भीष्म उवाच:
गिरिपृष्ठं समारुह्य सुतो व्यासस्य भारत |
१ क
भीष्म उवाच:
समे देशे विविक्ते च निःशलाक उपाविशत् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
धारय़ामास चात्मानं यथाशास्त्रं महामुनिः |
२ क
भीष्म उवाच:
पादात्प्रभृतिगात्रेषु क्रमेण क्रमय़ोगवित् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततः स प्राङ्मुखो विद्वानादित्ये नचिरोदिते |
३ क
भीष्म उवाच:
पाणिपादं समाधाय़ विनीतवदुपाविशत् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
न तत्र पक्षिसङ्घातो न शव्दो नापि दर्शनम् |
४ क
भीष्म उवाच:
यत्र वैय़ासकिर्धीमान्योक्तुं समुपचक्रमे ||
४ ख
भीष्म उवाच:
स ददर्श तदात्मानं सर्वसङ्गविनिःसृतम् |
५ क
भीष्म उवाच:
प्रजहास ततो हासं शुकः सम्प्रेक्ष्य भास्करम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स पुनर्योगमास्थाय़ मोक्षमार्गोपलव्धय़े |
६ क
भीष्म उवाच:
महाय़ोगीश्वरो भूत्वा सोऽत्यक्रामद्विहाय़सम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा देवर्षिं नारदं तदा |
७ क
भीष्म उवाच:
निवेदय़ामास तदा स्वं योगं परमर्षय़े ||
७ ख
भीष्म उवाच:
दृष्टो मार्गः प्रवृत्तोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु तपोधन |
८ क
भीष्म उवाच:
त्वत्प्रसादाद्गमिष्यामि गतिमिष्टां महाद्युते ||
८ ख
भीष्म उवाच:
नारदेनाभ्यनुज्ञातस्ततो द्वैपाय़नात्मजः |
९ क
भीष्म उवाच:
अभिवाद्य पुनर्योगमास्थाय़ाकाशमाविशत् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
कैलासपृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं तदा |
१० क
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्व्यासपुत्रः सुनिश्चितः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
तमुद्यन्तं द्विजश्रेष्ठं वैनतेय़समद्युतिम् |
११ क
भीष्म उवाच:
ददृशुः सर्वभूतानि मनोमारुतरंहसम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
व्यवसाय़ेन लोकांस्त्रीन्सर्वान्सोऽथ विचिन्तय़न् |
१२ क
भीष्म उवाच:
आस्थितो दिव्यमध्वानं पावकार्कसमप्रभः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
तमेकमनसं यान्तमव्यग्रमकुतोभय़म् |
१३ क
भीष्म उवाच:
ददृशुः सर्वभूतानि जङ्गमानीतराणि च ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथाशक्ति यथान्याय़ं पूजय़ां चक्रिरे तदा |
१४ क
भीष्म उवाच:
पुष्पवर्षैश्च दिव्यैस्तमवचक्रुर्दिवौकसः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे गन्धर्वाप्सरसां गणाः |
१५ क
भीष्म उवाच:
ऋषय़श्चैव संसिद्धाः परं विस्मय़मागताः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षचरः कोऽय़ं तपसा सिद्धिमागतः |
१६ क
भीष्म उवाच:
अधःकाय़ोर्ध्ववक्त्रश्च नेत्रैः समभिवाह्यते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततः परमधीरात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
१७ क
भीष्म उवाच:
भास्करं समुदीक्षन्स प्राङ्मुखो वाग्यतोऽगमत् |
१७ ख
भीष्म उवाच:
शव्देनाकाशमखिलं पूरय़न्निव सर्वतः ||
१७ ग
भीष्म उवाच:
तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा सर्वाप्सरोगणाः |
१८ क
भीष्म उवाच:
सम्भ्रान्तमनसो राजन्नासन्परमविस्मिताः |
१८ ख
भीष्म उवाच:
पञ्चचूडाप्रभृतय़ो भृशमुत्फुल्ललोचनाः ||
१८ ग
भीष्म उवाच:
दैवतं कतमं ह्येतदुत्तमां गतिमास्थितम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
सुनिश्चितमिहाय़ाति विमुक्तमिव निःस्पृहम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ततः समतिचक्राम मलय़ं नाम पर्वतम् |
२० क
भीष्म उवाच:
उर्वशी पूर्वचित्तिश्च यं नित्यमुपसेवते |
२० ख
भीष्म उवाच:
ते स्म व्रह्मर्षिपुत्रस्य विस्मय़ं यय़तुः परम् ||
२० ग
भीष्म उवाच:
अहो वुद्धिसमाधानं वेदाभ्यासरते द्विजे |
२१ क
भीष्म उवाच:
अचिरेणैव कालेन नभश्चरति चन्द्रवत् |
२१ ख
भीष्म उवाच:
पितृशुश्रूषय़ा सिद्धिं सम्प्राप्तोऽय़मनुत्तमाम् ||
२१ ग
भीष्म उवाच:
पितृभक्तो दृढतपाः पितुः सुदय़ितः सुतः |
२२ क
भीष्म उवाच:
अनन्यमनसा तेन कथं पित्रा विवर्जितः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
उर्वश्या वचनं श्रुत्वा शुकः परमधर्मवित् |
२३ क
भीष्म उवाच:
उदैक्षत दिशः सर्वा वचने गतमानसः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
सोऽन्तरिक्षं महीं चैव सशैलवनकाननाम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
आलोकय़ामास तदा सरांसि सरितस्तथा ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
ततो द्वैपाय़नसुतं वहुमानपुरःसरम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
कृताञ्जलिपुटाः सर्वा निरीक्षन्ते स्म देवताः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अव्रवीत्तास्तदा वाक्यं शुकः परमधर्मवित् |
२६ क
भीष्म उवाच:
पिता यद्यनुगच्छेन्मां क्रोशमानः शुकेति वै ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रतिवचो देय़ं सर्वैरेव समाहितैः |
२७ क
भीष्म उवाच:
एतन्मे स्नेहतः सर्वे वचनं कर्तुमर्हथ ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
शुकस्य वचनं श्रुत्वा दिशः सवनकाननाः |
२८ क
भीष्म उवाच:
समुद्राः सरितः शैलाः प्रत्यूचुस्तं समन्ततः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
यथाज्ञापय़से विप्र वाढमेवं भविष्यति |
२९ क
भीष्म उवाच:
ऋषेर्व्याहरतो वाक्यं प्रतिवक्ष्यामहे वय़म् ||
२९ ख