युधिष्ठिर उवाच:
कथं निर्वेदमापन्नः शुको वैय़ासकिः पुरा |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
एतदिच्छामि कौरव्य श्रोतुं कौतूहलं हि मे ||
१ ख
भीष्म उवाच:
प्राकृतेन सुवृत्तेन चरन्तमकुतोभय़म् |
२ क
भीष्म उवाच:
अध्याप्य कृत्स्नं स्वाध्याय़मन्वशाद्वै पिता सुतम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
धर्मं पुत्र निषेवस्व सुतीक्ष्णौ हि हिमातपौ |
३ क
भीष्म उवाच:
क्षुत्पिपासे च वाय़ुं च जय़ नित्यं जितेन्द्रिय़ः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सत्यमार्जवमक्रोधमनसूय़ां दमं तपः |
४ क
भीष्म उवाच:
अहिंसां चानृशंस्यं च विधिवत्परिपालय़ ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सत्ये तिष्ठ रतो धर्मे हित्वा सर्वमनार्जवम् |
५ क
भीष्म उवाच:
देवतातिथिशेषेण यात्रां प्राणस्य संश्रय़ ||
५ ख
भीष्म उवाच:
फेनपात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत्स्थिते |
६ क
भीष्म उवाच:
अनित्ये प्रिय़संवासे कथं स्वपिषि पुत्रक ||
६ ख
भीष्म उवाच:
अप्रमत्तेषु जाग्रत्सु नित्ययुक्तेषु शत्रुषु |
७ क
भीष्म उवाच:
अन्तरं लिप्समानेषु वालस्त्वं नाववुध्यसे ||
७ ख
भीष्म उवाच:
गण्यमानेषु वर्षेषु क्षीय़माणे तथाय़ुषि |
८ क
भीष्म उवाच:
जीविते शिष्यमाणे च किमुत्थाय़ न धावसि ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ऐहलौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् |
९ क
भीष्म उवाच:
पारलौकिककार्येषु प्रसुप्ता भृशनास्तिकाः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
धर्माय़ येऽभ्यसूय़न्ति वुद्धिमोहान्विता नराः |
१० क
भीष्म उवाच:
अपथा गच्छतां तेषामनुय़ातापि पीड्यते ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ये तु तुष्टाः सुनिय़ताः सत्यागमपराय़णाः |
११ क
भीष्म उवाच:
धर्म्यं पन्थानमारूढास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ||
११ ख
भीष्म उवाच:
उपधार्य मतं तेषां वृद्धानां धर्मदर्शिनाम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
निय़च्छ परय़ा वुद्ध्या चित्तमुत्पथगामि वै ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अद्यकालिकय़ा वुद्ध्या दूरे श्व इति निर्भय़ाः |
१३ क
भीष्म उवाच:
सर्वभक्षा न पश्यन्ति कर्मभूमिं विचेतसः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
धर्मनिःश्रेणिमास्थाय़ किञ्चित्किञ्चित्समारुह |
१४ क
भीष्म उवाच:
कोशकारवदात्मानं वेष्टय़न्नाववुध्यसे ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
नास्तिकं भिन्नमर्यादं कूलपातमिवास्थिरम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
वामतः कुरु विस्रव्धो नरं वेणुमिवोद्धतम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
कामं क्रोधं च मृत्युं च पञ्चेन्द्रिय़जलां नदीम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
नावं धृतिमय़ीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि सन्तर ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
मृत्युनाभ्याहते लोके जरय़ा परिपीडिते |
१७ क
भीष्म उवाच:
अमोघासु पतन्तीषु धर्मय़ानेन सन्तर ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तिष्ठन्तं च शय़ानं च मृत्युरन्वेषते यदा |
१८ क
भीष्म उवाच:
निर्वृतिं लभसे कस्मादकस्मान्मृत्युनाशितः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
सञ्चिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय़ गच्छति ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
क्रमशः सञ्चितशिखो धर्मवुद्धिमय़ो महान् |
२० क
भीष्म उवाच:
अन्धकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन धार्यताम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
सम्पतन्देहजालानि कदाचिदिह मानुषे |
२१ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मण्यं लभते जन्तुस्तत्पुत्र परिपालय़ ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणस्य हि देहोऽय़ं न कामार्थाय़ जाय़ते |
२२ क
भीष्म उवाच:
इह क्लेशाय़ तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मण्यं वहुभिरवाप्यते तपोभि; स्तल्लव्ध्वा न परिपणेन हेडितव्यम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
स्वाध्याय़े तपसि दमे च नित्ययुक्तः; क्षेमार्थी कुशलपरः सदा यतस्व ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अव्यक्तप्रकृतिरय़ं कलाशरीरः; सूक्ष्मात्मा क्षणत्रुटिशो निमेषरोमा |
२४ क
भीष्म उवाच:
ऋत्वास्यः समवलशुक्लकृष्णनेत्रो; मांसाङ्गो द्रवति वय़ोहय़ो नराणाम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
तं दृष्ट्वा प्रसृतमजस्रमुग्रवेगं; गच्छन्तं सततमिहाव्यपेक्षमाणम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
चक्षुस्ते यदि न परप्रणेतृनेय़ं; धर्मे ते भवतु मनः परं निशम्य ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
येऽमी तु प्रचलितधर्मकामवृत्ताः; क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रय़ोगाः |
२६ क
भीष्म उवाच:
क्लिश्यन्ते परिगतवेदनाशरीरा; वह्वीभिः सुभृशमधर्मवासनाभिः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
राजा धर्मपरः सदा शुभगोप्ता; समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् |
२७ क
भीष्म उवाच:
वहुविधमपि चरतः प्रदिशति; सुखमनुपगतं निरवद्यम् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
श्वानो भीषणाय़ोमुखानि वय़ांसि; वडगृध्रकुलपक्षिणां च सङ्घाः |
२८ क
भीष्म उवाच:
नरां कदने रुधिरपा गुरुवचन; नुदमुपरतं विशसन्ति ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
मर्यादा निय़ताः स्वय़म्भुवा य इहेमाः; प्रभिनत्ति दशगुणा मनोनुगत्वात् |
२९ क
भीष्म उवाच:
निवसति भृशमसुखं पितृविषय़; विपिनमवगाह्य स पापः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
यो लुव्धः सुभृशं प्रिय़ानृतश्च मनुष्यः; सततनिकृतिवञ्चनारतिः स्यात् |
३० क
भीष्म उवाच:
उपनिधिभिरसुखकृत्स परमनिरय़गो; भृशमसुखमनुभवति दुष्कृतकर्मा ||
३० ख
भीष्म उवाच:
उष्णां वैतरणीं महानदी; मवगाढोऽसिपत्रवनभिन्नगात्रः |
३१ क
भीष्म उवाच:
परशुवनशय़ो निपतितो; वसति च महानिरय़े भृशार्तः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
महापदानि कत्थसे न चाप्यवेक्षसे परम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
चिरस्य मृत्युकारिकामनागतां न वुध्यसे ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
प्रय़ास्यतां किमास्यते समुत्थितं महद्भय़म् |
३३ क
भीष्म उवाच:
अतिप्रमाथि दारुणं सुखस्य संविधीय़ताम् ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
पुरा मृतः प्रणीय़से यमस्य मृत्युशासनात् |
३४ क
भीष्म उवाच:
तदन्तिकाय़ दारुणैः प्रय़त्नमार्जवे कुरु ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
पुरा समूलवान्धवं प्रभुर्हरत्यदुःखवित् |
३५ क
भीष्म उवाच:
तवेह जीवितं यमो न चास्ति तस्य वारकः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
पुरा विवाति मारुतो यमस्य यः पुरःसरः |
३६ क
भीष्म उवाच:
पुरैक एव नीय़से कुरुष्व साम्पराय़िकम् ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
पुरा सहिक्क एव ते प्रवाति मारुतोऽन्तकः |
३७ क
भीष्म उवाच:
पुरा च विभ्रमन्ति ते दिशो महाभय़ागमे ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
स्मृतिश्च संनिरुध्यते पुरा तवेह पुत्रक |
३८ क
भीष्म उवाच:
समाकुलस्य गच्छतः समाधिमुत्तमं कुरु ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
कृताकृते शुभाशुभे प्रमादकर्मविप्लुते |
३९ क
भीष्म उवाच:
स्मरन्पुरा न तप्यसे निधत्स्व केवलं निधिम् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
पुरा जरा कलेवरं विजर्जरीकरोति ते |
४० क
भीष्म उवाच:
वलाङ्गरूपहारिणी निधत्स्व केवलं निधिम् ||
४० ख
भीष्म उवाच:
पुरा शरीरमन्तको भिनत्ति रोगसाय़कैः |
४१ क
भीष्म उवाच:
प्रसह्य जीवितक्षय़े तपो महत्समाचर ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
पुरा वृका भय़ङ्करा मनुष्यदेहगोचराः |
४२ क
भीष्म उवाच:
अभिद्रवन्ति सर्वतो यतस्व पुण्यशीलने ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
पुरान्धकारमेककोऽनुपश्यसि त्वरस्व वै |
४३ क
भीष्म उवाच:
पुरा हिरण्मय़ान्नगान्निरीक्षसेऽद्रिमूर्धनि ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
पुरा कुसङ्गतानि ते सुहृन्मुखाश्च शत्रवः |
४४ क
भीष्म उवाच:
विचालय़न्ति दर्शनाद्घटस्व पुत्र यत्परम् ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
धनस्य यस्य राजतो भय़ं न चास्ति चौरतः |
४५ क
भीष्म उवाच:
मृतं च यन्न मुञ्चति समर्जय़स्व तद्धनम् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
न तत्र संविभज्यते स्वकर्मभिः परस्परम् |
४६ क
भीष्म उवाच:
यदेव यस्य यौतकं तदेव तत्र सोऽश्नुते ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
परत्र येन जीव्यते तदेव पुत्र दीय़ताम् |
४७ क
भीष्म उवाच:
धनं यदक्षय़ं ध्रुवं समर्जय़स्व तत्स्वय़म् ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
न यावदेव पच्यते महाजनस्य यावकम् |
४८ क
भीष्म उवाच:
अपक्व एव यावके पुरा प्रणीय़से त्वर ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
न मातृपितृवान्धवा न संस्तुतः प्रिय़ो जनः |
४९ क
भीष्म उवाच:
अनुव्रजन्ति सङ्कटे व्रजन्तमेकपातिनम् ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
यदेव कर्म केवलं स्वय़ं कृतं शुभाशुभम् |
५० क
भीष्म उवाच:
तदेव तस्य यौतकं भवत्यमुत्र गच्छतः ||
५० ख