chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३०८
भीष्म उवाच:
तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् |
१०० ख
भीष्म उवाच:
संश्लिष्टा नाभिजाय़न्ते यथाप इह पांसवः ||
१०० ग
भीष्म उवाच:
वाह्यानन्यानपेक्षन्ते गुणांस्तानपि मे शृणु |
१०१ क
भीष्म उवाच:
रूपं चक्षुः प्रकाशश्च दर्शने हेतवस्त्रय़ः |
१०१ ख
भीष्म उवाच:
यथैवात्र तथान्येषु ज्ञानज्ञेय़ेषु हेतवः ||
१०१ ग
भीष्म उवाच:
ज्ञानज्ञेय़ान्तरे तस्मिन्मनो नामापरो गुणः |
१०२ क
भीष्म उवाच:
विचारय़ति येनाय़ं निश्चय़े साध्वसाधुनी ||
१०२ ख
भीष्म उवाच:
द्वादशस्त्वपरस्तत्र वुद्धिर्नाम गुणः स्मृतः |
१०३ क
भीष्म उवाच:
येन संशय़पूर्वेषु वोद्धव्येषु व्यवस्यति ||
१०३ ख
भीष्म उवाच:
अथ द्वादशके तस्मिन्सत्त्वं नामापरो गुणः |
१०४ क
भीष्म उवाच:
महासत्त्वोऽल्पसत्त्वो वा जन्तुर्येनानुमीय़ते ||
१०४ ख
भीष्म उवाच:
क्षेत्रज्ञ इति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः |
१०५ क
भीष्म उवाच:
ममाय़मिति येनाय़ं मन्यते न च मन्यते ||
१०५ ख
भीष्म उवाच:
अथ पञ्चदशो राजन्गुणस्तत्रापरः स्मृतः |
१०६ क
भीष्म उवाच:
पृथक्कलासमूहस्य सामग्र्यं तदिहोच्यते ||
१०६ ख
भीष्म उवाच:
गुणस्त्वेवापरस्तत्र सङ्घात इति षोडशः |
१०७ क
भीष्म उवाच:
आकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन्समाश्रितौ ||
१०७ ख
भीष्म उवाच:
सुखदुःखे जरामृत्यू लाभालाभौ प्रिय़ाप्रिय़े |
१०८ क
भीष्म उवाच:
इति चैकोनविंशोऽय़ं द्वन्द्वय़ोग इति स्मृतः ||
१०८ ख
भीष्म उवाच:
ऊर्ध्वमेकोनविंशत्याः कालो नामापरो गुणः |
१०९ क
भीष्म उवाच:
इतीमं विद्धि विंशत्या भूतानां प्रभवाप्ययम् ||
१०९ ख
भीष्म उवाच:
विंशकश्चैष सङ्घातो महाभूतानि पञ्च च |
११० क
भीष्म उवाच:
सदसद्भावय़ोगौ च गुणावन्यौ प्रकाशकौ ||
११० ख
भीष्म उवाच:
इत्येवं विंशतिश्चैव गुणाः सप्त च ये स्मृताः |
१११ क
भीष्म उवाच:
विधिः शुक्रं वलं चेति त्रय़ एते गुणाः परे ||
१११ ख
भीष्म उवाच:
एकविंशश्च दश च कलाः सङ्ख्यानतः स्मृताः |
११२ क
भीष्म उवाच:
समग्रा यत्र वर्तन्ते तच्छरीरमिति स्मृतम् ||
११२ ख
भीष्म उवाच:
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति |
११३ क
भीष्म उवाच:
व्यक्तं चासां तथैवान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ||
११३ ख
भीष्म उवाच:
अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वय़ीमथ चतुष्टय़ीम् |
११४ क
भीष्म उवाच:
प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः ||
११४ ख
भीष्म उवाच:
सेय़ं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता |
११५ क
भीष्म उवाच:
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ||
११५ ख
भीष्म उवाच:
विन्दुन्यासादय़ोऽवस्थाः शुक्रशोणितसम्भवाः |
११६ क
भीष्म उवाच:
यासामेव निपातेन कललं नाम जाय़ते ||
११६ ख
भीष्म उवाच:
कललादर्वुदोत्पत्तिः पेशी चाप्यर्वुदोद्भवा |
११७ क
भीष्म उवाच:
पेश्यास्त्वङ्गाभिनिर्वृत्तिर्नखरोमाणि चाङ्गतः ||
११७ ख
भीष्म उवाच:
सम्पूर्णे नवमे मासे जन्तोर्जातस्य मैथिल |
११८ क
भीष्म उवाच:
जाय़ते नामरूपत्वं स्त्री पुमान्वेति लिङ्गतः ||
११८ ख
भीष्म उवाच:
जातमात्रं तु तद्रूपं दृष्ट्वा ताम्रनखाङ्गुलि |
११९ क
भीष्म उवाच:
कौमाररूपमापन्नं रूपतो नोपलभ्यते ||
११९ ख
भीष्म उवाच:
कौमाराद्यौवनं चापि स्थाविर्यं चापि यौवनात् |
१२० क
भीष्म उवाच:
अनेन क्रमय़ोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते ||
१२० ख
भीष्म उवाच:
कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे |
१२१ क
भीष्म उवाच:
वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात्तु न विभाव्यते ||
१२१ ख
भीष्म उवाच:
न चैषामप्ययो राजँल्लक्ष्यते प्रभवो न च |
१२२ क
भीष्म उवाच:
अवस्थाय़ामवस्थाय़ां दीपस्येवार्चिषो गतिः ||
१२२ ख
भीष्म उवाच:
तस्याप्येवम्प्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः |
१२३ क
भीष्म उवाच:
अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः ||
१२३ ख
भीष्म उवाच:
कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः |
१२४ क
भीष्म उवाच:
सम्वन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवय़वैरिह ||
१२४ ख
भीष्म उवाच:
यथादित्यान्मणेश्चैव वीरुद्भ्यश्चैव पावकः |
१२५ क
भीष्म उवाच:
भवत्येवं समुदय़ात्कलानामपि जन्तवः ||
१२५ ख
भीष्म उवाच:
आत्मन्येवात्मनात्मानं यथा त्वमनुपश्यसि |
१२६ क
भीष्म उवाच:
एवमेवात्मनात्मानमन्यस्मिन्किं न पश्यसि |
१२६ ख
भीष्म उवाच:
यद्यात्मनि परस्मिंश्च समतामध्यवस्यसि ||
१२६ ग
भीष्म उवाच:
अथ मां कासि कस्येति किमर्थमनुपृच्छसि |
१२७ क
भीष्म उवाच:
इदं मे स्यादिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य मैथिल |
१२७ ख
भीष्म उवाच:
कासि कस्य कुतो वेति वचने किं प्रय़ोजनम् ||
१२७ ग
भीष्म उवाच:
रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजय़े सन्धिविग्रहे |
१२८ क
भीष्म उवाच:
कृतवान्यो महीपाल किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१२८ ख
भीष्म उवाच:
त्रिवर्गे सप्तधा व्यक्तं यो न वेदेह कर्मसु |
१२९ क
भीष्म उवाच:
सङ्गवान्यस्त्रिवर्गे च किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१२९ ख
भीष्म उवाच:
प्रिय़े चैवाप्रिय़े चैव दुर्वले वलवत्यपि |
१३० क
भीष्म उवाच:
यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१३० ख
भीष्म उवाच:
तदमुक्तस्य ते मोक्षे योऽभिमानो भवेन्नृप |
१३१ क
भीष्म उवाच:
सुहृद्भिः स निवार्यस्ते विचित्तस्येव भेषजैः ||
१३१ ख
भीष्म उवाच:
तानि तान्यनुसन्दृश्य सङ्गस्थानान्यरिन्दम |
१३२ क
भीष्म उवाच:
आत्मनात्मनि सम्पश्येत्किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१३२ ख
भीष्म उवाच:
इमान्यन्यानि सूक्ष्माणि मोक्षमाश्रित्य कानिचित् |
१३३ क
भीष्म उवाच:
चतुरङ्गप्रवृत्तानि सङ्गस्थानानि मे शृणु ||
१३३ ख
भीष्म उवाच:
य इमां पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति ह |
१३४ क
भीष्म उवाच:
एकमेव स वै राजा पुरमध्यावसत्युत ||
१३४ ख
भीष्म उवाच:
तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति |
१३५ क
भीष्म उवाच:
गृहे शय़नमप्येकं निशाय़ां यत्र लीय़ते ||
१३५ ख
भीष्म उवाच:
शय़्यार्धं तस्य चाप्यत्र स्त्रीपूर्वमधितिष्ठति |
१३६ क
भीष्म उवाच:
तदनेन प्रसङ्गेन फलेनैवेह युज्यते ||
१३६ ख
भीष्म उवाच:
एवमेवोपभोगेषु भोजनाच्छादनेषु च |
१३७ क
भीष्म उवाच:
गुणेषु परिमेय़ेषु निग्रहानुग्रहौ प्रति ||
१३७ ख
भीष्म उवाच:
परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पे सोऽपि प्रसज्जते |
१३८ क
भीष्म उवाच:
सन्धिविग्रहय़ोगे च कुतो राज्ञः स्वतन्त्रता ||
१३८ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीषु क्रीडाविहारेषु नित्यमस्यास्वतन्त्रता |
१३९ क
भीष्म उवाच:
मन्त्रे चामात्यसमितौ कुत एव स्वतन्त्रता ||
१३९ ख
भीष्म उवाच:
यदा त्वाज्ञापय़त्यन्यांस्तदास्योक्ता स्वतन्त्रता |
१४० क
भीष्म उवाच:
अवशः कार्यते तत्र तस्मिंस्तस्मिन्गुणे स्थितः ||
१४० ख
भीष्म उवाच:
स्वप्तुकामो न लभते स्वप्तुं कार्यार्थिभिर्जनैः |
१४१ क
भीष्म उवाच:
शय़ने चाप्यनुज्ञातः सुप्त उत्थाप्यतेऽवशः ||
१४१ ख
भीष्म उवाच:
स्नाह्यालभ पिव प्राश जुहुध्यग्नीन्यजेति च |
१४२ क
भीष्म उवाच:
वदस्व शृणु चापीति विवशः कार्यते परैः ||
१४२ ख
भीष्म उवाच:
अभिगम्याभिगम्यैनं याचन्ते सततं नराः |
१४३ क
भीष्म उवाच:
न चाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनात् ||
१४३ ख
भीष्म उवाच:
दाने कोशक्षय़ो ह्यस्य वैरं चाप्यप्रय़च्छतः |
१४४ क
भीष्म उवाच:
क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोषा वैराग्यकारकाः ||
१४४ ख
भीष्म उवाच:
प्राज्ञाञ्शूरांस्तथैवाढ्यानेकस्थानेऽपि शङ्कते |
१४५ क
भीष्म उवाच:
भय़मप्यभय़े राज्ञो यैश्च नित्यमुपास्यते ||
१४५ ख
भीष्म उवाच:
यदा चैते प्रदुष्यन्ति राजन्ये कीर्तिता मय़ा |
१४६ क
भीष्म उवाच:
तदैवास्य भय़ं तेभ्यो जाय़ते पश्य यादृशम् ||
१४६ ख
भीष्म उवाच:
सर्वः स्वे स्वे गृहे राजा सर्वः स्वे स्वे गृहे गृही |
१४७ क
भीष्म उवाच:
निग्रहानुग्रहौ कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ||
१४७ ख
भीष्म उवाच:
पुत्रा दारास्तथैवात्मा कोशो मित्राणि सञ्चय़ः |
१४८ क