भीष्म उवाच:
इत्येवमुक्त्वा वचनं व्रह्मर्षिः सुमहातपाः |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रातिष्ठत शुकः सिद्धिं हित्वा लोकांश्चतुर्विधान् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तमो ह्यष्टविधं हित्वा जहौ पञ्चविधं रजः |
२ क
भीष्म उवाच:
ततः सत्त्वं जहौ धीमांस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तस्मिन्पदे नित्ये निर्गुणे लिङ्गवर्जिते |
३ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मणि प्रत्यतिष्ठत्स विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
उल्कापाता दिशां दाहा भूमिकम्पास्तथैव च |
४ क
भीष्म उवाच:
प्रादुर्भूताः क्षणे तस्मिंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
द्रुमाः शाखाश्च मुमुचुः शिखराणि च पर्वताः |
५ क
भीष्म उवाच:
निर्घातशव्दैश्च गिरिर्हिमवान्दीर्यतीव ह ||
५ ख
भीष्म उवाच:
न वभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः |
६ क
भीष्म उवाच:
ह्रदाश्च सरितश्चैव चुक्षुभुः सागरास्तथा ||
६ ख
भीष्म उवाच:
ववर्ष वासवस्तोय़ं रसवच्च सुगन्धि च |
७ क
भीष्म उवाच:
ववौ समीरणश्चापि दिव्यगन्धवहः शुचिः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
स शृङ्गेऽप्रतिमे दिव्ये हिमवन्मेरुसम्भवे |
८ क
भीष्म उवाच:
संश्लिष्टे श्वेतपीते द्वे रुक्मरूप्यमय़े शुभे ||
८ ख
भीष्म उवाच:
शतय़ोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वं च भारत |
९ क
भीष्म उवाच:
उदीचीं दिशमाश्रित्य रुचिरे सन्ददर्श ह ||
९ ख
भीष्म उवाच:
सोऽविशङ्केन मनसा तथैवाभ्यपतच्छुकः |
१० क
भीष्म उवाच:
ततः पर्वतशृङ्गे द्वे सहसैव द्विधाकृते |
१० ख
भीष्म उवाच:
अदृश्येतां महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ||
१० ग
भीष्म उवाच:
ततः पर्वतशृङ्गाभ्यां सहसैव विनिःसृतः |
११ क
भीष्म उवाच:
न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततो महानभूच्छव्दो दिवि सर्वदिवौकसाम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
गन्धर्वाणामृषीणां च ये च शैलनिवासिनः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा शुकमतिक्रान्तं पर्वतं च द्विधाकृतम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
साधु साध्विति तत्रासीन्नादः सर्वत्र भारत ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
स पूज्यमानो देवैश्च गन्धर्वैरृषिभिस्तथा |
१४ क
भीष्म उवाच:
यक्षराक्षससङ्घैश्च विद्याधरगणैस्तथा ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
दिव्यैः पुष्पैः समाकीर्णमन्तरिक्षं समन्ततः |
१५ क
भीष्म उवाच:
आसीत्किल महाराज शुकाभिपतने तदा ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ततो मन्दाकिनीं रम्यामुपरिष्टादभिव्रजन् |
१६ क
भीष्म उवाच:
शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननाम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तस्यां क्रीडन्त्यभिरताः स्नान्ति चैवाप्सरोगणाः |
१७ क
भीष्म उवाच:
शून्याकारं निराकाराः शुकं दृष्ट्वा विवाससः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तं प्रक्रमन्तमाज्ञाय़ पिता स्नेहसमन्वितः |
१८ क
भीष्म उवाच:
उत्तमां गतिमास्थाय़ पृष्ठतोऽनुससार ह ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वान्तरिक्षगाम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
दर्शय़ित्वा प्रभावं स्वं सर्वभूतोऽभवत्तदा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
महाय़ोगगतिं त्वग्र्यां व्यासोत्थाय़ महातपाः |
२० क
भीष्म उवाच:
निमेषान्तरमात्रेण शुकाभिपतनं यय़ौ ||
२० ख
भीष्म उवाच:
स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं शुकं गतम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
शशंसुरृषय़स्तस्मै कर्म पुत्रस्य तत्तदा ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
ततः शुकेति दीर्घेण शैक्षेणाक्रन्दितस्तदा |
२२ क
भीष्म उवाच:
स्वय़ं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रीँल्लोकाननुनाद्य वै ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
शुकः सर्वगतो भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः |
२३ क
भीष्म उवाच:
प्रत्यभाषत धर्मात्मा भोःशव्देनानुनादय़न् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तत एकाक्षरं नादं भो इत्येव समीरय़न् |
२४ क
भीष्म उवाच:
प्रत्याहरज्जगत्सर्वमुच्चैः स्थावरजङ्गमम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रभृति चाद्यापि शव्दानुच्चारितान्पृथक् |
२५ क
भीष्म उवाच:
गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याजहार शुकं प्रति ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अन्तर्हितः प्रभावं तु दर्शय़ित्वा शुकस्तदा |
२६ क
भीष्म उवाच:
गुणान्सन्त्यज्य शव्दादीन्पदमध्यगमत्परम् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
महिमानं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्यामिततेजसः |
२७ क
भीष्म उवाच:
निषसाद गिरिप्रस्थे पुत्रमेवानुचिन्तय़न् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
ततो मन्दाकिनीतीरे क्रीडन्तोऽप्सरसां गणाः |
२८ क
भीष्म उवाच:
आसाद्य तमृषिं सर्वाः सम्भ्रान्ता गतचेतसः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
जले निलिल्यिरे काश्चित्काश्चिद्गुल्मान्प्रपेदिरे |
२९ क
भीष्म उवाच:
वसनान्याददुः काश्चिद्दृष्ट्वा तं मुनिसत्तमम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
तां मुक्ततां तु विज्ञाय़ मुनिः पुत्रस्य वै तदा |
३० क
भीष्म उवाच:
सक्ततामात्मनश्चैव प्रीतोऽभूद्व्रीडितश्च ह ||
३० ख
भीष्म उवाच:
तं देवगन्धर्ववृतो महर्षिगणपूजितः |
३१ क
भीष्म उवाच:
पिनाकहस्तो भगवानभ्यागच्छत शङ्करः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
तमुवाच महादेवः सान्त्वपूर्वमिदं वचः |
३२ क
भीष्म उवाच:
पुत्रशोकाभिसन्तप्तं कृष्णद्वैपाय़नं तदा ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
अग्नेर्भूमेरपां वाय़ोरन्तरिक्षस्य चैव ह |
३३ क
भीष्म उवाच:
वीर्येण सदृशः पुत्रस्त्वय़ा मत्तः पुरा वृतः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
स तथालक्षणो जातस्तपसा तव सम्भृतः |
३४ क
भीष्म उवाच:
मम चैव प्रभावेन व्रह्मतेजोमय़ः शुचिः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
स गतिं परमां प्राप्तो दुष्प्रापामजितेन्द्रिय़ैः |
३५ क
भीष्म उवाच:
दैवतैरपि विप्रर्षे तं त्वं किमनुशोचसि ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
यावत्स्थास्यन्ति गिरय़ो यावत्स्थास्यन्ति सागराः |
३६ क
भीष्म उवाच:
तावत्तवाक्षय़ा कीर्तिः सपुत्रस्य भविष्यति ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
छाय़ां स्वपुत्रसदृशीं सर्वतोऽनपगां सदा |
३७ क
भीष्म उवाच:
द्रक्ष्यसे त्वं च लोकेऽस्मिन्मत्प्रसादान्महामुने ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
सोऽनुनीतो भगवता स्वय़ं रुद्रेण भारत |
३८ क
भीष्म उवाच:
छाय़ां पश्यन्समावृत्तः स मुनिः परय़ा मुदा ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
इति जन्म गतिश्चैव शुकस्य भरतर्षभ |
३९ क
भीष्म उवाच:
विस्तरेण मय़ाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
एतदाचष्ट मे राजन्देवर्षिर्नारदः पुरा |
४० क
भीष्म उवाच:
व्यासश्चैव महाय़ोगी सञ्जल्पेषु पदे पदे ||
४० ख
भीष्म उवाच:
इतिहासमिमं पुण्यं मोक्षधर्मार्थसंहितम् |
४१ क
भीष्म उवाच:
धारय़ेद्यः शमपरः स गच्छेत्परमां गतिम् ||
४१ ख