६ क
सूत उवाच:
भैक्षेण वृत्तिं कल्पय़ामीति ||
३६ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
३७ क
सूत उवाच:
ममानिवेद्य भैक्षं नोपय़ोक्तव्यमिति ||
३७ ख
सूत उवाच:
स तथेत्युक्त्वा पुनररक्षद्गाः |
३८ क
सूत उवाच:
रक्षित्वा चागम्य तथैवोपाध्याय़स्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
३८ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़स्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वोवाच |
३९ क
सूत उवाच:
वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्षं गृह्णामि |
३९ ख
सूत उवाच:
केनेदानीं वृत्तिं कल्पय़सीति ||
३९ ग
सूत उवाच:
स एवमुक्त उपाध्याय़ेन प्रत्युवाच |
४० क
सूत उवाच:
भगवते निवेद्य पूर्वमपरं चरामि |
४० ख
सूत उवाच:
तेन वृत्तिं कल्पय़ामीति ||
४० ग
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
४१ क
सूत उवाच:
नैषा न्याय़्या गुरुवृत्तिः |
४१ ख