भीष्म उवाच:
हिरण्यरत्नसञ्चय़ाः शुभाशुभेन सञ्चिताः |
५१ क
भीष्म उवाच:
न तस्य देहसङ्क्षय़े भवन्ति कार्यसाधकाः ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
परत्रगामिकस्य ते कृताकृतस्य कर्मणः |
५२ क
भीष्म उवाच:
न साक्षिरात्मना समो नृणामिहास्ति कश्चन ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
मनुष्यदेहशून्यकं भवत्यमुत्र गच्छतः |
५३ क
भीष्म उवाच:
प्रपश्य वुद्धिचक्षुषा प्रदृश्यते हि सर्वतः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
इहाग्निसूर्यवाय़वः शरीरमाश्रितास्त्रय़ः |
५४ क
भीष्म उवाच:
त एव तस्य साक्षिणो भवन्ति धर्मदर्शिनः ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
यथानिशेषु सर्वतःस्पृशत्सु सर्वदारिषु |
५५ क
भीष्म उवाच:
प्रकाशगूढवृत्तिषु स्वधर्ममेव पालय़ ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
अनेकपारिपन्थिके विरूपरौद्ररक्षिते |
५६ क
भीष्म उवाच:
स्वमेव कर्म रक्ष्यतां स्वकर्म तत्र गच्छति ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
यथाकृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
यथाप्सरोगणाः फलं सुखं महर्षिभिः सह |
५८ क
भीष्म उवाच:
तथाप्नुवन्ति कर्मतो विमानकामगामिनः ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
यथेह यत्कृतं शुभं विपाप्मभिः कृतात्मभिः |
५९ क
भीष्म उवाच:
तदाप्नुवन्ति मानवास्तथा विशुद्धय़ोनय़ः ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
प्रजापतेः सलोकतां वृहस्पतेः शतक्रतोः |
६० क
भीष्म उवाच:
व्रजन्ति ते परां गतिं गृहस्थधर्मसेतुभिः ||
६० ख
भीष्म उवाच:
सहस्रशोऽप्यनेकशः प्रवक्तुमुत्सहामहे |
६१ क
भीष्म उवाच:
अवुद्धिमोहनं पुनः प्रभुर्विना न यावकम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
गता द्विरष्टवर्षता ध्रुवोऽसि पञ्चविंशकः |
६२ क
भीष्म उवाच:
कुरुष्व धर्मसञ्चय़ं वय़ो हि तेऽतिवर्तते ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखं दमम् |
६३ क
भीष्म उवाच:
यथागृहीतमुत्थितं त्वरस्व धर्मपालने ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
यदा त्वमेव पृष्ठतस्त्वमग्रतो गमिष्यसि |
६४ क
भीष्म उवाच:
तथा गतिं गमिष्यतः किमात्मना परेण वा ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
यदेकपातिनां सतां भवत्यमुत्र गच्छताम् |
६५ क
भीष्म उवाच:
भय़ेषु साम्पराय़िकं निधत्स्व तं महानिधिम् ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
सकूलमूलवान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान् |
६६ क
भीष्म उवाच:
न सन्ति यस्य वारकाः कुरुष्व धर्मसंनिधिम् ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
इदं निदर्शनं मय़ा तवेह पुत्र संमतम् |
६७ क
भीष्म उवाच:
स्वदर्शनानुमानतः प्रवर्णितं कुरुष्व तत् ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
दधाति यः स्वकर्मणा धनानि यस्य कस्यचित् |
६८ क
भीष्म उवाच:
अवुद्धिमोहजैर्गुणैः शतैक एव युज्यते ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
श्रुतं समर्थमस्तु ते प्रकुर्वतः शुभाः क्रिय़ाः |
६९ क
भीष्म उवाच:
तदेव तत्र दर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
निवन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः |
७० क
भीष्म उवाच:
छित्त्वैनां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ||
७० ख
भीष्म उवाच:
किं ते धनेन किं वन्धुभिस्ते; किं ते पुत्रैः पुत्रक यो मरिष्यसि |
७१ क
भीष्म उवाच:
आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं; पितामहास्ते क्व गताश्च सर्वे ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
श्वःकार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् |
७२ क
भीष्म उवाच:
को हि तद्वेद कस्याद्य मृत्युसेना निवेक्ष्यते ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
अनुगम्य श्मशानान्तं निवर्तन्तीह वान्धवाः |
७३ क
भीष्म उवाच:
अग्नौ प्रक्षिप्य पुरुषं ज्ञातय़ः सुहृदस्तथा ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
नास्तिकान्निरनुक्रोशान्नरान्पापमतौ स्थितान् |
७४ क
भीष्म उवाच:
वामतः कुरु विश्रव्धं परं प्रेप्सुरतन्द्रितः ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
एवमभ्याहते लोके कालेनोपनिपीडिते |
७५ क
भीष्म उवाच:
सुमहद्धैर्यमालम्व्य धर्मं सर्वात्मना कुरु ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
अथेमं दर्शनोपाय़ं सम्यग्यो वेत्ति मानवः |
७६ क
भीष्म उवाच:
सम्यक्स धर्मं कृत्वेह परत्र सुखमेधते ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
न देहभेदे मरणं विजानतां; न च प्रणाशः स्वनुपालिते पथि |
७७ क
भीष्म उवाच:
धर्मं हि यो वर्धय़ते स पण्डितो; य एव धर्माच्च्यवते स मुह्यति ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
प्रय़ुक्तय़ोः कर्मपथि स्वकर्मणोः; फलं प्रय़ोक्ता लभते यथाविधि |
७८ क
भीष्म उवाच:
निहीनकर्मा निरय़ं प्रपद्यते; त्रिविष्टपं गच्छति धर्मपारगः ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् |
७९ क
भीष्म उवाच:
तथात्मानं समादध्याद्भ्रश्येत न पुनर्यथा ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
यस्य नोत्क्रामति मतिः स्वर्गमार्गानुसारिणी |
८० क
भीष्म उवाच:
तमाहुः पुण्यकर्माणमशोच्यं मित्रवान्धवैः ||
८० ख
भीष्म उवाच:
यस्य नोपहता वुद्धिर्निश्चय़ेष्ववलम्वते |
८१ क
भीष्म उवाच:
स्वर्गे कृतावकाशस्य तस्य नास्ति महद्भय़म् ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
तपोवनेषु ये जातास्तत्रैव निधनं गताः |
८२ क
भीष्म उवाच:
तेषामल्पतरो धर्मः कामभोगमजानताम् ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
यस्तु भोगान्परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत् |
८३ क
भीष्म उवाच:
न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तन्मे वहुमतं फलम् ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च |
८४ क
भीष्म उवाच:
अनागतान्यतीतानि कस्य ते कस्य वा वय़म् ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
न तेषां भवता कार्यं न कार्यं तव तैरपि |
८५ क
भीष्म उवाच:
स्वकृतैस्तानि यातानि भवांश्चैव गमिष्यति ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
इह लोके हि धनिनः परोऽपि स्वजनाय़ते |
८६ क
भीष्म उवाच:
स्वजनस्तु दरिद्राणां जीवतामेव नश्यति ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
सञ्चिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षय़ा नरः |
८७ क
भीष्म उवाच:
ततः क्लेशमवाप्नोति परत्रेह तथैव च ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
पश्य त्वं छिद्रभूतं हि जीवलोकं स्वकर्मणा |
८८ क
भीष्म उवाच:
तत्कुरुष्व तथा पुत्र कृत्स्नं यत्समुदाहृतम् ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
तदेतत्सम्प्रदृश्यैव कर्मभूमिं प्रविश्य ताम् |
८९ क
भीष्म उवाच:
शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
मासर्तुसञ्ज्ञापरिवर्तकेन; सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन |
९० क
भीष्म उवाच:
स्वकर्मनिष्ठाफलसाक्षिकेण; भूतानि कालः पचति प्रसह्य ||
९० ख
भीष्म उवाच:
धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते; वलेन किं येन रिपून्न वाधते |
९१ क
भीष्म उवाच:
श्रुतेन किं येन न धर्ममाचरे; त्किमात्मना यो न जितेन्द्रिय़ो वशी ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
इदं द्वैपाय़नवचो हितमुक्तं निशम्य तु |
९२ क
भीष्म उवाच:
शुको गतः परित्यज्य पितरं मोक्षदेशिकम् ||
९२ ख