chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३२४
युधिष्ठिर उवाच:
यदा भक्तो भगवत आसीद्राजा महावसुः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
किमर्थं स परिभ्रष्टो विवेश विवरं भुवः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
ऋषीणां चैव संवादं त्रिदशानां च भारत ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अजेन यष्टव्यमिति देवाः प्राहुर्द्विजोत्तमान् |
३ क
भीष्म उवाच:
स च छागो ह्यजो ज्ञेय़ो नान्यः पशुरिति स्थितिः ||
३ ख
ऋषय़ ऊचुः:
वीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः |
४ क
ऋषय़ ऊचुः:
अजसञ्ज्ञानि वीजानि छागं न घ्नन्तुमर्हथ ||
४ ख
ऋषय़ ऊचुः:
नैष धर्मः सतां देवा यत्र वध्येत वै पशुः |
५ क
ऋषय़ ऊचुः:
इदं कृतय़ुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशुः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
तेषां संवदतामेवमृषीणां विवुधैः सह |
६ क
भीष्म उवाच:
मार्गागतो नृपश्रेष्ठस्तं देशं प्राप्तवान्वसुः |
६ ख
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्समग्रवलवाहनः ||
६ ग
भीष्म उवाच:
तं दृष्ट्वा सहसाय़ान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् |
७ क
भीष्म उवाच:
ऊचुर्द्विजातय़ो देवानेष छेत्स्यति संशय़म् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रिय़ः |
८ क
भीष्म उवाच:
कथं स्विदन्यथा व्रूय़ाद्वाक्यमेष महान्वसुः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
एवं ते संविदं कृत्वा विवुधा ऋषय़स्तथा |
९ क
भीष्म उवाच:
अपृच्छन्सहसाभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
भो राजन्केन यष्टव्यमजेनाहो स्विदौषधैः |
१० क
भीष्म उवाच:
एतन्नः संशय़ं छिन्धि प्रमाणं नो भवान्मतः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
स तान्कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः |
११ क
भीष्म उवाच:
कस्य वः को मतः पक्षो व्रूत सत्यं समागताः ||
११ ख
ऋषय़ ऊचुः:
धान्यैर्यष्टव्यमित्येष पक्षोऽस्माकं नराधिप |
१२ क
ऋषय़ ऊचुः:
देवानां तु पशुः पक्षो मतो राजन्वदस्व नः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रय़ात् |
१३ क
भीष्म उवाच:
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
कुपितास्ते ततः सर्वे मुनय़ः सूर्यवर्चसः |
१४ क
भीष्म उवाच:
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थवादिनम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात्तस्माद्दिवः पत |
१५ क
भीष्म उवाच:
अद्य प्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः |
१५ ख
भीष्म उवाच:
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
ततस्तस्मिन्मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा |
१६ क
भीष्म उवाच:
अधो वै सम्वभूवाशु भूमेर्विवरगो नृपः |
१६ ख
भीष्म उवाच:
स्मृतिस्त्वेनं न प्रजहौ तदा नाराय़णाज्ञय़ा ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
चिन्तय़ामासुरव्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना |
१८ क
भीष्म उवाच:
अस्य प्रतिप्रिय़ं कार्यं सहितैर्नो दिवौकसः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
इति वुद्ध्या व्यवस्याशु गत्वा निश्चय़मीश्वराः |
१९ क
भीष्म उवाच:
ऊचुस्तं हृष्टमनसो राजोपरिचरं तदा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मण्यदेवं त्वं भक्तः सुरासुरगुरुं हरिम् |
२० क
भीष्म उवाच:
कामं स तव तुष्टात्मा कुर्याच्छापविमोक्षणम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
मानना तु द्विजातीनां कर्तव्या वै महात्मनाम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
अवश्यं तपसा तेषां फलितव्यं नृपोत्तम ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
यतस्त्वं सहसा भ्रष्ट आकाशान्मेदिनीतलम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
एकं त्वनुग्रहं तुभ्यं दद्मो वै नृपसत्तम ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
यावत्त्वं शापदोषेण कालमासिष्यसेऽनघ |
२३ क
भीष्म उवाच:
भूमेर्विवरगो भूत्वा तावन्तं कालमाप्स्यसि |
२३ ख
भीष्म उवाच:
यज्ञेषु सुहुतां विप्रैर्वसोर्धारां महात्मभिः ||
२३ ग
भीष्म उवाच:
प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिरास्पृशेत् |
२४ क
भीष्म उवाच:
न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यतः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
वसोर्धारानुपीतत्वात्तेजसाप्याय़ितेन च |
२५ क
भीष्म उवाच:
स देवोऽस्मद्वरात्प्रीतो व्रह्मलोकं हि नेष्यति ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
एवं दत्त्वा वरं राज्ञे सर्वे तत्र दिवौकसः |
२६ क
भीष्म उवाच:
गताः स्वभवनं देवा ऋषय़श्च तपोधनाः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
चक्रे च सततं पूजां विष्वक्सेनाय़ भारत |
२७ क
भीष्म उवाच:
जप्यं जगौ च सततं नाराय़णमुखोद्गतम् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिन्दम |
२८ क
भीष्म उवाच:
अय़जद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽस्य तुष्टो भगवान्भक्त्या नाराय़णो हरिः |
२९ क
भीष्म उवाच:
अनन्यभक्तस्य सतस्तत्परस्य जितात्मनः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
वरदो भगवान्विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् |
३० क
भीष्म उवाच:
गरुत्मन्तं महावेगमावभाषे स्मय़न्निव ||
३० ख
भीष्म उवाच:
द्विजोत्तम महाभाग गम्यतां वचनान्मम |
३१ क
भीष्म उवाच:
सम्राड्राजा वसुर्नाम धर्मात्मा मां समाश्रितः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानां प्रकोपेन प्रविष्टो वसुधातलम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
भूमेर्विवरसङ्गुप्तं गरुडेह ममाज्ञय़ा |
३३ क
भीष्म उवाच:
अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु माचिरम् ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् |
३४ क
भीष्म उवाच:
विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते वाग्यतो वसुः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः |
३५ क
भीष्म उवाच:
उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिन्मुहूर्ते सञ्जज्ञे राजोपरिचरः पुनः |
३६ क
भीष्म उवाच:
सशरीरो गतश्चैव व्रह्मलोकं नृपोत्तमः ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
एवं तेनापि कौन्तेय़ वाग्दोषाद्देवताज्ञय़ा |
३७ क
भीष्म उवाच:
प्राप्ता गतिरय़ज्वार्हा द्विजशापान्महात्मना ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरिरीश्वरः |
३८ क
भीष्म उवाच:
ततः शीघ्रं जहौ शापं व्रह्मलोकमवाप च ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
एतत्ते सर्वमाख्यातं ते भूता मानवा यथा |
३९ क
भीष्म उवाच:
नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः |
३९ ख
भीष्म उवाच:
तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ||
३९ ग