द्रौपद्यु उवाच:
नमो धात्रे विधात्रे च यौ मोहं चक्रतुस्तव |
१ क
द्रौपद्यु उवाच:
पितृपैतामहे वृत्ते वोढव्ये तेऽन्यथा मतिः ||
१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च |
२ क
द्रौपद्यु उवाच:
पुरुषः श्रिय़माप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ||
२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
त्वां चेद्व्यसनमभ्यागादिदं भारत दुःसहम् |
३ क
द्रौपद्यु उवाच:
यत्त्वं नार्हसि नापीमे भ्रातरस्ते महौजसः ||
३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
न हि तेऽध्यगमज्जातु तदानीं नाद्य भारत |
४ क
द्रौपद्यु उवाच:
धर्मात्प्रिय़तरं किञ्चिदपि चेज्जीवितादिह ||
४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते |
५ क
द्रौपद्यु उवाच:
व्राह्मणा गुरवश्चैव जानन्त्यपि च देवताः ||
५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
भीमसेनार्जुनौ चैव माद्रेय़ौ च मय़ा सह |
६ क
द्रौपद्यु उवाच:
त्यजेस्त्वमिति मे वुद्धिर्न तु धर्मं परित्यजेः ||
६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
राजानं धर्मगोप्तारं धर्मो रक्षति रक्षितः |
७ क
द्रौपद्यु उवाच:
इति मे श्रुतमार्याणां त्वां तु मन्ये न रक्षति ||
७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अनन्या हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते |
८ क
द्रौपद्यु उवाच:
वुद्धिः सततमन्वेति छाय़ेव पुरुषं निजा ||
८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नावमंस्था हि सदृशान्नावराञ्श्रेय़सः कुतः |
९ क
द्रौपद्यु उवाच:
अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां न ते शृङ्गमवर्धत ||
९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स्वाहाकारैः स्वधाभिश्च पूजाभिरपि च द्विजान् |
१० क
द्रौपद्यु उवाच:
दैवतानि पितॄंश्चैव सततं पार्थ सेवसे ||
१० ख
द्रौपद्यु उवाच:
व्राह्मणाः सर्वकामैस्ते सततं पार्थ तर्पिताः |
११ क
द्रौपद्यु उवाच:
यतय़ो मोक्षिणश्चैव गृहस्थाश्चैव भारत ||
११ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आरण्यकेभ्यो लौहानि भाजनानि प्रय़च्छसि |
१२ क
द्रौपद्यु उवाच:
नादेय़ं व्राह्मणेभ्यस्ते गृहे किञ्चन विद्यते ||
१२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यदिदं वैश्वदेवान्ते साय़म्प्रातः प्रदीय़ते |
१३ क
द्रौपद्यु उवाच:
तद्दत्त्वातिथिभृत्येभ्यो राजञ्शेषेण जीवसि ||
१३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
इष्टय़ः पशुवन्धाश्च काम्यनैमित्तिकाश्च ये |
१४ क
द्रौपद्यु उवाच:
वर्तन्ते पाकय़ज्ञाश्च यज्ञकर्म च नित्यदा ||
१४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अस्मिन्नपि महारण्ये विजने दस्युसेविते |
१५ क
द्रौपद्यु उवाच:
राष्ट्रादपेत्य वसतो धार्मस्ते नावसीदति ||
१५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अश्वमेधो राजसूय़ः पुण्डरीकोऽथ गोसवः |
१६ क
द्रौपद्यु उवाच:
एतैरपि महाय़ज्ञैरिष्टं ते भूरिदक्षिणैः ||
१६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
राजन्परीतय़ा वुद्ध्या विषमेऽक्षपराजय़े |
१७ क
द्रौपद्यु उवाच:
राज्यं वसून्याय़ुधानि भ्रातॄन्मां चासि निर्जितः ||
१७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
ऋजोर्मृदोर्वदान्यस्य ह्रीमतः सत्यवादिनः |
१८ क
द्रौपद्यु उवाच:
कथमक्षव्यसनजा वुद्धिरापतिता तव ||
१८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अतीव मोहमाय़ाति मनश्च परिदूय़ते |
१९ क
द्रौपद्यु उवाच:
निशाम्य ते दुःखमिदमिमां चापदमीदृशीम् ||
१९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२० क
द्रौपद्यु उवाच:
ईश्वरस्य वशे लोकस्तिष्ठते नात्मनो यथा ||
२० ख
द्रौपद्यु उवाच:
धातैव खलु भूतानां सुखदुःखे प्रिय़ाप्रिय़े |
२१ क
द्रौपद्यु उवाच:
दधाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् ||
२१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यथा दारुमय़ी योषा नरवीर समाहिता |
२२ क
द्रौपद्यु उवाच:
ईरय़त्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः ||
२२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत |
२३ क
द्रौपद्यु उवाच:
ईश्वरो विदधातीह कल्याणं यच्च पापकम् ||
२३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
शकुनिस्तन्तुवद्धो वा निय़तोऽय़मनीश्वरः |
२४ क
द्रौपद्यु उवाच:
ईश्वरस्य वशे तिष्ठन्नान्येषां नात्मनः प्रभुः ||
२४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
मणिः सूत्र इव प्रोतो नस्योत इव गोवृषः |
२५ क
द्रौपद्यु उवाच:
धातुरादेशमन्वेति तन्मय़ो हि तदर्पणः ||
२५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नात्माधीनो मनुष्योऽय़ं कालं भवति कञ्चन |
२६ क
द्रौपद्यु उवाच:
स्रोतसो मध्यमापन्नः कूलाद्वृक्ष इव च्युतः ||
२६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अज्ञो जन्तुरनीशोऽय़मात्मनः सुखदुःखय़ोः |
२७ क
द्रौपद्यु उवाच:
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं नरकमेव च ||
२७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यथा वाय़ोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति वलीय़सः |
२८ क
द्रौपद्यु उवाच:
धातुरेवं वशं यान्ति सर्वभूतानि भारत ||
२८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आर्यकर्मणि युञ्जानः पापे वा पुनरीश्वरः |
२९ क
द्रौपद्यु उवाच:
व्याप्य भूतानि चरते न चाय़मिति लक्ष्यते ||
२९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
हेतुमात्रमिदं धातुः शरीरं क्षेत्रसञ्ज्ञितम् |
३० क
द्रौपद्यु उवाच:
येन कारय़ते कर्म शुभाशुभफलं विभुः ||
३० ख
द्रौपद्यु उवाच:
पश्य माय़ाप्रभावोऽय़मीश्वरेण यथा कृतः |
३१ क
द्रौपद्यु उवाच:
यो हन्ति भूतैर्भूतानि मोहय़ित्वात्ममाय़या ||
३१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिर्वेददर्शिभिः |
३२ क
द्रौपद्यु उवाच:
अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ||
३२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अन्यथैव हि मन्यन्ते पुरुषास्तानि तानि च |
३३ क
द्रौपद्यु उवाच:
अन्यथैव प्रभुस्तानि करोति विकरोति च ||
३३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यथा काष्ठेन वा काष्ठमश्मानं चाश्मना पुनः |
३४ क
द्रौपद्यु उवाच:
अय़सा चाप्ययश्छिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम् ||
३४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवं स भगवान्देवः स्वय़म्भूः प्रपितामहः |
३५ क
द्रौपद्यु उवाच:
हिनस्ति भूतैर्भूतानि छद्म कृत्वा युधिष्ठिर ||
३५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सम्प्रय़ोज्य विय़ोज्याय़ं कामकारकरः प्रभुः |
३६ क
द्रौपद्यु उवाच:
क्रीडते भगवन्भूतैर्वालः क्रीडनकैरिव ||
३६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
न मातृपितृवद्राजन्धाता भूतेषु वर्तते |
३७ क
द्रौपद्यु उवाच:
रोषादिव प्रवृत्तोऽय़ं यथाय़मितरो जनः ||
३७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आर्याञ्शीलवतो दृष्ट्वा ह्रीमतो वृत्तिकर्शितान् |
३८ क
द्रौपद्यु उवाच:
अनार्यान्सुखिनश्चैव विह्वलामीव चिन्तय़ा ||
३८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तवेमामापदं दृष्ट्वा समृद्धिं च सुय़ोधने |
३९ क
द्रौपद्यु उवाच:
धातारं गर्हय़े पार्थ विषमं योऽनुपश्यति ||
३९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आर्यशास्त्रातिगे क्रूरे लुव्धे धर्मापचाय़िनि |
४० क
द्रौपद्यु उवाच:
धार्तराष्ट्रे श्रिय़ं दत्त्वा धाता किं फलमश्नुते ||
४० ख
द्रौपद्यु उवाच:
कर्म चेत्कृतमन्वेति कर्तारं नान्यमृच्छति |
४१ क
द्रौपद्यु उवाच:
कर्मणा तेन पापेन लिप्यते नूनमीश्वरः ||
४१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अथ कर्म कृतं पापं न चेत्कर्तारमृच्छति |
४२ क
द्रौपद्यु उवाच:
कारणं वलमेवेह जनाञ्शोचामि दुर्वलान् ||
४२ ख