chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३०८
भीष्म उवाच:
तस्माद्धर्मार्थकामेषु तथा राज्यपरिग्रहे |
५१ क
भीष्म उवाच:
वन्धनाय़तनेष्वेषु विद्ध्यवन्धे पदे स्थितम् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
राज्यैश्वर्यमय़ः पाशः स्नेहाय़तनवन्धनः |
५२ क
भीष्म उवाच:
मोक्षाश्मनिशितेनेह छिन्नस्त्यागासिना मय़ा ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
सोऽहमेवङ्गतो मुक्तो जातास्थस्त्वय़ि भिक्षुकि |
५३ क
भीष्म उवाच:
अय़थार्थो हि ते वर्णो वक्ष्यामि शृणु तन्मम ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
सौकुमार्यं तथा रूपं वपुरग्र्यं तथा वय़ः |
५४ क
भीष्म उवाच:
तवैतानि समस्तानि निय़मश्चेति संशय़ः ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
यच्चाप्यननुरूपं ते लिङ्गस्यास्य विचेष्टितम् |
५५ क
भीष्म उवाच:
मुक्तोऽय़ं स्यान्न वेत्यस्माद्धर्षितो मत्परिग्रहः ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
न च कामसमाय़ुक्ते मुक्तेऽप्यस्ति त्रिदण्डकम् |
५६ क
भीष्म उवाच:
न रक्ष्यते त्वय़ा चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
मत्पक्षसंश्रय़ाच्चाय़ं शृणु यस्ते व्यतिक्रमः |
५७ क
भीष्म उवाच:
आश्रय़न्त्याः स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
प्रवेशस्ते कृतः केन मम राष्ट्रे पुरे तथा |
५८ क
भीष्म उवाच:
कस्य वा संनिसर्गात्त्वं प्रविष्टा हृदय़ं मम ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
वर्णप्रवरमुख्यासि व्राह्मणी क्षत्रिय़ो ह्यहम् |
५९ क
भीष्म उवाच:
नावय़ोरेकय़ोगोऽस्ति मा कृथा वर्णसङ्करम् ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
वर्तसे मोक्षधर्मेषु गार्हस्थ्ये त्वहमाश्रमे |
६० क
भीष्म उवाच:
अय़ं चापि सुकष्टस्ते द्वितीय़ोऽऽश्रमसङ्करः ||
६० ख
भीष्म उवाच:
सगोत्रां वासगोत्रां वा न वेद त्वां न वेत्थ माम् |
६१ क
भीष्म उवाच:
सगोत्रमाविशन्त्यास्ते तृतीय़ो गोत्रसङ्करः ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
अथ जीवति ते भर्ता प्रोषितोऽप्यथ वा क्वचित् |
६२ क
भीष्म उवाच:
अगम्या परभार्येति चतुर्थो धर्मसङ्करः ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
सा त्वमेतान्यकार्याणि कार्यापेक्षा व्यवस्यसि |
६३ क
भीष्म उवाच:
अविज्ञानेन वा युक्ता मिथ्याज्ञानेन वा पुनः ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
अथ वापि स्वतन्त्रासि स्वदोषेणेह केनचित् |
६४ क
भीष्म उवाच:
यदि किञ्चिच्छ्रुतं तेऽस्ति सर्वं कृतमनर्थकम् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
इदमन्यत्तृतीय़ं ते भावस्पर्शविघातकम् |
६५ क
भीष्म उवाच:
दुष्टाय़ा लक्ष्यते लिङ्गं प्रवक्तव्यं प्रकाशितम् ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
न मय़्येवाभिसन्धिस्ते जय़ैषिण्या जय़े कृतः |
६६ क
भीष्म उवाच:
येय़ं मत्परिषत्कृत्स्ना जेतुमिच्छसि तामपि ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
तथा ह्येवं पुनश्च त्वं दृष्टिं स्वां प्रतिमुञ्चसि |
६७ क
भीष्म उवाच:
मत्पक्षप्रतिघाताय़ स्वपक्षोद्भावनाय़ च ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
सा स्वेनामर्षजेन त्वमृद्धिमोहेन मोहिता |
६८ क
भीष्म उवाच:
भूय़ः सृजसि योगास्त्रं विषामृतमिवैकधा ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
इच्छतोर्हि द्वय़ोर्लाभः स्त्रीपुंसोरमृतोपमः |
६९ क
भीष्म उवाच:
अलाभश्चाप्यरक्तस्य सोऽत्र दोषो विषोपमः ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
मा स्प्राक्षीः सधु जानीष्व स्वशास्त्रमनुपालय़ |
७० क
भीष्म उवाच:
कृतेय़ं हि विजिज्ञासा मुक्तो नेति त्वय़ा मम |
७० ख
भीष्म उवाच:
एतत्सर्वं प्रतिच्छन्नं मय़ि नार्हसि गूहितुम् ||
७० ग
भीष्म उवाच:
सा यदि त्वं स्वकार्येण यद्यन्यस्य महीपतेः |
७१ क
भीष्म उवाच:
तत्त्वं सत्रप्रतिच्छन्ना मय़ि नार्हसि गूहितुम् ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
न राजानं मृषा गच्छेन्न द्विजातिं कथञ्चन |
७२ क
भीष्म उवाच:
न स्त्रिय़ं स्त्रीगुणोपेतां हन्युर्ह्येते मृषागताः ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
राज्ञां हि वलमैश्वर्यं व्रह्म व्रह्मविदां वलम् |
७३ क
भीष्म उवाच:
रूपय़ौवनसौभाग्यं स्त्रीणां वलमनुत्तमम् ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
अत एतैर्वलैरेते वलिनः स्वार्थमिच्छता |
७४ क
भीष्म उवाच:
आर्जवेनाभिगन्तव्या विनाशाय़ ह्यनार्जवम् ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
सा त्वं जातिं श्रुतं वृत्तं भावं प्रकृतिमात्मनः |
७५ क
भीष्म उवाच:
कृत्यमागमने चैव वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
इत्येतैरसुखैर्वाक्यैरय़ुक्तैरसमञ्जसैः |
७६ क
भीष्म उवाच:
प्रत्यादिष्टा नरेन्द्रेण सुलभा न व्यकम्पत ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
उक्तवाक्ये तु नृपतौ सुलभा चारुदर्शना |
७७ क
भीष्म उवाच:
ततश्चारुतरं वाक्यं प्रचक्रामाथ भाषितुम् ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
नवभिर्नवभिश्चैव दोषैर्वाग्वुद्धिदूषणैः |
७८ क
भीष्म उवाच:
अपेतमुपपन्नार्थमष्टादशगुणान्वितम् ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
सौक्ष्म्यं सङ्ख्याक्रमौ चोभौ निर्णय़ः सप्रय़ोजनः |
७९ क
भीष्म उवाच:
पञ्चैतान्यर्थजातानि वाक्यमित्युच्यते नृप ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
एषामेकैकशोऽर्थानां सौक्ष्म्यादीनां सुलक्षणम् |
८० क
भीष्म उवाच:
शृणु संसार्यमाणानां पदार्थैः पदवाक्यतः ||
८० ख
भीष्म उवाच:
ज्ञानं ज्ञेय़ेषु भिन्नेषु यथाभेदेन वर्तते |
८१ क
भीष्म उवाच:
तत्रातिशय़िनी वुद्धिस्तत्सौक्ष्म्यमिति वर्तते ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागशः |
८२ क
भीष्म उवाच:
कञ्चिदर्थमभिप्रेत्य सा सङ्ख्येत्युपधार्यताम् ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
इदं पूर्वमिदं पश्चाद्वक्तव्यं यद्विवक्षितम् |
८३ क
भीष्म उवाच:
क्रमय़ोगं तमप्याहुर्वाक्यं वाक्यविदो जनाः ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
धर्मार्थकाममोक्षेषु प्रतिज्ञाय़ विशेषतः |
८४ क
भीष्म उवाच:
इदं तदिति वाक्यान्ते प्रोच्यते स विनिर्णय़ः ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
इच्छाद्वेषभवैर्दुःखैः प्रकर्षो यत्र जाय़ते |
८५ क
भीष्म उवाच:
तत्र या नृपते वृत्तिस्तत्प्रय़ोजनमिष्यते ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
तान्येतानि यथोक्तानि सौक्ष्म्यादीनि जनाधिप |
८६ क
भीष्म उवाच:
एकार्थसमवेतानि वाक्यं मम निशामय़ ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
उपेतार्थमभिन्नार्थं नापवृत्तं न चाधिकम् |
८७ क
भीष्म उवाच:
नाश्लक्ष्णं न च सन्दिग्धं वक्ष्यामि परमं तव ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
न गुर्वक्षरसम्वद्धं पराङ्मुखमुखं न च |
८८ क
भीष्म उवाच:
नानृतं न त्रिवर्गेण विरुद्धं नाप्यसंस्कृतम् ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
न न्यूनं कष्टशव्दं वा व्युत्क्रमाभिहितं न च |
८९ क
भीष्म उवाच:
न शेषं नानुकल्पेन निष्कारणमहेतुकम् ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
कामात्क्रोधाद्भय़ाल्लोभाद्दैन्यादानार्यकात्तथा |
९० क
भीष्म उवाच:
ह्रीतोऽनुक्रोशतो मानान्न वक्ष्यामि कथञ्चन ||
९० ख
भीष्म उवाच:
वक्ता श्रोता च वाक्यं च यदा त्वविकलं नृप |
९१ क
भीष्म उवाच:
सममेति विवक्षाय़ां तदा सोऽर्थः प्रकाशते ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
वक्तव्ये तु यदा वक्ता श्रोतारमवमन्यते |
९२ क
भीष्म उवाच:
स्वार्थमाह परार्थं वा तदा वाक्यं न रोहति ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
अथ यः स्वार्थमुत्सृज्य परार्थं प्राह मानवः |
९३ क
भीष्म उवाच:
विशङ्का जाय़ते तस्मिन्वाक्यं तदपि दोषवत् ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
यस्तु वक्ता द्वय़ोरर्थमविरुद्धं प्रभाषते |
९४ क
भीष्म उवाच:
श्रोतुश्चैवात्मनश्चैव स वक्ता नेतरो नृप ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
तदर्थवदिदं वाक्यमुपेतं वाक्यसम्पदा |
९५ क
भीष्म उवाच:
अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्रः श्रोतुमर्हसि ||
९५ ख
भीष्म उवाच:
कासि कस्य कुतो वेति त्वय़ाहमभिचोदिता |
९६ क
भीष्म उवाच:
तत्रोत्तरमिदं वाक्यं राजन्नेकमनाः शृणु ||
९६ ख
भीष्म उवाच:
यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदविन्दुभिः |
९७ क
भीष्म उवाच:
सुश्लिष्टानि तथा राजन्प्राणिनामिह सम्भवः ||
९७ ख
भीष्म उवाच:
शव्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रिय़ाणि च |
९८ क
भीष्म उवाच:
पृथगात्मा दशात्मानः संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् ||
९८ ख
भीष्म उवाच:
न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चय़ः |
९९ क
भीष्म उवाच:
एकैकस्येह विज्ञानं नास्त्यात्मनि तथा परे ||
९९ ख
भीष्म उवाच:
न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते |
१०० क