chevron_left आदि पर्व अध्याय ३१
शौनक उवाच:
भुजङ्गमानां शापस्य मात्रा चैव सुतेन च |
१ क
शौनक उवाच:
विनताय़ास्त्वय़ा प्रोक्तं कारणं सूतनन्दन ||
१ ख
शौनक उवाच:
वरप्रदानं भर्त्रा च कद्रूविनतय़ोस्तथा |
२ क
शौनक उवाच:
नामनी चैव ते प्रोक्ते पक्षिणोर्वैनतेय़योः ||
२ ख
शौनक उवाच:
पन्नगानां तु नामानि न कीर्तय़सि सूतज |
३ क
शौनक उवाच:
प्राधान्येनापि नामानि श्रोतुमिच्छामहे वय़म् ||
३ ख
सूत उवाच:
वहुत्वान्नामधेय़ानि भुजगानां तपोधन |
४ क
सूत उवाच:
न कीर्तय़िष्ये सर्वेषां प्राधान्येन तु मे शृणु ||
४ ख
सूत उवाच:
शेषः प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम् |
५ क
सूत उवाच:
ऐरावतस्तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जय़ौ ||
५ ख
सूत उवाच:
कालिय़ो मणिनागश्च नागश्चापूरणस्तथा |
६ क
सूत उवाच:
नागस्तथा पिञ्जरक एलापत्रोऽथ वामनः ||
६ ख
सूत उवाच:
नीलानीलौ तथा नागौ कल्माषशवलौ तथा |
७ क
सूत उवाच:
आर्यकश्चादिकश्चैव नागश्च शलपोतकः ||
७ ख
सूत उवाच:
सुमनोमुखो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः |
८ क
सूत उवाच:
आप्तः कोटनकश्चैव शङ्खो वालशिखस्तथा ||
८ ख
सूत उवाच:
निष्ठ्यूनको हेमगुहो नहुषः पिङ्गलस्तथा |
९ क
सूत उवाच:
वाह्यकर्णो हस्तिपदस्तथा मुद्गरपिण्डकः ||
९ ख
सूत उवाच:
कम्वलाश्वतरौ चापि नागः कालीय़कस्तथा |
१० क
सूत उवाच:
वृत्तसंवर्तकौ नागौ द्वौ च पद्माविति श्रुतौ ||
१० ख
सूत उवाच:
नागः शङ्खनकश्चैव तथा च स्फण्डकोऽपरः |
११ क
सूत उवाच:
क्षेमकश्च महानागो नागः पिण्डारकस्तथा ||
११ ख
सूत उवाच:
करवीरः पुष्पदंष्ट्र एळको विल्वपाण्डुकः |
१२ क
सूत उवाच:
मूषकादः शङ्खशिराः पूर्णदंष्ट्रो हरिद्रकः ||
१२ ख
सूत उवाच:
अपराजितो ज्योतिकश्च पन्नगः श्रीवहस्तथा |
१३ क
सूत उवाच:
कौरव्यो धृतराष्ट्रश्च पुष्करः शल्यकस्तथा ||
१३ ख
सूत उवाच:
विरजाश्च सुवाहुश्च शालिपिण्डश्च वीर्यवान् |
१४ क
सूत उवाच:
हस्तिभद्रः पिठरको मुखरः कोणवासनः ||
१४ ख
सूत उवाच:
कुञ्जरः कुररश्चैव तथा नागः प्रभाकरः |
१५ क
सूत उवाच:
कुमुदः कुमुदाक्षश्च तित्तिरिर्हलिकस्तथा |
१५ ख
सूत उवाच:
कर्कराकर्करौ चोभौ कुण्डोदरमहोदरौ ||
१५ ग
सूत उवाच:
एते प्राधान्यतो नागाः कीर्तिता द्विजसत्तम |
१६ क
सूत उवाच:
वहुत्वान्नामधेय़ानामितरे न प्रकीर्तिताः ||
१६ ख
सूत उवाच:
एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च सन्ततिः |
१७ क
सूत उवाच:
असङ्ख्येय़ेति मत्वा तान्न व्रवीमि द्विजोत्तम ||
१७ ख
सूत उवाच:
वहूनीह सहस्राणि प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
१८ क
सूत उवाच:
अशक्यान्येव सङ्ख्यातुं भुजगानां तपोधन ||
१८ ख