chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३११
भीष्म उवाच:
स लव्ध्वा परमं देवाद्वरं सत्यवतीसुतः |
१ क
भीष्म उवाच:
अरणीं त्वथ सङ्गृह्य ममन्थाग्निचिकीर्षय़ा ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अथ रूपं परं राजन्विभ्रतीं स्वेन तेजसा |
२ क
भीष्म उवाच:
घृताचीं नामाप्सरसमपश्यद्भगवानृषिः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ऋषिरप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः |
३ क
भीष्म उवाच:
अभवद्भगवान्व्यासो वने तस्मिन्युधिष्ठिर ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सा च कृत्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् |
४ क
भीष्म उवाच:
शुकी भूत्वा महाराज घृताची समुपागमत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् |
५ क
भीष्म उवाच:
शरीरजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स तु धैर्येण महता निगृह्णन्हृच्छय़ं मुनिः |
६ क
भीष्म उवाच:
न शशाक निय़न्तुं तद्व्यासः प्रविसृतं मनः |
६ ख
भीष्म उवाच:
भावित्वाच्चैव भावस्य घृताच्या वपुषा हृतः ||
६ ग
भीष्म उवाच:
यत्नान्निय़च्छतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षय़ा |
७ क
भीष्म उवाच:
अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
सोऽविशङ्केन मनसा तथैव द्विजसत्तमः |
८ क
भीष्म उवाच:
अरणीं ममन्थ व्रह्मर्षिस्तस्यां जज्ञे शुको नृप ||
८ ख
भीष्म उवाच:
शुक्रे निर्मथ्यमाने तु शुको जज्ञे महातपाः |
९ क
भीष्म उवाच:
परमर्षिर्महाय़ोगी अरणीगर्भसम्भवः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुपात्तवान् |
१० क
भीष्म उवाच:
तथारूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
विभ्रत्पितुश्च कौरव्य रूपवर्णमनुत्तमम् |
११ क
भीष्म उवाच:
वभौ तदा भावितात्मा विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
तं गङ्गा सरितां श्रेष्ठा मेरुपृष्ठे जनेश्वर |
१२ क
भीष्म उवाच:
स्वरूपिणी तदाभ्येत्य स्नापय़ामास वारिणा ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षाच्च कौरव्य दण्डः कृष्णाजिनं च ह |
१३ क
भीष्म उवाच:
पपात भुवि राजेन्द्र शुकस्यार्थे महात्मनः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
जेगीय़न्ते स्म गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः |
१४ क
भीष्म उवाच:
देवदुन्दुभय़श्चैव प्रावाद्यन्त महास्वनाः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा तुम्वुरुनारदौ |
१५ क
भीष्म उवाच:
हाहाहूहू च गन्धर्वौ तुष्टुवुः शुकसम्भवम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः |
१६ क
भीष्म उवाच:
देवा देवर्षय़श्चैव तथा व्रह्मर्षय़ोऽपि च ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्षात्र मारुतः |
१७ क
भीष्म उवाच:
जङ्गमं स्थावरं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तं महात्मा स्वय़ं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः |
१८ क
भीष्म उवाच:
जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानय़त्तदा ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
ददौ कमण्डलुं प्रीत्या देववासांसि चाभिभो ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः |
२० क
भीष्म उवाच:
प्रदक्षिणमवर्तन्त शुकाश्चाषाश्च भारत ||
२० ख
भीष्म उवाच:
आरणेय़स्तथा दिव्यं प्राप्य जन्म महाद्युतिः |
२१ क
भीष्म उवाच:
तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहितः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससङ्ग्रहाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
उपतस्थुर्महाराज यथास्य पितरं तथा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
वृहस्पतिं तु वव्रे स वेदवेदाङ्गभाष्यवित् |
२३ क
भीष्म उवाच:
उपाध्याय़ं महाराज धर्ममेवानुचिन्तय़न् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
सोऽधीत्य वेदानखिलान्सरहस्यान्ससङ्ग्रहान् |
२४ क
भीष्म उवाच:
इतिहासं च कार्त्स्न्येन राजशास्त्राणि चाभिभो ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो महामुनिः |
२५ क
भीष्म उवाच:
उग्रं तपः समारेभे व्रह्मचारी समाहितः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
देवतानामृषीणां च वाल्येऽपि स महातपाः |
२६ क
भीष्म उवाच:
संमन्त्रणीय़ो मान्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
न त्वस्य रमते वुद्धिराश्रमेषु नराधिप |
२७ क
भीष्म उवाच:
त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः ||
२७ ख